'कश्मीर क़ानून एवं व्यवस्था की समस्या नहीं'

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कश्मीर में विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता यूसुफ़ तारिगामी कहते हैं कि भारत के लोगों को कश्मीर के बारे में सही जानकारी नहीं है. "ये सवाल केवल पाकिस्तान का मसला नहीं. ये एक क़ानून एवं व्यवस्था की समस्या नहीं. ये विकास का मसला नहीं है. ये कश्मीरी अवाम का मसला है. ये समस्या दशकों से चली आ रही है. इसका इलाज होना चाहिए"

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भारत प्रशासित कश्मीर घाटी में पिछले 45 दिनों से कर्फ़्यू है. कश्मीर में 8 जुलाई से ख़राब हुए हालात ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है. हिंसा में अब तक 60 के क़रीब प्रदर्शनकारी मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं.

तारिगामी के अनुसार कश्मीरियों के अंदर ग़ुस्सा है. "ये जो लावा बन रहा है बार-बार, ये लावा राजनीतिक उथलपुथल की अक्कासी करता है. हमने प्रधानमंत्री से कहा कि इस ग़ुस्से को समझने की ज़रुरत है."

सोमवार को जम्मू-कश्मीर के प्रमुख विपक्षी दलों के जिन सदस्यों ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से राज्य के हालात पर चर्चा की उनमें से एक अहम वामपंथी नेता थे यूसुफ़ तारिगामी. जम्मू-कश्मीर विधानसभा में वो अकेले वामपंथी दल के सदस्य हैं और दक्षिण कश्मीर के कुलगाम छेत्र से निर्वाचित हुए हैं.

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वो आगे कहते हैं, "अगर इस ग़ुस्से के तह तक नहीं गए, अगर इसका समाधान नहीं किया तो कश्मीरी लोगों का ख़ून बहता तो रहेगा लेकिन देश को भी काफ़ी नुक़सान होगा."

यूस़ुफ़ तारिगामी कश्मीर के एक मंझे हुए, अनुभवी नेता हैं. उनका कहना है कि कश्मीर के मसले का हल केवल बात चीत से हो सकता है. "हम ने प्रधानमंत्री से कहा कि बात चीत का सिलसिला शुरू कीजिये. कश्मीरी अवाम से संपर्क बढ़ाइए". कश्मीरी विपक्षी नेताओं के दल को प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि देश के संविधान के दायरे में रह कर सभी पक्ष से बात चीत होनी चाहिए.

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यूसुफ़ तारिगामी कहते हैं कि राज्य के सभी स्टेकहोल्डर से बात चीत करनी चाहिए. "भारत में कुछ लोगों का सुझाव है कि जम्मू को अलग कर दिया जाए. ये एक ख़तरनाक सलाह है. जम्मू और कश्मीर एक अटूट राज्य है जिसके विभाजन से वही परिणाम निकलेंगे जो 1947 में देश के विभाजन से निकले थे.

यूसुफ़ तारिगामी के अनुसार केंद्र सरकार को इस बात से परेशान होने की ज़रुरत हैं है कि घाटी में जनता आज़ादी के नारे दे रही है. उनका कहना है कि वो उनके ग़ुस्से का इज़हार है. वो कहते हैं कि घाटी में माहौल को ठंडा करने के लिए वहां के सभी लोगों से संपर्क करना चाहिए. अलगावादी हुर्रियत कांफ्रेंस से भी बात चीत करनी चाहिए ठीक उसी तरह से जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था.

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