इन 5 के आगे बेबस हुआ भारतीय कानून

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साल 2008 में हुए मुंबई चरमपंथी हमलों के अभियुक्त डेविड हेडली उर्फ़ सैयद दाऊद गिलानी ने मुंबई की एक अदालत के सामने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही दी है.

गवाही में हेडली ने स्वीकार किया है कि मुंबई हमलों से पहले वो सात बार मुंबई आया था और उसने वहां एक फ़र्ज़ी ट्रेवल एजेंसी भी खोली थी.

कुछ साल पहले शिकागो की एक अदालत को हेडली ने बताया था कि वो एक और हमले की तैयारी के सिलसिले में मुंबई हमलों के बाद भी भारत आया था.

अगला हमला दिल्ली के राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज में होना था जिसकी जानकारी जुटाने के लिए वो वहाँ गया था. लेकिन वो इस योजना को अंजाम नहीं दे सका.

एक चरमपंथी का भारत बार-बार आना और मुंबई हमलों के बाद एक संदिग्ध का वापस लौटकर एक और हमले की तैयारी बनाना हैरान करता है.

ये दिखाता है कि किस तरह भारत सरकार आपराधिक छवि के लोगों और प्रभावशाली अभियुक्तों को देश में लाकर मुकदमा चलाने और उन्हें दंड दिलाने में बार-बार असफल रही है.

इसीलिए भारत के बारे में दुनिया में एक धारणा बन गई है कि ये एक "सॉफ्ट स्टेट'' है. हेडली के साथ-साथ इस बाते कई और उदाहरण हैं.

इतालवी मरीन

भारत ने दो इतालवी नौसैनिक मैसिमिलानो लाटोरे और सल्वाटोर गिरोने के खिलाफ केरल के निकट अरब सागर में दो भारतीय मछुआरों की गोली मार कर हत्या करने का मुकदमा चलाया. ये मामला भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के अंदर 15 फ़रवरी 2012 को पेश आया.

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इनमें से गिरोने अभी भारत में हैं जबकि लाटोरे इटली में, जिन्हें इतालवी सरकार ने भारत वापस नहीं भेजा है. लाटोरे को जनवरी में ही भारत आना था, लेकिन भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वो चिकित्सीय आधार पर 30 अप्रैल तक इटली में रह सकते हैं.

इटली ने भारत के खिलाफ समुद्र के कानून के लिए अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाज़ा ये कहते हुए खटखटाया कि भारत में चल रहा मुक़दमा सही नहीं है. अब अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने एक पैनल बनाई है जिसका फैसला दोनों देशों पर बाध्य होगा.

इसी तरह, पिछले साल सऊदी अरब के एक राजनयिक के खिलाफ दो नेपाली महिलाओं के साथ बार-बार बलात्कार करने और उन्हें बंधक बनाने का इल्जाम लगाया गया. लेकिन उन्हें भारत सरकार ने राजनयिक प्रतिरक्षा के अंतर्गत वापस सऊदी अरब लौटने दिया.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरुप ने कहा कि सऊदी राजनयिक को वियना कन्वेंशन के तहत भारत में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था. इसलिए उसे वापस उसके देश भेज दिया गया.

यूनियन कार्बाइड के वॉरेन एंडरसन

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1984 के दिसंबर में भोपाल गैस हादसे में 20 हज़ार लोगों की मौत हुई थी.

गैस के रिसाव के लिए यूनियन कार्बाइड कंपनी को ज़िम्मेदार ठहराया गया और इसके अमरीकी अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन के खिलाफ मुक़दमा दायर किया गया.

वॉरेन एंडरसन को गिरफ्तार तो किया गया लेकिन तीन दिनों के बाद रिहा कर दिया गया और वो अमेरिका लौट गए. यूनियन कार्बाइड ने पीड़ितों को अपर्याप्त मुआवजा दिया जिसके लिए भारत सरकार की कड़ी आलोचना हुई.

भारत ने 2003 में वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए अमरीकी सरकार से मदद मांगी लेकिन अमेरिका ने इसे खारिज कर दिया.

इसके बाद 2009 में उनके खिलाफ गिरफ़्तारी के वारंट जारी किए गए लेकिन अमेरिका ने उन्हें भारत को लौटाने से इंकार कर दिया.

पुरुलिया हथियार ड्रॉप

17 दिसंबर 1995 को अचानक एक विमान ने सैकड़ों एके-47 राइफल और लाखों कारतूस पुरुलिया के गाँव में गिराए. बाद में विमान में सवार एक ब्रितानी और पांच लातवियाई नागरिकों को गिरफ्तार किया गया. इन्हें उम्र क़ैद की सजा सुनाई गई.

लेकिन मुख्य अभुयुक्त डेनमार्क के किम डेवी फरार होने में कामयाब हो गए. उन पर आरोप था कि ये हथियार आनंदमार्गियों के बीच बाटने के लिए थे जिनका मकसद पश्चिमी बंगाल की वामपंथी सरकार को अस्थिर करना था.

किम डेवी खुद एक आनंदमार्गी थे. लेकिन सीबीआई ने इस आरोप को रद्द कर दिया. बाद में रूस और ब्रिटेन के दबाव में आकर सरकार ने सभी गिरफ़्तार लोगों को रिहा कर दिया.

ओत्तावियो क्वात्रोच्चि और बोफोर्स घोटाला

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बोफोर्स घोटाले में इतालवी नागरिक ओत्तावियो क्वात्रोच्चि के खिलाफ कई इलज़ाम लगे. इनमें बोफोर्स सौदे में रिश्वत लेने का आरोप ख़ास था.

साल 1999 में सीबीआई ने उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल की. इंटरपोल ने 2003 में उनके दो ख़ुफ़िया बैंक खातों के बारे में जानकारी दी.

इसके बाद 2007 में अर्जेंटीना में क्वात्रोच्चि को गिरफ्तार किया गया लेकिन उनके भारत में प्रत्यर्पण के लिए सीबीआई पर अधूरे मन से कोशिश करने का इलज़ाम लगा.

इसलिए वो भारत नहीं लाए जा सके. माना जाता है कि क्वात्रोच्चि राजीव और सोनिया गांधी के जानकार थे हालाँकि कांग्रेस के नेताओं ने इस पर खुलकर कुछ नहीं कहा है.

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