'चुनाव ख़र्च का आधा वोटिंग के दिन ही ख़र्च'

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कुछ समय पहले राजनीतिक घराने के एक नेता से मेरी बड़ी खुली और बेबाक बातचीत हुई. वो उस समय विधायक थे और आज मंत्री हैं.
हमारी बातचीत का मुद्दा था राजनीति में भ्रष्टाचार और राजनेताओं द्वारा पैसे की ताक़त का इस्तेमाल किया जाना.
उन्होंने कहा था कि चुनाव प्रचार में किसी पार्टी द्वारा ख़र्च किया जाने वाला आधा पैसा मतदाताओं को सीधे रिश्वत के रूप में ख़र्च किया जाता है.
और इस धन का भी आधा हिस्सा वोटिंग के दिन दोपहर बाद ख़र्च किया जाता है.
ये पैसा उन लोगों को दिया जाता है जो उस समय तक जानबूझकर मतदान करने नहीं गए, ताकि पार्टियों से वो पैसा वसूल कर सकें.
इसलिए अक्सर चुनावों के दौरान नेताओं और उनके सहयोगियों के पास से भारी पैमाने पर नक़दी पाए जाने की ख़बरें आती हैं.
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बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी ने चुनाव में पैसे को लेकर एक सर्वे कराए जाने का निर्देश दिया था. इसी सिलसिले में मुझे ये बातचीत याद आ गई.
सर्वे में पता चला कि इसमें शामिल किए गए 80 प्रतिशत वोटरों का मानना था कि किसी को वोट देने के लिए उपहार या पैसा लेना न तो रिश्वत है और ना ही इसमें कुछ ग़लत है.
चौंकाने वाले नतीजों के बाद चुनाव आयोग ने बिहार में लोगों के इस रवैये के ख़िलाफ़ पोस्टर और रेडियो विज्ञापनों के ज़रिए अभियान शुरू किया.
सर्वे में 4,500 वोटरों को शामिल किया गया था. इस पर तैयार की गई रिपोर्ट से पता चलता है कि इसको बेहद वैज्ञानिक तरीक़े से कराया गया था.
सर्वे में शामिल होने वाले लोगों को इस तरह चुना गया था ताकि संतुलन बना रहे.
इसमें सबसे अधिक और सबसे कम मतदान करने वाले ज़िलों के लोगों को एक समान संख्या में शामिल किया गया. और ये काम चुनाव आयोग ने ख़ुद पहलक़दमी लेकर किया है. इसका मतलब है कि सर्वे के आंकड़े विश्वसनीय हैं.
मेरे जैसे इंसान के लिए यह कोई हैरानी वाली बात नहीं है और मैं नहीं मानता कि वोटरों का यह रवैया सिर्फ़ बिहार तक ही सीमित है.
मैंने जिस राजनेता का ऊपर ज़िक्र किया है, वो कर्नाटक से आते हैं.
रिश्वत देने का चलन

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कुछ साल पहले ऐसी ख़बरें आईं थीं कि किस तरह तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने मतदान के दिन अख़बारों में पैसे डालकर घर-घर पहुंचवाए थे.
किसी खास अख़बार को वही पढ़ते हैं जो किसी ख़ास विचारधारा को मानते हैं. और इसलिए राजनीतिक दलों द्वारा अपने संभावित मतदाताओं को पहचान पाना आसान था.
नेताओं द्वारा अक्सर वोटरों को खुलेआम कपड़े, शराब और अन्य चीज़ें बांटे जाने की ख़बरें छपती रहती हैं.
इसे इस तरह देखा जाता है कि इससे झुग्गियों में रहने वाले वोटरों को लुभाया जाता है और मध्यवर्ग इससे प्रभावित नहीं होता है.
लेकिन ऐसा कोई भी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है जो ये दिखाता हो कि रिश्वत का यह चलन केवल ग़रीबों तक ही सीमित है.
बिहार में चुनाव आयोग द्वारा कराया गया अध्ययन दिखाता है कि हमारे पास अपने ही समाज और उसकी कमियों के बारे में पर्याप्त विश्लेषण नहीं है.
ड्राइंग रूम और मीडिया में होने वाली बहसें राजनेताओं और सरकार पर तो केंद्रित होती हैं लेकिन इन बहसों में मुश्किल से ही हमारे रवैये पर बात होती है.
भ्रष्टाचार

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भ्रष्टाचार को ऐसी चीज़ समझा जाता है जिसका शिकार केवल आदमी है और वो इसमें शामिल नहीं होता है.
समाज में सुधार को सरकार और राजनीतिक दलों की ज़िम्मेदारी समझी जाती है.
बिहार के मामले में जो नई बात है वो केवल ये है कि इस तरह का सोचना बेहद मूर्खता भरा है.
इसके अलावा भी उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि भारतीय अपनी चोरी और अनैतिकता को बहुत सही मानते हैं.
केवल तीन प्रतिशत भारतीय इनकम टैक्स अदा करते हैं. इनमें भी बहुत बड़ी संख्या उन शहरी मध्यवर्ग के लोगों की है, जिनका टैक्स उनकी कंपनी में ही काट लिया जाता है.
इसके बावजूद लागू न होने वाले क़ानूनों की आड़ लेकर टैक्स चोरी और इससे बचने के उपाय किए जाते हैं.
और हक़ीक़त ये है कि अगर अपने आप टैक्स करने से छूट देकर इन कर्मचारियों से स्वेच्छा से टैक्स भरने के लिए कहा जाए तो टैक्स देने की यह दर और भी कम हो जाएगी.
मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो व्यवसाय चलाते हैं और लाखों कमाते हैं लेकिन पूरा टैक्स नहीं भरते. वे इसे एक वैध बक़ाया की बजाय ‘नुक़सान’ के रूप में देखते हैं.
'वोटरों ने राजनीति को भ्रष्ट किया'

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जब इस ओर इशारा किया जाता है तो अक्सर एक और बात कही जाती है कि सरकार पैसों का सही इस्तेमाल नहीं करती है इसलिए बिज़नेसमैन भी पैसा देने से हिचकते हैं.
यही उसूलों से भटकाव और अनैतिकता वोटरों में फैलती है तो हमें हैरान नहीं होना चाहिए.
अगर हम इसका सही विश्लेषण करें तो नतीजा यही निकलेगा कि असल में वोटर ही है जिन्होंने राजनीति को भ्रष्ट किया न कि राजनेता.
जो राजनीतिक दल साफ़ सुथरा चुनाव प्रचार चलाने की कोशिश करते हैं वो भारत जैसे देश में असफल हो जाएंगे.
यहां तक कि आम आदमी पार्टी के मंत्रियों ने भी रिश्वत लेना शुरू कर दिया है और इस बात को पार्टी ने ख़ुद माना है.
यह एक ऐसा भ्रष्ट दायरा है जो सिर्फ़ भारत जैसे देश में ही पैदा हो सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं.)
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