क्या हो रही है बदले की राजनीति?

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क्या ये सही है कि जब भी कोई नई सरकार सत्ता सँभालती है तो वो अपने प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने का काम करती है? ऐसा है या नहीं इस पर बहस जारी है.
मौजूदा बहस नेशनल हेराल्ड अख़बार वाले मामले से शुरू हुई है जिसको लेकर कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी की सरकार पर बदले की भावना से राजनीति करने का आरोप लगाया है.
इस मामले में कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी के ख़िलाफ़ अदालत में भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने मामला दायर किया है.
मगर कांग्रेस को लगता है कि सत्ता हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी उसके नेताओं और खासतौर पर गांधी परिवार को निशाना बना रही है.
इस मामले में विभिन्न पक्षों का क्या कहना है और क्या है स्वतंत्र पत्रकारों की राय?
पढ़िए सलमान रावी की पूरी रिपोर्ट
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव भक्त चरण दास का कहना है कि अहम मुद्दों और चुनावी वादों को ताख़ पर रखकर नेशनल हेराल्ड के मामले को अकारण बहस का मुद्दा बनाया जा रहा है.
भक्त चरण दास

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यूपीए सरकार के कार्यकाल में विकास दर 8.6 प्रतिशत थी तो सरकार को अपदस्थ करने की कोशिश दो-तीन सालों तक की जाती रही.
उस वक़्त भी गांधी परिवार को निशाना बनाया जा रहा था. अहम मुद्दों को दरकिनार करके, उन वादों को किनारे करके जो उन्होंने चुनाव में किए थे, एक बार फिर ध्यान हटाकर गांधी परिवार को ही निशाना बनाया जा रहा है.
बढ़ती हुई महंगाई के मुद्दे को ताख़ पर रखकर गांधी परिवार के ख़िलाफ़ अकारण बहस छेड़ी जा रही है. वह किसी भी तरह का विपक्ष नहीं रहने देना चाहते हैं. यह लोकतंत्र के लिए सही नहीं है.
मगर याचिका दायर करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि अगर कोई मामला वित्तीय अनियमितता का हो तो उसे अदालत तक ले जाना विद्वेषपूर्ण राजनीति नहीं है.
सुब्रमण्यम स्वामी

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स्वामी कहते हैं कि अदालत ने ख़ुद ही ऐसे आरोपों को ख़ारिज किया है. ऐसी दलीलें वे लोग देते हैं जिनके पास तर्क करने की हिम्मत नहीं है. इसका कोई सबूत नहीं है कि सब कुछ बदले की भावना से किया जा रहा है.
अब अगर भ्रष्टाचार होगा तो क्या आवाज़ न उठाई जाए? अगर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो क्या इसे बदले की भावना से की गई कार्रवाई कहेंगे? अनियमितता हुई है, पार्टी के फंड का ग़लत इस्तेमाल हुआ है. ग़लत तरीक़े से संपत्ति को हड़पने का प्रयास हुआ तो क्या आवाज़ न उठाई जाए?
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं कि विद्वेषपूर्ण राजनीति कोई नई बात नहीं है.
सिद्धार्थ वरदराजन
बकौल सिद्धार्थ, यह तो होता रहता है. सरकार किसी की भी रही हो अपने प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने का काम सबने किया है.
आपको याद होगा कि यूपीए के कार्यकाल में नितिन गडकरी के ख़िलाफ़ आरोप लगाए गए कि उनकी कंपनी में फ़र्ज़ी शेयर धारकों के नाम थे.

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केंद्र से भी ज़्यादा बदले की भावना की राजनीति राज्यों में देखी जाती रही है. हमारे सामने तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश का उदाहरण है.
मगर इन सबसे ज़्यादा केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के दुरुपयोग की बात सामने आती है. राजनीतिक विद्वेष की भावना से इसके इस्तेमाल के आरोप भी सुर्ख़ियों में रहे. कांग्रेस ने इसका लाभ जमकर उठाया.
एक और वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश इसके विपरीत कुछ किस्सों का ज़िक्र भी करते हैं.
उर्मिलेश
यह तो राजनीति का हिस्सा है और सबने ऐसा किया है. यूपीए और भाजपा, दोनों ने ही एक-दूसरे के ख़िलाफ़ ऐसी कार्रवाई की है. राज्यों में भी ऐसा हुआ है और केंद्र में भी. मगर कुछ अलग मिसालें भी मौजूद हैं.

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पूर्व कांग्रेस नेता नटवर सिंह की हाल ही में प्रकाशित किताब में भी इसका ज़िक्र है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए कई बार विपक्ष के नेताओं के कामों को विशेष तरजीह दी गई.
किताब में उन्होंने इशारा किया है कि कैसे विपक्ष के सदस्यों को सरकार द्वारा सहूलियतें भी समय-समय पर दी गईं.
मुझे एक मामला याद आता है, जो सोनिया गांधी की सुरक्षा से संबंधित था, जब वो विपक्ष की नेता थीं. एनडीए के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के कार्यालय से उस मामले पर तत्काल कार्रवाई की गयी. वहीं कुछ एक राज्यों में तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद तक की स्थिति नहीं रही है. ऐसी भी मिसालें देखने को मिली हैं.
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