'हाफ़िज़ सईद पर फिल्म बनाई.. अब भुगतो'

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कबीर ख़ान की फ़िल्म 'बजरंगी भाईजान' को पाकिस्तान में हाथों-हाथ लिया गया मगर ज़रूरी तो नहीं कि उनकी अगली फ़िल्म 'फैंटम' का भी वैसा ही स्वागत हो.
मुंबई हमलों के मुजरिमों की खोज के विषय पर बनी 'फैंटम' के हीरो सैफ़ अली ख़ान की एक पुरानी फ़िल्म 'एजेंट विनोद' को पाकिस्तान में दिखाए जाने की इजाज़त नहीं मिली थी.
लगता है कि सैफ़ मियाँ इस बार भी कराची, लाहौर और इस्लामाबाद में अपना जलवा नहीं दिखा पाएंगे.
इसकी वजह पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड से ज़्यादा ख़ुद 'फैंटम' की प्रोडक्शन टीम है.
आखिर कबीर ख़ान ने जमात-उद-दावा के नेता हाफ़िज़ मोहम्मद सईद को फ़िल्म में क्या सोचकर कास्ट किया...अब भुगतो.
हाफ़िज सईद की याचिका

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हाफ़िज़ सईद ने पाकिस्तान के लाहौर हाई कोर्ट में ये याचिका डाल दी है कि 'आतंकवाद' को बहाना बनाकर दरअसल कबीर ख़ान ने पाकिस्तान और जमात-उद-दावा को बदनाम करने की कोशिश की है इसलिए पाकिस्तान में 'फैंटम' की नुमाइश रोकी जाए.
मैं तब से सोच रहा हूँ कि पाकिस्तान छोड़कर जहाँ जहाँ भी ये फ़िल्म दिखाई जाएगी वहाँ वहाँ हाफ़िज़ सईद कैसे फ़िल्म रुकवाएँगे.
और ख़ुद पाकिस्तान में भी लोग बाज थोड़े ही आएंगे. सिनेमा में नहीं देख सकेंगे तो 35 रुपए की सीडी पर बदनामी देखेंगे. तो फिर चुपक चुपके बदनाम होने से अच्छा नहीं है कि एक बार मुन्नी की तरह खुलकर बदनाम हो लिया जाए.
और जब हाफ़िज़ सईद ने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो फिर बदनामी कैसी, जलने वाले जला करें.
बहरहाल, ये कबीर ख़ान और हाफ़िज़ सईद का आपसी मामला है, कैसे सुलटेगा..हमें क्या.
गीता की मुश्किल

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कबीर ख़ान की 'बजरंगी भाईजान' के बाद से यहाँ कराची के ईधी ट्रस्ट में 12 साल से रहने वाली 23 साल की गीता के मामले पर जो हलचल हुई वो किसी फ़िल्म से कम नहीं.
एक वक़्त था कि गीता का एक भी दूर का ही सही कोई रिश्तेदार सामने नहीं आ रहा था, और अब चार-चार खानदान कह रहे हैं कि गीता हमारी बेटी है.
अब अब्दुस सत्तार ईधी की बेगम बिल्कीस ईधी इस उधेड़बुन में हैं कि क्या करें?
कहीं ये न हो मंटो की कहानी 'टोबा टेक सिंह' के हीरो की तरह गीता भी आखिर में तंग आकर कह बैठे कि मुझे न हिन्दुस्तान में रहना है, न पाकिस्तान में...मुझे तो बस ईधीस्तान में रहना है.
गीता की आदतें

वैसे भी पिछले 13 साल में गीता की आदतें काफ़ी बिगड़ चुकी हैं. वो अपने कमरे में बने छोटे से मंदिर में भगवान की पूजा भी करती है और रोज़े भी रखती है.
इसलिए मुझे जैसों की सलाह ये है कि गीता को भारत और पाकिस्तान दोनों अपना नागरिक मान लें. वो जब मन चाहे आए, जाए.
कहते हैं अक्लमंद को इशारा काफ़ी है और भगवद् गीता की तरह हमारी गीता भी इशारों में बात करती है. है कोई गज भर की ज़बान वाला जो बेज़बान गीता का इशारा समझ सके?
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