'सावरकर की किताब हिंदुत्व ने मुझे निराश किया'

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अधिकांश मध्यवर्गीय हिंदुओं, ख़ासकर गुजरातियों की तरह मैं भी राष्ट्रवाद और धर्म के बारे में कुछ ख़ास धारणाओं के साथ बड़ा हुआ हूँ.
कम उम्र में, हिंदुत्व के विचार की ओर आकर्षित होना बहुत आसान होता है क्योंकि इसका सार बहुत ही बुनियादी और निरपवाद होता है.
देश और संस्कृति के प्रति ज़ोर मारते प्यार पर यह टिका हुआ दिखता है और ये दोनों एक चीज़ से जुड़ी होती हैं और वो है हिंदू धर्म. इसलिए ‘हिंदू’ शब्द अपने में केवल धर्म को ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीयता और संस्कृति को भी अपने आप में समेटे हुए है.
और इन सबको हम सच के तौर पर मान लेते हैं क्योंकि कुछ महान लोगों ने ऐसा कहा है.
भारत में हम पढ़ने से ज़्यादा सम्मान करते हैं और इसीलिए लोगों की महानता के बारे में सोचना स्वाभाविक ही है क्योंकि आपको ये नाम आम तौर पर अनगिनत बार सुनाए जाते हैं.
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मैं अपनी 20-30 साल की उम्र में रहा होउंगा जब मैंने सावरकर की किताब हिंदुत्व पढ़ी और इसने मुझे निराश किया. मैं समझ नहीं सका कि उन्हें इतना महान क्यों माना जाता था.
मैंने पाया कि यह तो बहुत ही सामान्य किताब थी और इसमें कुछ भी नयापन नहीं था.
सावरकर ख़ुद भी बहुत विद्वान नहीं थे और इसमें दूसरे लेखकों का बहुत कम ही ज़िक्र था.
उनका मुख्य विचार था- राष्ट्र के प्रति बिना शर्त प्रेम, लेकिन जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ, यह ऐसी चीज़ है जो भारत में हम लोगों लिए बहुत आम बात है.
विवेकानंद के लेखों को पढ़ते हुए भी मुझे इस परेशानी से निजात नहीं मिली.
(उनकी संकलित रचनाएं, मुख्य रूप से भाषण और पत्र, आठ खंडों में हैं.)
जब मैंने गोलवलकर और आरएसएस विचारक दीन दयाल उपाध्याय को पढ़ा, उसके बाद ही मुझे ये साफ़ हो गया कि इन सबने जो लिखा था, वो हिंदुत्व के बारे में था.
विचारधारा

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ये उन लोगों के लिए एक विचारधारा थी जिनका दिमाग़ बंद था और यह बौद्धिकता से ज़्यादा जुनून से संबंधित थी.
यह खोज मेरे लिए एक संतोष का कारण थी, क्योंकि तबतक मैं इसके सार को नापंसद करने लगा था.
मैंने ये देखना शुरू कर दिया कि किस तरह हिंदुत्व को नकारात्मकता से भरा गया है.
इसकी तीन मांगें थीं- राम जन्मभूमि (मुस्लिमों को अपनी मस्जिद नहीं रखनी चाहिए), यूनिफ़ार्म सिविल कोड (मुस्लिमों को अपना अलग पारिवारिक क़ानून नहीं रखना चाहिए) और जम्मू एवं कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटा देना चाहिए (मुस्लिमों को अपनी संवैधानिक स्वायत्तता नहीं रखनी चाहिए).
ये तीनों ही मांगें हिंदुओं के लिए कुछ भी सकारात्मक नहीं हैं. हिंदुत्व की विचारधारा केवल असंतोष और नफ़रत ही देती है.
यह दूसरों को दोष देने और संदेह से देखने की विचारधारा है.
यह विचारधारा मानती है कि अन्य लोगों को, हमें नहीं, भारत को फिर से एक महान देश बनाने की कोशिश करनी चाहिए, ये मानते हुए कि कभी यह एक महान देश हुआ करता था.
संस्कृति

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मेरे लिए यह एक बचकाना बात थी और मैं इसे कभी मान नहीं सका.
अगर हिंदुत्व ने भारत और भारतीयों के जान माल का इतना नुक़सान नहीं किया होता तो मैं इसे और इसके विचारकों को नज़रअंदाज़ कर देता.
लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं किया जा सकता.
भारत के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ख़बरों में बहुत बने रहे हैं क्योंकि हिंदुत्व के विचार का बहुत सारा संस्कृति के बारे में है.
अर्थशास्त्र में इसका कोई योगदान नहीं है.
हिंदुत्व के अधिकांश समर्थक यह जानकर हैरान होंगे कि दीन दयाल उपाध्याय एक समाजवादी थे और आर्थिक मोर्चे पर उनके विचारों को भाजपा ने मनमोहन सिंह के भूमंडलीकरण की नीति के बाद, पूरी तरह उतार फेंका है.
योगदान

इसी तरह विज्ञान में भी हिंदुत्व का शून्य योगदान है और जब इस विचार को कोई चुनौती देता है तो हिंदुत्ववादी ग़ुस्सा हो जाते हैं और बुद्धिजीवियों की हत्या करने लगते हैं.
‘संस्कृति’ के अलावा इसका किसी भी ढंग की चीज़ में कोई योगदान नहीं है.
और संस्कृति के मामले में भी हिंदुत्व का आग्रह है कि उसका नज़रिया ही सही है.

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यही कारण है कि शर्मा जैसे लोग सुर्खियों में रहते हैं न कि विज्ञान मंत्री (जो भी हो) क्योंकि हिंदुत्व की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है.
अपने नाम के बावजूद इसकी दिलचस्पी हिंदुओं में नहीं है बल्कि मुसलमानो में है.
शर्मा ने कहा कि गीता और रामायण भारत की आत्मा के जितना क़रीब थे, बाइबिल और क़ुरान नहीं हैं.
इसके बाद उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के बारे में कहा, “औरंगज़ेब रोड का नाम भी बदलकर एक ऐसे महापुरुष के नाम पर किया गया है जो मुसलमान होते हुए भी इतना बड़ा राष्ट्रवादी और मानवतावादी इंसान था- एपीजे अब्दुल कलाम.”
हिंदुत्ववादी

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मुझे हैरानी नहीं है कि एक हिंदुत्वादी ऐसी बातें कर रहा है. मैं तो थोड़ा परेशान इसलिए हूँ कि मंत्री ने बचकानापन क्यों नहीं छोड़ा.
मैं जानता हूँ कि अपनी नौजवानी में वो क्यों धर्मांधता की ओर आकर्षित हुए क्योंकि मैं भी ऐसा ही था और मैं स्वीकार करता हूँ.
जब कोई अपने किशोरवय में होता है तो पूर्वाग्रह ग्रसित होना और दिमाग़ को बंद कर लेना आसान होता है.
लेकिन एक वयस्क को दुनिया को वयस्क की नज़र से देखना चाहिए, न कि तकरार करने वाले और मामूली स्कूली बच्चों की तरह.
हिंदुओं के लिए एक बहुत बड़ा फ़ायदा होता अगर हिंदुत्व विचारधारा मुस्लिमों के बारे में बातें करना बंद कर देती और इसकी बजाय हिंदुओं पर ध्यान देती
मैं तो ऐसी ही किसी विचारधारा को मानूंगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. लेखक आकार पटेल एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं.)
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