'मेक इन इंडिया' नहीं 'लूटो इंडिया'

माओवादी पार्टी का सम्मेलन (फ़ाइल फ़ोटो)

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी-सीपीआई माओवादी) ने नरेंद्र मोदी की सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश की आलोचना करते हुए ‘मेक इन इंडिया’ के नारे को 'लूटो इंडिया' की संज्ञा दी है.

पार्टी ने नरेंद्र मोदी के रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' की भी आलोचना की है.

सीपीआई माओवादी के केंद्रीय प्रवक्ता अभय ने एक बयान में कहा है कि अध्यादेश को नौ छोटे-मोटे संशोधनों के साथ लोकसभा में पारित किया गया है. लेकिन संशोधन विधेयक में किसानों और आदिवासियों के हितों के नुक़सान वाले प्रावधान यथावत हैं.

हालाँकि नरेंद्र मोदी सरकार ये दावा करती है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक किसान विरोधी नहीं है और किसानों को गुमराह किया जा रहा है.

किसानों के मुद्दे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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प्रवक्त अभय का कहना है कि प्रधानमंत्री ने 22 मार्च को अपने 'मन की बात' कार्यकम में न केवल किसानों, बल्कि पूरे देश को गुमराह करने की नाकाम कोशिश की. उन्होंने किसानों के ज्वलंत मुद्दों को छुआ तक नहीं.

प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर सफेद झूठ बोला. इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों को भी अध्यादेश का विरोध करना पड़ा.

माओवादी पार्टी ने बयान में कहा है कि मोदी अब 'मेक इन इंडिया' के बहाने कॉरपोरेट घरानों के मुनाफ़े के लिए देश के जल-जंगल-ज़मीन और संसाधनों ख़ासकर किसानों व आदिवासियों की ज़मीन को कौड़ियों के भाव आसानी से व बेरोकटोक उपलब्ध कराने की साजिश कर रहे हैं.

सामाजिक प्रभाव

माओवादी

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अभय ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण से समाज पर असर के आकलन से भी छूट दी गई. इससे जाहिर है कि अब किसान अपनी ज़मीन का मालिक नहीं रहा. उसकी जमीन के अधिग्रहण के संबंध में फ़ैसला पूरी तरह सरकार लेगी.

सीपीआई (माओवादी) का कहना है कि सरकार पूंजीपतियों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण कर रही है.

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इमेज कैप्शन, सीपीआई (माओवादी) का कहना है कि सरकार पूंजीपतियों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण कर रही है.

माओवादी नेता ने आरोप लगाया कि गुजरात में इस तरह की छूट के बिना ही अदानी ने परियोजना के लिए मिली ज़मीन को बेच कर करोड़ों रुपए का मुनाफ़ा कमा लिया. ऐसे में इस क़ानून के बाद की स्थितियों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

माओवादी नेता ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश संविधान में आदिवासियों को मिले अधिकारों के उल्लंघन की सबसे बड़ी मिसाल है.

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