गांव जहां संवेदनाओं का भी सूखा दिखा

सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव सूखे के बारे में किसानों से संवेदना जताने के लिए दक्षिण से उत्तर भारत के सफ़र पर हैं. मगर उत्तर प्रदेश के ज़िले महोबा के जिस गांव में हम पहुँचे वहां संवेदना का भी सूखा दिखाई पड़ा.

बुंदेलखंड के गांव बिला दक्षिण की कमलेश और उनके पति शिवरतन पुश्तैनी तौर पर सफ़ाई का काम करते रहे हैं. गांव की महिलाएं उन्हें छूना नहीं चाहतीं. कमलेश को इस बात का मलाल है कि आख़िर इंसान होने के बावजूद ऐसा क्यों है?

कमलेश मुझसे पूछती हैं, ''जो हमारी माताएं-बहनें हैं. अगर बच्चा छू जाए तो वो उसे नहलाती हैं. हमें क्या बुरा नहीं लगता साहब. क्या हमारा ख़ून खून नहीं है, क्या हम भोजन नहीं करते. क्या हम नहाते नहीं हैं. हमारे पास बहुत कम ज़मीन है और पैदावार नहीं है. मुनादी का काम करने से कुछ पैसा मिलता है.''

मुनादी का काम

गांव में जब से सरकारी सफ़ाईकर्मी तैनात किए गए हैं तब से कमलेश और शिवरतन के पास कोई काम नहीं. उनके पास बस एक ही काम बचा है - मुनादी. यानी गांव में किसी का आगमन, बच्चे की पैदाइश या किसी की मौत की घोषणा. इसके ऐवज़ में अगर गांव के लोग इन पति-पत्नी को कुछ दे देते हैं तो ठीक, नहीं तो कई बार उनके घर में चूल्हा जलाने को भी कुछ नहीं होता.

दोनों की उम्र क़रीब 55-60 वर्ष है. उनके पास थोड़ी सी ज़मीन है मगर पिछले दो साल से वो भी प्यासी है. उन्हें उस मुनादी के काम के एवज़ में भी कुछ नहीं मिलता, जो गांव वालों से उनकी आख़िरी उम्मीद है.

कमलेश की छोटी बेटी बीए में है, बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है और दो लड़के बाहर काम कर रहे हैं.

मुझे पता चला कि संवेदना यात्रा की मुनादी का काम भी गांव में रामरतन ने ही किया है. इसके बावजूद कमलेश को कोई उम्मीद नहीं थी कि उनके पति को इसका कोई पैसा मिलेगा.

अपनाने को तैयार नहीं

गांव उन्हें अपना मानने को तैयार नहीं लगता.

मैंने जब गांव की महिलाओं से पूछा कि लोग कमलेश से छुआछूत क्यों करते हैं तो इसका कोई सीधा जवाब नहीं मिला. हां, गांव की कई महिलाएं जो इससे पहले अपने दयनीय हालात के बारे में मुझे खुलकर बताने को बेताब थीं, अब मेरे इस सवाल से कन्नी काट रही थीं.

सूखे तालाब

बुंदेलखंड का गांव बिला दक्षिण भी दूसरे साल बारिश न होने से सूखा है. जितना चाहिए उतना पीने को पानी नहीं.

गांव के चार तालाब सूखे पड़े हैं. जानवरों को पानी पिलाने के लिए भी उन हैंडपंपों का इस्तेमाल होता है, जिनसे लोग पानी निकालकर पीते हैं. इनमें भी पानी डेढ़ सौ फ़ीट की गहराई में है.

नतीजा ये कि तिल, उड़द, मूंग और मूंगफली की फ़सल ख़त्म हो चुकी है.

बिला दक्षिण से लौटते हुए मन में एक सवाल बार बार कौंध रहा है. क्या सूखे की मार झेल रहे इस गांव के बाशिंदों के मन में कभी कमलेश और रामरतन के लिए हमदर्दी की बूंदें टपकेंगी.

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