अमरीकी कंपनी सिस्को में एक दलित कर्मचारी के साथ कथित भेदभाव
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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन
"जब मैं अपनी बेटी को संगीत की कक्षा में ले गई, तो शिक्षक ने बताया कि कुछ ही समुदाय के लोगों में संगीत सीखने की क़ाबिलियत होती है और उसके बाद उन्होंने हमारी जाति के बारे में पूछा."
"दलित पुजारी क्यों नहीं हो सकते? जब मैंने यह सवाल सवर्ण समुदाय के एक दोस्त से पूछा और कहा कि किसी को मंदिर में प्रवेश से रोकना ठीक नहीं है, तो मेरे उस दोस्त ने कहा कि ब्राह्मण तेज़ बुद्धि वाले और स्वच्छ होते हैं. उसके मुताबिक़ दलित साफ़-सफ़ाई से नहीं रहते हैं, नियमित नहाते नहीं हैं, इसलिए वे केवल टॉयलेट साफ़ करने के लिए उपयुक्त होते हैं."
ये कुछ उदाहरण भर हैं, उन 60 गवाहियों में से जो अमरीका में रहने वाले भारतीयों ने दर्ज कराए हैं. अमरीका स्थित आंबेडकर किंग स्टडी सर्किल (एकेएससी) ने दो से तीन सप्ताह के बीच 60 लोगों के अनुभवों को एकत्रित किया है.
कैलिफ़ोर्निया के डिपार्टमेंट ऑफ़ फ़ेयर इंप्लायमेंट और हाउसिंग ने टेक्नालॉजी की दुनिया की बड़ी कंपनी सिस्को में एक दलित कर्मचारी के साथ जातिगत भेदभाव करने के चलते 30 जून को मुक़दमा दर्ज कराया है. इसके एक दिन बाद 60 लोगों के अनुभवों को प्रकाशित किया गया है.
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आंबेडकर किंग स्टडी सर्किल ने अपने दस्तावेज़ों में आरोप लगाया है कि सिस्को कोई भी क़दम उठाने में नाकाम रही, जो जाति, स्टेटस, अनुष्ठानिक शुद्धता और सामाजिक बहिष्कार के आधार पर असमानता को दूर करने में सफल होती.
इस क़ानूनी नोटिस में बताया गया है कि किस तरह कंपनी दो सवर्णों को पीड़ित का उत्पीड़न करने की छूट दे रही थी.
सिस्को ने कहा है कि वह अपने ख़िलाफ़ लगे आरोपों पर पूरी तरह अपना बचाव करेगी.
वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ यह एक महत्वपूर्ण मामला है, जिसमें पहली बार किसी सरकारी संस्था ने जातिगत भेदभाव के चलते अमरीकी कंपनी पर मुक़दमा दर्ज किया है.
न्यूयार्क में रहने वाली लेखिका यशिका दत्त कहती हैं, "इससे यह फ्रेमवर्क बना है जिसके चलते जातिगत भेदभाव का मामला नस्लीय भेदभाव, लैंगिक भेदभाव, सेक्शुअल रुझान को लेकर भेदभाव और विकलांगता को लेकर होने वाले भेदभाव के स्तर तक पहुँच गया है."
कोलंबिया यूनिवर्सिटी की स्नातक यशिका ने 2016 तक दुनिया से अपनी जातीय पहचान छिपा कर रखी थी, लेकिन जब उन्होंने पीएचडी के छात्र रोहित वेमुला का आत्महत्या से पहले लिखा गया पत्र पढ़ा, तो उन्होंने सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर लोगों को बताया कि वह दलित हैं.
26 साल के रोहित वेमुला ने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी कैंपस में वर्ष 2016 में आत्महत्या कर ली थी.
यशिका को अपने पोस्ट पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ मिलीं, जिसमें वह दलित जैसी नहीं दिखती हैं, दलित लड़की कोलंबिया कैसे पहुँच गईं, जैसी प्रतिक्रियाएँ भी शामिल थीं.
भारत पर भी दबाव?
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यशिका बताती हैं, "मैं दबी कुचली नहीं दिखती. जैसे दलित दिखते हैं, मैं उस खाँचे में फ़िट नहीं बैठती."
यशिका को यह भी लग रहा है कि इस मामले से भारत सरकार पर भी जाति को लेकर दबाव बढ़ेगा.
यशिका बताती हैं, "सिस्को मामले से अमरीका में क़ानून बदल सकता है, ज़्यादा से ज़्यादा लोग जाति को समझ रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय जाति पर उतना ध्यान नहीं देती है, जितना नस्ल पर देती है, इस अंतर को दूर करने के लिए भारत सरकार को भी काफ़ी ध्यान देना होगा."
हिंदूवादी समूह हिंदू अमरीकी फ़ाउंडेशन (एचएएफ़) के सुहाग शुक्ला ने कहा कि वह आरोपों से भयभीत हैं, लेकिन जिस तरह से शिकायत फ़्रेम की गई है, वह गंभीर चिंता का मामला है.
सुहाग शुक्ला ने कहा, "ये उस ग़लत और ख़तरनाक धारणा को बढ़ावा देता है कि जाति हिंदुओं में ही होती है और ये हिंदू शिक्षा का हिस्सा है."
"हमने देखा है कि दक्षिण एशियाई मुस्लिम, बांग्लादेशी, नेपाली और श्रीलंकाई समुदाय में भी जातीय पहचान होती हैं."
आलोचकों के मुताबिक़ एचएएफ़ समूह नहीं चाहते कि जाति व्यवस्था को केवल हिंदू धर्म के चलन से जोड़कर देखा जाए और हिंदुत्व और भारतीय जाति व्यवस्था को ज़्यादा तूल नहीं दिया जाए.
अमरीका में कम समझ
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अमरीका में हिंदुओं की जाति व्यवस्था को लेकर समझ कम है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ इसके चलते अमरीकी कंपनियों की एचआर पॉलिसी में जातिगत भेदभाव का ज़िक्र नहीं होता है.
क़ानूनी नोटिस में कहा गया, "ख़राब स्थिति यहाँ तक है कि सिस्को ने ऐसे व्यवहार को मानने तक से इनकार कर दिया है."
यह स्थिति तब है, जब सिस्को में बड़े पैमाने पर भारतीय काम करते हैं.
हार्वर्ड के विद्वान सूरज येंगडे इस मामले को अमरीकी प्रणाली की जातिगत समृद्धि से जोड़कर देखते हैं.
उन्होंने कहा, "यह अमरीकी लोकतंत्र की नाकामी है."
आंबेडकर किंग स्टडी सर्किल के सह-संस्थापक कार्तिकेयन षणमुगम के मुताबिक़ इन गवाहियों को प्रकाशित करके उनका समूह अमरीका में जातिगत भेदभाव के मुद्दे को दर्ज कराना चाहता था.
वैसे यह महज़ संयोग की बात है कि कार्तिकेयन 2014 में मिसिसिपी के जैक्सन स्टेट यूनिवर्सिटी में थे, जहाँ ग़ुलामों और ग़ुलामों के ख़रीद बिक्री करने वालों का इतिहास दर्ज था.
उनका कहना है कि उन्हें तब महसूस हुआ कि दलितों के साथ हुए उत्पीड़न का इतिहास एकदम ग़ायब है, जबकि वह अमरीका में भी हुआ है.
2016 में कैलिफ़ोर्निया टेक्स्ट बुक विवाद को लेकर भी उनके विचार मज़बूत होते गए. इस विवाद में किताबों में जाति व्यवस्था को रेखांकित करने का पहलू भी शामिल था.
उनका कहना है कि इन घटनाओं के चलते आंबेडकर किंग स्टडी सर्किल ने हिंदुवादी लोगों को वैचारिक स्तर पर चुनौती देने का विचार बनाया.
अमरीका में सवर्ण भारतीय
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भारतीय मूल के 45 लाख लोग अमरीका में रहते हैं. सिस्को वाले मामले में क़ानूनी नोटिस में कहा गया है, "अमरीका में रहने वाले ज़्यादातर भारतीय सवर्ण जातियों से हैं."
इसमें कहा गया है, "उदाहरण के लिए, 2003 में अमरीका में रह रहे भारतीयों में केवल 1.5 प्रतिशत लोग ही दलित या पिछड़ी जातियों से थे. 90 प्रतिशत से ज़्यादा लोग सवर्ण और प्रभुत्व रखने वाले वर्गों से थे."
सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ जातिगत प्रभुत्व आज के समय में भी नज़र आता है, चाहे वह नौकरी की बात हो या फिर कारोबार चलाने की बात या फिर राजनीति में जगह बनाने की बात हो.
दलितों के एडवोकेसी ग्रुप इक्विटी लैब ने 1500 लोगों से बातचीत के आधार पर 2016 में कहा था, "20-25 साल पहले यहाँ आने वाले लोगों में 50 प्रतिशत से ज़्यादा लोग ब्राह्मण और सवर्ण जातियों से थे."
इस रिपोर्ट में कहा गया है, "इन लोगों को दलित और पिछड़ी जातियों की तुलना में एक बढ़त हासिल थी, ख़ास कर उन लोगों को जो 20 साल पहले अमरीका आए थे."
जो लोग अमरीका आए, उनमें से कई अपनी जाति को भी साथ ले आए.
सूक्ष्म भेदभाव
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भारत में ऐसे ढेरों मामले सामने आते रहे हैं, जहाँ दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया, उन्हें अपमानित किया गया या फिर उनकी हत्या कर दी गई. यह सब तब होता है कि जब भेदभाव के ख़िलाफ़ देश में सख़्त क़ानून है.
सूरज येंगडे ने कहा, "अमरीका में, भेदभाव सूक्ष्म स्तर पर होता है, त्योहारों में होता है, आप क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, इन सबसे होता है. लोग पीठ पर हाथ मारकर जेनऊ टटोलने की कोशिश करते हैं, जाति का पता लगाने की कोशिश करते हैं."
2014 में अमरीका आए कार्तिकेयन कहते हैं, "बीफ़ को दलितों से जोड़कर देखा जाता है, जबकि बीफ़ नहीं खाने वाले दलितों की अच्छी ख़ासी संख्या है."
दलित अपने साथ होने वाले बहिष्कार, करियर में भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत करते हैं.
एक शख्स ने बताया कि दलित अमरीका में जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए आते हैं, लेकिन डरावना यह है कि उनके बच्चों को उसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जैसा कि उनके माता पिता को करना पड़ा था.
2016 की इक्विटी लैब्स रिपोर्ट में कहा गया है कि क़रीब 25 फ़ीसदी दलितों को जाति के चलते शारीरिक या मौखिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है.
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तीन दलित छात्रों में एक के साथ शिक्षा के दौरान भेदभाव होता है. कार्यस्थलों पर तीन दलितों में से दो को भेदभाव का सामना करना पड़ता है. जबकि 60 प्रतिशत दलितों को जाति से जुड़ी अपमानजक टिप्पणियाँ या मज़ाक़ सुनने को मिलता है.
सुहाग शुक्ला कहती हैं, "यह सुखद है कि वे अपनी मज़बूत जातीय पहचान को क़ायम रखे हैं. हो सकता है कि यह बातचीत में आ जाता हो लेकिन अमरीका में रह रहे भारतीयों की दूसरी पीढ़ी होने के चलते जो पचास साल के हो रहे हैं, मैंने नहीं देखा कि 70 के दशक में बने मंदिरों में या सांस्कृतिक-भाषाई संगठनों में जाति देखी जा रही हो."
आलोचकों का मानना है कि जब जाति को लेकर बात होती है तो कुछ हिंदूवादी संगठनों को लगाता है कि 'हिंदुत्व ख़तरे में है.'
दलितों का कहना है अक्सर जाति से करियर में ऊपर जाने में मदद मिलती है और आईआईटी, बिट्स पिलानी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से निकले ऊँची जाति के छात्र अपने में तालमेल रखते हैं.
तमिलनाडु के एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर अशोक (बदला हुआ नाम) ने कहा, "मैंने देखा है कि कैसे जाति के ज़रिए समर्थन जुटाया जाता है."
वो कहते हैं कि जाति के नाम पर नौकरियों में रेफ़रेंस मिलने में मदद मिलती है.
अब अमरीकी और रूसी लोगों से भरी एक कंपनी में काम करने वाले अशोक ने कहा, "सॉफ़्टवेयर इंडस्ट्री में, नाकामी बड़ी आसानी से हो जाती है, एक ग़लती हुई नहीं कि आपका करियर दाँव पर चला जाता है. लेकिन जाति के नाम पर चलने वाले गुट लोगों को बचा लेते हैं. जाति के नाम पर लोगों को परफ़ॉर्मेंस रिव्यू से भी बचा लिया जाता है."
वो कहते हैं, 'बहुत सारे दलित करियर का ख़याल कर अपने साथ होने वाले भेदभाव को रिपोर्ट नहीं करते.''
अशोक कहते हैं, "अगर आप ऊँची जाति के भारत के लोगों में जाति की चर्चा करें, तो ये लोगों के साथ द्वेष रखने का एक ज़रिया है. मुझसे एक बार पूछा गया कि तुम दिवाली क्यों नहीं मनाते, क्या तुम हिंदू नहीं हो? उन्हें लगता है कि ऊँची जाति के लोग जो संस्कृति मानते हैं, वही हिंदू संस्कृति है. वो अपनी संस्कृति हमपर थोपते हैं."
एकेएससी के सह-संस्थापक कार्तिकेय सिस्को मामले को लेकर शीर्ष 50 आईटी कंपनियों के सीईओ को एक 'एकजुटता बयान' भेजने की तैयारी कर रहे हैं.
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