जिहादियों को पश्चिम से नफ़रत क्यों?

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पेरिस हमलों के बाद पश्चिमी जगत फिर वही सवाल पूछ रहा है कि 'हम पर आख़िर हमला क्यों हुआ?'

यही सवाल 11 सितंबर के हमलों के बाद अमरीकियों ने पूछा था, "वे हमसे नफ़रत क्यों करते हैं?"

आज यूरोप के राजनेता, पत्रकार और विद्वान ये जानने की कोशिश में हैं कि इतने सारे मुसलमान युवा जिहादी या कट्टरपंथी क्यों बन रहे हैं?

जिहाद को बढ़ावा मिलने के पीछे धर्म, आर्थिक सपन्नता से वंचित रखा जाना और पश्चिमी देशों की विदेश नीति आदि कुछ संभावित कारण बताए जा रहे हैं.

जिस एक बात पर बहुत से लोग एकमत हैं, वो यह कि पश्चिम में इसे लेकर भ्रम की स्थिति है कि आख़िर इस्लामिक स्टेट से कैसे निपटें?

2003 में इराक़ पर अमरीकी हमले के बाद सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल किया गया था

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इमेज कैप्शन, 2003 में इराक़ पर अमरीकी हमले के बाद सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल किया गया था

यह भ्रम अरब जगत में लोकतंत्र को लेकर पश्चिमी जगत की सोच में दिखाई पड़ता है. 2003 में इराक़ हमले से कुछ हफ़्ते पहले अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था कि एक बार सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदख़ल कर दिया जाए तो फिर 'इराक़ पूरे मध्य पूर्व में लोकतंत्र का प्रकाशपुंज बन जाएगा'.

लेकिन पश्चिमी उदारवाद अपनाना तो दूर, इराक़ गृहयुद्ध में फंस गया. इससे पश्चिमी जगत में लोगों को सबक़ मिला कि आप किसी एक देश को ज़बरदस्ती लोकतांत्रिक बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

और इराक़ की स्थिति ने पश्चिमी जगत में कुछ लोगों को भरोसा दिलाया कि लोकतंत्र थोपना संभव नहीं है. लेकिन इसके बाद अरब जगत में क्रांति की लहर ने फिर इस मुद्दे पर बहस छेड़ दी कि क्या पश्चिमी जगत मध्य पूर्व में वाक़ई लोकतंत्र लागू कराना चाहता है?

या वह डरता है कि अगर मध्य पूर्व में लोकतंत्र आ गया तो उसके लिए इसके नतीजे क्या होंगे?

बहुत से पश्चिमी उदारवादियों की तरह दशकों से जिहादी भी यही कहते आए हैं कि लोकतंत्र को लेकर पश्चिमी जगत की बयानबाज़ी खोखली है.

वो पूछते हैं कि अगर पश्चिम को लोकतंत्र की इतनी ही परवाह है तो फिर मानवाधिकारों का हनन करने वाले सऊदी अरब के शासकों को क्यों पश्चिम का समर्थन मिलता है?

सवाल ये भी उठाया जाता है कि मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को क्यों अमरीका की तरफ़ से आर्थिक मदद दी जाती थी?

आलोचकों का कहना है कि मध्य पूर्व में लोकतंत्र को लेकर पश्चिम का रुख सिर्फ़ ज़ुबानी जमा खर्च है जबकि वो निरंकुश शासकों का समर्थन करता रहा है

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इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथ में सत्ता आने का डर मध्य पूर्व में सबसे ज़्यादा शायद इसराइल में महसूस किया जाता है.

इसराइल मध्य पूर्व का सबसे विकसित देश हो सकता है, लेकिन सोचिए अगर इसराइल से बैर रखने वाले बहुत से अरब देशों में लोकतंत्र आ जाए तो इसराइल के प्रति उनका लोकतांत्रिक रवैया क्या होगा?

अगर मध्य पूर्व की सरकारें वो करने लगें जो उनके नागरिक चाहते हैं तो इसराइल मुश्किल में पड़ जाएगा.

लोकतंत्र को लेकर पश्चिमी बयानबाज़ी की कलई फ़लस्तीनी संगठन हमास के मामले में खुल जाती है.

हमास ने 2006 में गज़ा पट्टी में चुनाव जीता, लेकिन इसराइली और पश्चिमी अधिकारियों ने हमास के नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों से इसलिए मिलने से मना कर दिया, क्योंकि इसराइल को तबाह करना उनके लक्ष्यों में शामिल है.

चंद महीनों के भीतर हमास के बहुत से नवनिर्वाचित प्रतिनिधि इसराइल की जेलों में थे.

मुरसी मिस्र में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए पहले राष्ट्रपति थे, लेकिन सेना ने उन्हें सत्ता से बेदख़ल कर दिया

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मौजूदा दौर की बात करें, तो अरब जगत के कई देशों में भी सरकार विरोधी व्यापक प्रदर्शनों ने दशकों से सत्ता में बैठे शासकों को तो बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन अब भी वहां हालात स्थिर नहीं हो पाए हैं.

इनमें मिस्र से लेकर लीबिया, ट्यूनिशिया और यमन का नाम लिया जा सकता है जबकि सीरिया में बरसों से जारी गृहयुद्ध लगातार पेचीदा हो रहा है.

मिस्र में होस्नी मुबारक को सत्ता से बाहर किए जाने के बाद हुए चुनावों में कट्टरपंथी मुस्लिम ब्रदरहुड की जीत ने एक बार फिर पश्चिमी जगत की दुविधा को उजागर किया.

ये बात भी ग़ौर करने वाली है कि इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा, दोनों ही मुस्लिम ब्रदरहुड के इस रुख़ की आलोचना करते हैं कि कट्टरपंथियों को चुनावों के ज़रिए सत्ता हासिल करने का प्रयास करना चाहिए.

वैसे, सऊदी अरब और खाड़ी देशों के निरंकुश शासक पश्चिम को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वो इस बात का जोखिम नहीं उठा सकते कि मिस्र में राष्ट्रपति मोरसी के नेतृत्व में मुस्लिम ब्रदरहुड का शासन हो.

ऐसे में, फिर एक बार प्रदर्शनों के बाद मिस्र की सेना का शासन ही उन्हें एक सुरक्षित विकल्प नज़र आता है.

सीरिया में इस्लामिक स्टेट से निपटने के तौर तरीकों पर भी विश्व समुदाय बंटा नज़र आता है

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कुछ ऐसे ही विरोधाभास अब सीरिया में नज़र आते हैं. पश्चिमी जगत राष्ट्रपति बशर अल-असद की सत्ता से विदाई तो चाहता है लेकिन ऐसा करने से डरता भी है क्योंकि क्या पता, उनके बाद क्या हालात पैदा होंगे?

सवाल कई हैं. सीरिया में चुनाव हुए तो क्या नतीजा सामने आएगा? क्या सुन्नी चरमपंथी सत्ता में आ जाएंगे? क्या हालात पश्चिम के लिए अनुकूल होंगे? और इसराइल का क्या होगा?

इन सब हालात के बीच पश्चिम को आईएस और अल-क़ायदा को भी हराना है और मध्य पूर्व में लोकतंत्र, आज़ादी और सुरक्षा से जुड़े मूल्यों को भी बढ़ावा देना है, लेकिन आगे जाकर उसके नतीजे क्या निकलेंगे, इस बात को लेकर भी डर साफ़ दिखता है.

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