आश्वस्त नहीं करता मनमोहन का ‘संवाद’

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संवाददाता सम्मेलन में किसी बड़ी घोषणा की उम्मीद नहीं थी. सिवाय इसके कि उनके इस्तीफ़े को लेकर क़्यास थे, जिन्हें उन्होंने दूर कर दिया. यह भी साफ़ कर दिया कि वे तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के इच्छुक नहीं हैं.
उनका संवाददाता सम्मेलन एक माने में जनता को संबोधित करने का तीसरा मौक़ा था. सन 2011 के फ़रवरी और 2012 में टेलिविज़न पर दो बार वे चुनिंदा मीडियाकर्मियों से रूबरू हुए थे. हाल के चुनावों में कांग्रेस की हार और पार्टी नेतृत्व को लेकर पैदा हो रहे असमंजस को दूर करना शायद इस संवाददाता सम्मेलन का उद्देश्य था.
एक और उद्देश्य नरेंद्र मोदी के ख़तरे की ओर जनता का ध्यान खींचना था. पिछले डेढ़ साल से नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह को सीधा निशाना बना रखा है. इस बार मनमोहन सिंह ने उन्हें निशाना बनाया. शायद यह पार्टी की लोकसभा चुनाव की रणनीति का हिस्सा है.
प्रधानमंत्री ने अपने दस साल के पूरे कार्यकाल की उपलब्धियों का ज़िक्र भी इस मौक़े पर किया, पर होता हमेशा यही है कि सारी बहस उनके नेतृत्व पर उठे सवालों तक सिमट जाती है. सच यह है कि उन्होंने यूपीए-2 की विफलताओं के जो कारण गिनाए उनसे सामान्य व्यक्ति की सहमति नहीं है. वे मानते हैं कि हम महंगाई को नियंत्रित नहीं कर पाए और पर्याप्त संख्या में रोज़गार पैदा नहीं कर पाए. पर केवल इसी वजह से यूपीए सरकार को लेकर जनता के मन में रोष नहीं है.
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केंद्र की कलंकित छवि

उन्होंने तीसरी बात भ्रष्टाचार की कही, जो कांग्रेस के साथ एक तरह से जुड़ सा गया है. बहरहाल वे अपनी बात जनता से कहना चाहते हैं, भले ही वह इसपर विश्वास न करें.
इसमें दो राय नहीं कि दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस सरकारों की भारी पराजय स्थानीय नेताओं, कार्यक्रमों और उनकी नीतियों के कारण नहीं हुई, बल्कि केंद्र सरकार की छवि के कारण हुई. केंद्र सरकार पर ‘लकवा’ मारने का आरोप भले ही नरेंद्र मोदी लगाते हों, पर सबसे पहले यह शब्द प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार ने इस्तेमाल किया था. जब प्रधानमंत्री इसे विपक्ष और मीडिया का दुष्प्रचार कहते हैं तो बात समझ में नहीं आती.
सत्ता के दो केंद्रों की तारीफ

मनमोहन सिंह ने कहा कि सत्ता के दो केंद्रों का प्रयोग सफल रहा, जबकि आम धारणा इसके विपरीत है. हाल में राहुल गांधी ने जब दाग़ी सांसदों को जीवनदान देने वाले अध्यादेश को फाड़ कर फेंक देने की बात की, उससे मनमोहन सिंह की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा था, भले ही वे इस बात को ख़ामोशी से सहन कर गए.
मनमोहन सिंह कम बोलने वाले और संतुलित बातें कहने वाले नेता हैं. उनकी शुरुआती पहचान स्वच्छ छवि की थी. संयोग से आज आम आदमी पार्टी की नई राजनीति का केंद्रीय विषय है ‘अच्छी छवि.’ पर मनमोहन सिंह को ‘अच्छी छवि’ का श्रेय नहीं लांछनों का ढेर मिला है. मिस्टर क्लीन की जगह उनपर ‘निष्क्रिय और दब्बू’ होने का दाग़ गाढ़ा होता गया. आज के संवाददाता सम्मेलन में भी कुछ सवाल इसी बात पर केंद्रित थे. इनके जो जवाब उन्होंने दिए वे आश्वस्तिकारक नहीं थे.
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जनता से कटा संवाद

प्रधानमंत्री के रूप में उनका जनता से संवाद कभी उच्चस्तरीय नहीं रहा. आज भी हिंदी में पूछे गए ज्यादातर सवालों के जवाब उन्होंने अंग्रेजी में दिए. टीवी जैसे आम जनता के मीडिया के मार्फ़त जो बात वे जनता तक कह सकते हैं, उसे वे नहीं कह पाते. उनके पिछले दस साल के कार्यकाल में तीसरा ऐसा बड़ा मौक़ा था जब वे मीडिया के प्रतिनिधियों से रूबरू थे. और किसी भी संवाद का लाभ उन्हें नहीं मिला.
माना जाता है कि मनमोहन सिंह ‘राजनीतिक व्यक्ति’ नहीं हैं. इसलिए वे प्रभावशाली नहीं हैं. आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी ‘राजनीतिक व्यक्ति’ नहीं हैं, पर दिल्ली विधानसभा में विश्वासमत पर बहस का जवाब देते हुए केजरीवाल के अंदाज़े बयां ने देश भर का ध्यान खींचा.
मनमोहन सिंह की सादगी को तारीफ़ नहीं मिली. इसे मीडिया की साज़िश भी नहीं कहा जा सकता. सवाल है कि उनकी छवि बिगाड़ने में संवादहीनता की भूमिका है, सत्ता के दो केंद्रों का होना है या सरकारी अनिश्चय हैं? उन्हें लेकर सारी बातें घूम फिरकर भ्रष्टाचार और सरकारी निर्णयहीनता पर केंद्रित हो जाती हैं.
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निष्क्रियता की सफ़ाई

उनकी मीडिया एक्सरसाइज़ में किसी भी वक्त तिलमिला देने वाले सवालों से भिड़ने की कोशिश नहीं की गई. न उन्होंने अपनी स्थिति को कभी साफ़ करने की कोशिश की. इसकी जगह पहले वे सरकारी विफलताओं के लिए गठबंधन सरकार होने की मजबूरी को दोषी ठहराते रहे.
आज के संवाददाता सम्मेलन में भी उन्होंने अपनी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनने के पीछे सीएजी, मीडिया और न्यायपालिका को भी ज़िम्मेदार माना. लगता नहीं कि जनता उनकी इस बात से सहमत होगी.
ऐसा नहीं कि जनता को मीडिया पर पूरा भरोसा है. मीडिया ग़लत शिकायत, ग़लत आरोप और असंतुलित फ़ैसले करने का दोषी हो सकता है. पर छवि बिगाड़ने में सरकार की अपनी भूमिका भी थी. भ्रष्टाचार और महंगाई का विस्फोटक मिश्रण सरकार की साख पर बुरी तरह भारी पड़ा. संसद के पूरे के पूरे सत्र 2-जी स्पेक्ट्रम, कोल ब्लॉक आवंटन और ऐसे ही घोटालों को लेकर हो-हल्लों की भेंट चढ़ गए.
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नरेंद्र मोदी का ख़तरा

प्रधानमंत्री जिन संदेशों को जनता के सामने रखना चाहते थे उनमें नरेंद्र मोदी के ख़तरे के प्रति आगाह करना भी था. उन्होंने वस्तुतः देश की जनता को चेतावनी दी कि नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गए तो यह देश के लिए घातक होगा.
उनका कहना था, “आप अहमदाबाद की गलियों में बेगुनाह लोगों के नरसंहार को प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नापने का पैमाना मानते हैं तो मैं इसमें यक़ीन नहीं करता." कहना मुश्किल है कि यह बात नरेंद्र मोदी को नुक़सान पहुँचाएगी या फ़ायदा.
सन 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था. कांग्रेस ने देर से इस बात को समझा था कि मोदी पर सांप्रदायिक आधार पर प्रहार करना वोटों के ध्रुवीकरण को बढ़ाता है. बहरहाल कांग्रेस आज एक मुश्किल घड़ी से गुज़र रही है, जिसका सामना करने की यह एक कोशिश लगती है.
<link type="page"><caption> पढें: कांग्रेस सिर्फ़ आकाशवाणी करती है: मोदी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131229_modi_ranchi_jharkhand_an.shtml" platform="highweb"/></link>
व्यक्तिगत सफ़ाई
प्रधानमंत्री ने इस बात को रेखांकित करने की कोशिश की कि यूपीए-1 सरकार के ख़िलाफ़ भी भ्रष्टाचार के आरोप थे, लेकिन देश की जनता ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया और हमें दूसरा कार्यकाल सौंपा. व्यक्तिगत रूप से उन्होंने अपनी सफ़ाई में कहा कि मैंने ही इस बात पर ज़ोर दिया था कि स्पेक्ट्रम आवंटन पारदर्शी, निष्पक्ष होना चाहिए और कोयला खानों का आवंटन नीलामी पर आधारित होना चाहिए. 2-जी और कोल ब्लॉक मामलों में जो कार्रवाई हुई है वह उचित है. व्यक्तिगत रूप से मनमोहन सिंह को आज भी दोषी ठहराना मुश्किल होगा, पर एक पार्टी के नेता के रूप में वे आज भी जनता को आश्वस्त नहीं कर पाए.
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