फ़ारस की महान सल्तनत जिसे इतिहास से मिटा दिया गया
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- Author, स्पेंसर मिज़न
- पदनाम, बीबीसी हिस्ट्री एक्सट्रा
प्राचीन यूनानियों की तरफ़ से शुरू की गई एक मुहिम, जिसका मक़सद प्राचीन फ़ारस या वर्तमान ईरान पर कीचड़ उछालना था, दो हज़ार साल में भी उनकी आश्चर्यचकित करने वाली सफलताओं की दास्तान को पूरी तरह से मिटा नहीं सकी.
प्राचीन फ़ारस और यूनान के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास के विशेषज्ञ लॉयड जोंस एक ऐसे परिवार की कहानी सुनाते हैं, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत को जन्म दिया.
1934 के आसपास ब्रितानी कवि और उपन्यासकार रॉबर्ट ग्रीव्ज़ ने एक कविता लिखी जिसका शीर्षक था 'फ़ारस का दृष्टिकोण'. यह मैराथन के युद्ध के बारे में थी जो एथेंस और प्राचीन फ़ारस के बीच सन 449 ईसा पूर्व में लड़ा गया था.
इस युद्ध को एथेंस की शानदार विजय घोषित किया गया और जल्द ही मैराथन को यूनानी दुनिया में एक दंतकथा की पहचान मिल गयी.
यूनानी भूमि से फ़ारसी लड़ाकों को निकाले जाने से अत्याचार के विरुद्ध मुक्ति के लिए साहसिक युद्ध की एक कथा ने जन्म लिया. बात यहीं पर ख़त्म नहीं होती क्योंकि इसे इतिहास के अनुसार यूरोप का जन्म भी मैराथन में ही हुआ.
रॉबर्ट ग्रीव्ज़ ने अपनी कविता में इस इतिहास पर सवाल उठाया है और उन्होंने यह कविता फ़ारसवासियों के दृष्टिकोण से लिखी है.
उनके अनुसार फ़ारसियों के लिए मैराथन एक छोटी सी झड़प से अधिक की हैसियत नहीं रखती थी क्योंकि यह यूनान पर विजय प्राप्त करने की कोशिश ही नहीं थी जैसा कि इस कहानी को बना दिया गया और यूरोप में स्कूल के बच्चों को सदियों से पढ़ाया जाता रहा.
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सायरस या ज़ुलक़रनैन के उत्कर्ष और उससे दो सदियों के बाद डेरेयिस या दारा प्रथम की मौत के बीच फ़ारस की सल्तनत दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति थी.
यह एक ऐसी सल्तनत थी जिसकी बुनियाद आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, विकसित सभ्यताओं और धर्मों की उदारता और ज़रूरत पड़ने पर ताक़त के इस्तेमाल से रखी गयी थी.
दो सौ साल तक उनकी ताक़त को देखते हुए रॉबर्ट ग्रीव्ज़ का मानना था कि फ़ारस के लिए यूनानियों से झड़पें इतनी महत्वपूर्ण नहीं थीं जितना कि यूनानियों ने उन्हें बना दिया.
लेकिन वे धारा के विपरीत तैरने की कोशिश कर रहे थे.
यूनानी सभ्यता
दो सौ साल पूर्व कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि पश्चिम ने किस तरह बाकी की दुनिया पर आधिपत्य स्थापित किया.
इसके साथ ही एक दृष्टिकोण दिया गया कि यूरोपीय वर्चस्व का कारण ईसाईयत या धर्म नहीं है, जैसा कि पहले समझा जाता था, बल्कि इसका कारण वह सांस्कृतिक परंपरा है जिसका आरंभ प्राचीन यूनान से हुआ.
उनका मानना था कि यूनान ने स्वतंत्रता और बौद्धिकता की खोज की और फिर रोम ने उन्हें पूरे यूरोप में विजयों के ज़रिये फैला दिया.
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इस तर्क के अनुसार यूनान और रोम के अलावा बाक़ी सभी इलाक़ों में वहशी बसते थे और उनमें से सबसे ख़राब और ख़तरनाक फ़ारस के रहने वाले थे जो पूरी दुनिया पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे.
यूनान और फ़ारस के युद्ध के समय से ही फ़ारसियों के ख़िलाफ़ ऐसी मुहिम चलाई गई, जिसका मक़सद उन को आज़ाद दुनिया का ज़ालिम दुश्मन दिखाना था.
यह मामला इसलिए भी पेचीदा हुआ क्योंकि उस फ़ारस में इतिहास लिखने का तरीक़ा यूनान से अलग था. वे कविता और गीत के ज़रिए अपना अतीत पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते थे.
तो फिर सवाल यह है कि फ़ारस का वास्तविक इतिहास क्या है? इसका जवाब प्राचीन फ़ारसी भाषा में उपलब्ध तथ्यों से मिलता है, जो उस सल्तनत के बारे में जानकारी उपलब्ध कराते हैं, उसकी अर्थव्यवस्था नागरिक समाज से लेकर कला के बारे में भी बताते हैं.
इस ख़ज़ाने की वजह से ईरान के पास अब एक ऐसा मंच मौजूद है जहां से वह अपने अतीत की कहानी सुना सकता है.
बादशाहत से सुपर पॉवर का सफ़र
यह कहानी छठी सदी ईसा पूर्व से शुरू होती है, जब प्राचीन विश्व के एक उल्लेखनीय शासक का उदय हुआ जिसे हम सायरस द्वितीय के नाम से जानते हैं.
उस वक़्त फ़ारस एक छोटी सी बादशाहत थी जो आज के ईरान के दक्षिण पूर्व में स्थित थी और कई क़बीलों में से एक पर आधारित थी.
लेकिन अपनी मौत से पहले ही सायरस इस छोटी सी बादशाहत को दुनिया का सुपर पॉवर बना चुके थे.
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550 वर्ष ईसा पूर्व में साइरस ने दक्षिणी ईरान के क़बायली समूहों की मदद से मीडीज़ की राजधानी पर क़ब्ज़ा कर लिया जो उस समय क्षेत्र की बड़ी सल्तनत थी. उनकी अगली बड़ी सफलता लघु एशिया या अनातोलिया में लीडिया की शक्तिशाली और मालदार सल्तनत के ख़िलाफ़ थी जिसकी राजधानी पर क़ब्ज़े ने उनकी भविष्य की जीत की राह आसान कर दी.
540 वर्ष ईसा पूर्व में सायरस बाबुल के महान शहर में प्रवेश कर चुके थे. उस शहर की जीत की अधिकतर जानकारी हमें सायरस के समय के सलैंडर्ज़ से ही मिलती हैं.
उस जीत के बाद सायरस वास्तव में एक महान साम्राज्य के स्वामी बन चुके थे. ईरान में पासारगाद के स्थान पर साइरस ने एक मक़बरा और महल बनवाया जिसके साथ ही बड़ा सा बाग़ था.
शाही फ़रमान के अनुसार परास्त हुए सभी समूहों के लिए यह अनिवार्य था कि वे सायरस के बनाए गए क़ानूनों का पालन करें. खुद वायरस के बारे में यह बात मशहूर की गई के उसे ख़ुदा का समर्थन प्राप्त है जिसने सायरस को दुनिया में संतुलन बनाए रखने का उपहार दिया है.
हेरोडोटस के अनुसार साइरस मध्य एशिया में मासागेटाई क़बीले से लड़ते हुए मारे गए. यह एक बड़ा धक्का था लेकिन सल्तनत के विस्तार को रोकना अब मुश्किल था.
मिस्र पर जीत
उनके बाद केमबयासिस द्वितीय ने जल्द ही मिस्र को भी जीत लिया.
यूनानी स्रोत केमबयासिस द्वितीय को एक पागल तानाशाह बताते हैं जो अपनी प्रजा पर अत्याचार करता और परास्त समूहों की धार्मिक परंपराओं का अपमान करता था. लेकिन मिस्र से मिलने वाले पुरातात्विक साक्ष्य एक अलग तस्वीर पेश करते हैं.
उनसे पता चलता है कि बादशाह ने धार्मिक उदारता की नीति अपनाई थी. मेम्पफिस से मिलने वाली इमारतों से भी इस बात की पुष्टि होती है. धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण की ओर सहनशीलता का रवैया फ़ारस की विशेषता रही है.
लेकिन ज़रूरत पड़ने पर प्राचीन फ़ारस की सल्तनत शक्ति का क्रूर प्रयोग भी कर सकती थी. इसका साक्ष्य डेरेयिस के रूप में मिला, जिसको सायरस द्वितीय के बाद सबसे सफल बादशाह के तौर पर देखा गया और उसने फ़ारस की उस सल्तनत के उत्कर्ष के दौरान शासन किया.
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निर्दयी और शक्तिशाली
डेरेयिस ने 522 वर्ष ईसा पूर्व साइरस के बेटे बार्डिया से एक रक्तरंजित अन्दाज़ में सत्ता छीन ली थी और उस समय अत्यंत निर्दयी रवैया अपनाया जब उनकी सल्तनत में बग़ावतों का सिलसिला शुरू हुआ.
लगभग एक साल से कुछ अधिक अवधि में वह बाग़ी नेताओं को मात देने, हिरासत में लेने या क़त्ल करने में सफल हो चुके थे. अपनी सत्ता के बाक़ी 36 सालों के दौरान उन्हें कभी भी किसी और बग़ावत का सामना नहीं करना पड़ा.
प्राचीन फ़ारसी की किताबों में डेरेयिस की असीमित शक्ति और उसकी पूरे बल से रक्षा करने के बारे में पुष्टि उपलब्ध है.
एक ऐसे ही उल्लेख के अनुसार ज़रथ्रुस्टों के एक ख़ुदा अहोरा मज़दा ने डेरेयिस को "उस विशाल सल्तनत की बादशाहत प्रदान की थी, जिसमें अनेक समुदाय आबाद थे जिनमें फ़ारस, मीदिया और विभिन्न भाषाएं बोलने वाले समुदाय शामिल हैं. उन्हें पहाड़ों और निर्जन स्थलों, समुद्र की इस ओर और उसकी दूसरी ओर मरुस्थल के इस तरफ़ और उसकी दूसरी ओर भी सत्ता प्रदान की."
हालांकि डेरेयिस का दबदबा सिर्फ़ उसकी सैन्य शक्ति की वजह से नहीं थी. उन्होंने इस बात को भी सुनिश्चित किया कि पूरी सल्तनत में इंजीनियरिंग और निर्माण के योजनाएं पूरी की जाएं.
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मिस्र में उन्होंने नील नदी और लाल सागर के बीच एक नहर भी बनाई. ईरान के मध्य में उन्होंने पेरसेपोलिस में एक लंबा-चौड़ा निर्माण कार्यक्रम शुरू किया.
शोश (पश्चिमी ईरान) के शहर एलामाइट को नई जब प्रशासनिक राजधानी का दर्जा मिला तो उसे एक नया जीवन मिला.
तीस लाख वर्ग किलोमीटर में फैली सल्तनत चलाना दारा जैसे योग्य शासक के लिए भी बड़ी चुनौती थी.
इसके हल के लिए उन्होंने सल्तनत को प्रशासनिक राज्यों में विभाजित किया और फ़ारस के भद्रजनों के एक छोटे से समूह को सबसे ऊंचे पद दिए. राज्यों की व्यवस्था उन प्रमुख कारणों में से एक है कि वह इस महान सल्तनत को लंबी अवधि तक नियंत्रित कर सके.
फ़ारस की सल्तनत का इंफ्रास्ट्रक्चर भी इसके लिए काफी लाभदायक साबित हुआ. राज्यों को केंद्र के साथ सड़कों के ज़रिए जोड़ा गया.
दारा की सल्तनत का विस्तार उस युग की कलाकृतियों से भी उजागर होता है, जिनमें सल्तनत के विभिन्न भागों का सम्मिश्रण मिलता है. साथ ही उनके विशेष पहलू फ़ारस से एकताबद्ध होने का भी संदेश देते हैं.
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एक योद्धा और प्रशासनिक दृष्टि से उनके शासन को पश्चिम में कठोर रवैया के लिए याद रखा जाता है जिन्होंने मैराथन के युद्ध के दौरान यूनान पर विफल आक्रमण किया.
यूनान को अपनी सल्तनत में शामिल करना दारा का सपना ज़रूर था मगर यूनान और फ़ारस के बीच तनाव पर यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस की लेखनी से यूनान के प्रतिरोध और फ़ारस की प्रतिक्रिया अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है.
दारा की मौत 486 वर्ष ईसा पूर्व में हुई और उसके बाद सल्तनत को विस्तार देने का काम उनके बेटे ख़शयार शाह को मिला. अपने पिता की तरह उनके लिए भी यूनानियों से निपटना मुश्किल काम था.
उन्होंने 480 वर्ष ईसा पूर्व में एथेंस पर क़ब्ज़ा किया मगर उन्हें ज़मीन (प्लाती और मैकाली) और समुद्र (सालामेस) दोनों पर यूनानियों से बड़ी हार का सामना करना पड़ा.
उन्हें इस सच्चाई का सामना था कि यूनान कभी उनकी सल्तनत में शामिल नहीं हो सकेगा और इस तरह उन्होंने इस सपने को अधूरा छोड़ दिया और घर वापस आ गए.
लगभग डेढ़ सदी में आंतरिक विद्रोह हुए, मिस्र की विफलता और दोबारा हमला किया गया और सैदा (वर्तमान दौर के लेबनान) में बग़ावत को कुचला गया.
इन सभी संकटों के बावजूद 330 वर्ष ईसा पूर्व तक फ़ारस के प्रभाव और प्रभुत्व को चुनौती नहीं दी जा सकी. फिर यूनान में ऐसा व्यक्तित्व उभर कर सामने आया जिसने कुछ ही वर्षों में पूरी सल्तनत ए फ़ारस का तख़्ता उलट दिया और वह व्यक्तित्व था सिकंदर महान का. उन्हें रोकने की जिम्मेदारी दारा तृतीय की थी. उसमें विफलता ने सदा के लिए उनकी प्रसिद्धि को दाग़दार कर दिया है.
लेकिन दारा तृतीय एक बहादुर फौजी और योग्य शासक थे, जो सिकंदर महान के मिशन के सामने बड़ी रुकावट बन कर उभरे. लेकिन वह 333 वर्ष ईसा पूर्व और 331 वर्ष ईसा पूर्व में गोमगल की जंग में हार रोक ना सके.
दूसरी हार के बाद दारा तृतीय पश्चिमी ईरान में हगमताना फ़रार हो गए टुकड़ियों को जमा कर सके. यहां से बाख़तर गए जहां उन्हें उनके रिश्ते के भाई अर्दशीर पंचम ने क़त्ल कर किया.
330 वर्ष ईसा पूर्व में दारा तृतीय की मौत के बाद सल्तनत ए फ़ारस का ख़ात्मा हुआ और दुनिया के इतिहास में नए अध्याय का आरंभ हुआ, जिसमें सिकंदर महान ने ऐसी सल्तनत स्थापित की जिसके आगे फ़ारस भी छोटा लगे.
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शक्ति परिवार तक सीमित
विद्रोहों, सीमा विवादों, उत्तराधिकारी की लड़ाइयां और बादशाहों के क़त्ल के बावजूद सल्तनत ए फ़ारस ने दो दशकों से अधिक अवधि तक विशाल क्षेत्र पर राज किया जिसकी आबादी काफ़ी थी.
सवाल यह नहीं कि सल्तनत ए फ़ारस का ख़ात्मा क्यों हुआ बल्कि यह है कि यह इतनी लंबी अवधि तक कैसे टिकी रही?
इसका बुनियादी जवाब यही है कि शाही परिवार ने बादशाहत पर अपना नियंत्रण बरक़रार रखा था. बख़ामनशी परिवार ने इस सल्तनत को पारिवारिक कारोबार की तरह चलाया.
आंतरिक विद्रोह किए गए मगर इससे कोई राज्य टूट नहीं सका. बल्कि सवाल यही था कि परिवार का मुखिया कौन बनेगा और तख़्त पर कौन बैठेगा.
आज सल्तनत ए फ़ारस पर शोध में बहुत ही महत्वपूर्ण बातें सामने आ रही हैं. 1930 से फारसी स्रोतों से आलेख सामने आते रहे हैं. पुरातात्विक स्रोतों के विशेषज्ञों ने लगातार ऐसी चीजें प्राप्त कीं जिनसे वे सल्तनत का वर्णन बदलने पर मजबूर हुए.
जैसा के रॉबर्ट ग्रीव्ज़ कहते हैं कि अब ईरान के इतिहास को फ़ारस की पृष्ठभूमि में समझना संभव है.
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