तीखे तीर कर रहे हैं ‘आप’ का इंतज़ार

हिंदी की कहावत है 'ओखली में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना?' आम आदमी पार्टी ने जोखिम उठाया है तो उसे इस काम को तार्किक परिणति तक पहुँचाना भी होगा.
यह तय है कि उसे समर्थन देने वाली पार्टी ने उसकी 'कलई खोलने' के अंदाज़ में ही उसे समर्थन दिया है और 'आप' के सामने सबसे बड़ी चुनौती है इस बात को गलत साबित करना और परंपरागत राजनीति की पोल खोलना.
'आप' सरकार की पहली परीक्षा अपने ही हाथों होनी है. यह पार्टी परंपरागत राजनीति से नहीं निकली है.
देखना होगा कि इसका आंतरिक लोकतंत्र कैसा है, प्रशासनिक कार्यों की समझ कैसी है और दिल्ली की समस्याओं के कितने व्यावहारिक समाधान इसके पास हैं?
इससे जुड़े लोग पद के भूखे नहीं हैं लेकिन वे सरकारी पदों पर कैसा काम करेंगे? सादगी, ईमानदारी और भलमनसाहत के अलावा सरकार चलाने के लिए चतुराई की जरूरत भी होगी, जो प्रशासन के लिए अनिवार्य है.
अब 'आप' को जितने भी काम करने हैं उनमें कदम-कदम पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के साथ समन्वय की जरूरत होगी. भाजपा के साथ न भी हो, कांग्रेस के साथ तो होगी.
साथ ही उसे इन दोनों पार्टियों के तीखे तीरों का सामना भी करना होगा, क्योंकि वह इन दोनों का विकल्प बनकर उभरना चाहती है.
विधानसभा अध्यक्ष किसका?

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष 'आप' का होगा या किसी और पार्टी का? 'आप' के पास इतने वोट नहीं हैं कि वो अपना अध्यक्ष बना सके.
उसका स्पीकर तभी बनेगा जब कांग्रेस समर्थन करेगी. मुख्यधारा की पार्टियों को अब होश आया है. अब भाजपा और कांग्रेस ने आलोचना के स्वर तीखे कर दिए हैं. भाजपा इसे कांग्रेस और 'आप' की मिली-भगत बता रही है.
वहीं कांग्रेस भविष्य में समर्थन वापस लेने के कारण अपनी जेब में रखना शुरू कर दिया है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने कहा कि उन्होंने किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी को समर्थन नहीं दिया है. दिल्ली के लोगों से किए गए वादों को समर्थन दिया है.
जब तक 'आप' की सरकार दिल्ली के लोगों से किए वादों को पूरा करने के लिए काम करती रहेगी तब तक उसे कांग्रेस का समर्थन मिलता रहेगा.
'आप' के कार्यकर्ताओं ने शीला दीक्षित सरकार के ख़िलाफ़ कई तरह की जाँच शुरू कराने की बात कही है. कांग्रेस इस प्रकार की जाँच में सहयोग नहीं करेगी. 'आप' का जो भी एजेंडा होगा उसे सीमित समर्थन ही हासिल होगा.
इधर शीला दीक्षित ने कहा है कि 'आप' हमारे समर्थन को 'बिना शर्त' न मानकर चले. हाँ, यदि 'आप' ने वोटरों से कोई वादा किया है तो उसे पूरा करने का मौका मिलना चाहिए. सवाल है कौन से वादे? बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य वगैरह. ऊपर से जन लोकपाल. तकनीकी रूप से वह संभव नहीं.
प्रशासनिक ईमानदारी

उसे लोकायुक्त मानकर चलें, तब भी 'आप' का 'जनलोकायुक्त' क्या कांग्रेस और भाजपा को मंजूर होगा? बिजली सस्ती कैसे होगी? खरीद के सिस्टम को व्यवस्थित करके या सब्सिडी बढ़ाकर.
भारत में ऊर्जा क्षेत्र का सुधार व्यापक केंद्रीय नीति का हिस्सा हैं. दिल्ली विद्युत सुधार अधिनियम, 2000 के तहत वितरण का निजीकरण हो चुका है. बिजली सप्लाई की स्थिति सुधरी है.
कहना मुश्किल है कि 'आप' के पास इन सुधारों को बेहतर बनाने का कोई फॉर्मूला है या केवल लोक-लुभावन वादे हैं. लगता है कि 'आप' की बुनियादी सुधारों पर आपत्ति नहीं है बल्कि कंपनियों के तौर-तरीकों तथा सरकार से उनको मिल रहे प्रश्रय पर नाराज़गी है.
पार्टी के संकल्प पत्र में लिखा है कि साल 2012 में बिजली कंपनियों ने 630 करोड़ रुपये का घाटा दिखाया था लेकिन जब विद्युत नियामक आयोग ने इनके खातों की चेकिंग की तो इन्हें घाटा नहीं 3,577 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ. बिजली कंपनियों के ऑडिट और मीटरों की जांच के लिए प्रशासनिक व्यवस्था करनी होगी पर पहले उसकी कार्य पद्धति को समझना होगा.
इसी तरह 700 लीटर पानी हर परिवार को हर रोज़ मुफ्त में देना आसान है लेकिन उसके व्यावहारिक असर को तभी समझा जा सकेगा जब 'आप' के सामने काम होगा. कमीशनबाजी, पार्टी फंड और ऐसे ही दूसरे काम 'आप' रोक सकती है और उसकी मूलभूत प्रशासनिक ईमानदारी के कारण पूर्ववर्ती सरकार के दोष सामने आए तो कहानी रोचक मोड़ ले लेगी.
'वोट बैंक'

'आप' का वादा है कि झुग्गी वालों को पक्के मकान दिए जाएंगे. अनाधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया जाएगा. महाराष्ट्र विधानसभा के 1995 के चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने झुग्गियों की जगह पक्के मकान देने का वादा किया था. इस वादे ने जादू का सा काम किया था.
हालांकि वह वादा अव्यावहारिक था पर उसने एक ओर मुम्बई में एक नया 'वोट बैंक' तैयार किया तो दूसरी ओर इस समस्या का समाधान खोजने की ओर नीति-निर्धारकों को प्रेरित किया.
दिल्ली में भी यह 'वोट बैंक' है. मुम्बई में 240 हेक्टेयर में फैली धारावी झुग्गी बस्ती के निवासियों को बहुमंजिला इमारतों में फ्लैट देने का वादा पूरा होने वाला है.
धारावी पुनर्विकास प्राधिकरण इस योजना को तैयार कर रहा है. हांगकांग के विशाल स्लम ताई हांग का विकास भी इसी तर्ज पर हुआ था. दिल्ली सरकार भी इस दिशा में काम कर रही है.
'आप' को उसकी गति बढ़ानी होगी. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए दिल्ली एनसीटी अधिनियम, 1991 में संशोधन करना होगा.
यह कानून 69वें संविधान संशोधन के कारण वज़ूद में आया था. दिल्ली सरकार के पास पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और समाज कल्याण जैसे काम है. 'आप' का वादा है कि दिल्ली में 500 नए स्कूल और अस्पताल खोले जाएंगे लेकिन सवाल उठता है कैसे? नए स्कूल खोलने के लिए ज़मीन देना दिल्ली सरकार के हाथ में नहीं है.
बदलाव की पार्टी

ज़मीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था केंद्र सरकार के पास है. इसमें बदलाव के लिए केवल कांग्रेस ही नहीं भाजपा के सहयोग की ज़रूरत भी होगी. 'आप' की शब्दावली में मुख्यधारा की पार्टियाँ चोर और भ्रष्ट हैं. वे सहयोग कैसे देंगी? कोई ज़रूरी नहीं कि 'आप' के उदय के लिए हम अपनी राजनीति से पुराने उदाहरण खोजें.
फिर भी कुछ लोगों ने उसे 1977 की जनता पार्टी या अस्सी के दशक की तेलुगूदेशम पार्टी जैसा माना है. किसी ने उसे भ्रष्टाचार विरोध के कारण जय प्रकाश नारायण के आंदोलन का नया रूप भी माना है. इतना जरूर लगता है कि नए सोशल मीडिया से जुड़े युवा वॉलंटियर 'आप' की बड़ी ताकत हैं. इनमें से कई युवा पश्चिमी देशों में काम करते हैं.
उनके मन में भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के दोषों को दूर करने की ललक है. इस पार्टी की दो बातें महत्वपूर्ण हैं. जनता से जुड़ाव और पारदर्शिता.
भारतीय राजनेता आज भी सामंती दौर के निवासी लगते हैं. 'आप' का अपना कोई रेडीमेड विचार और दर्शन नहीं है. जो भी है बन और ढल रहा है, उसका 'स्वराज' नाम का दस्तावेज़ बुनियादी बातों का संकलन है.
गांधी के 'हिंद स्वराज' की तर्ज पर कुछ अवधारणाओं के मर्म को छूने की कोशिश है पर उसे क्रांतिकारी और व्यवस्था-विरोधी बदलाव की पार्टी मान लेना जल्दबाज़ी होगी. भारी-भरकम विचारधारा से मुक्त होना उसकी कमज़ोरी नहीं ताकत ही है. उसके भीतर नए विचारों को स्वीकार करने की सामर्थ्य है और वैचारिक आधार व्यापक है.
'एकला चलो' नहीं चलेगा

आम आदमी पार्टी का संदेश है कि मुख्यधारा की पार्टियां ख़ुद को ओवरहॉल करें. 'आप' एक छोटा एजेंडा लेकर मैदान में उतरी थी. व्यापक कार्यक्रम अनुभव की ज़मीन पर विकसित होगा, बशर्ते वह खुद कायम रहे.
उसे भ्रष्टाचार से आगे भी सोचना चाहिए. पार्टी जिन राजनीतिक अवधारणाओं पर चल रही है, उनमें गठबंधन की जगह नहीं है. क्या गठबंधन-राजनीति की अनदेखी की जा सकती है?
गठबंधन के लिए उसे परंपरागत राजनीति से हाथ मिलाना होगा, जो उसके पवित्रतावादी विचार के प्रतिकूल है. वह हमेशा विरोधी दल या प्रेशर ग्रुप के रूप में काम नहीं कर सकती.
सत्ता में आना है तो गठबंधन के बारे में भी सोचना होगा. 'आप' के पास प्रयोग करने का समय है. दिल्ली छोटी सी प्रयोगशाला है. प्रयोग सफल रहा तो उसे देश के दूसरे इलाकों में भी जाना होगा.
हालांकि उसकी अपील छोटे शहरों और गाँवों तक जा पहुँची है पर असर महानगरों में ही दिखाई पड़ता है. लोकसभा की 542 में से 216 सीटें शहरी या अर्द्ध शहरी हैं.
'आप' यदि इनमें से 15-20 फीसदी यानी 30-40 सीट भी हासिल कर लें तो वह तीसरे नम्बर की पार्टी होगी. तीसरे मोर्चे की अवधारणा का सूत्र भी वह बन सकती है.
ऐसा न भी हो तो उसके पास केंद्रीय राजनीति की 'बैलेंसिंग फोर्स' बनने का मौका है. फिलहाल उसे अपने आर्थिक विचारों को स्पष्ट करना होगा.
राष्ट्रीय धरातल पर आने पर राष्ट्रीय एकीकरण और सामाजिक-सांस्कृतिक सवालों से उसे रूबरू होना पड़ेगा. इस वैचारिक विस्तार के लिए उसे ज़मीनी अनुभव दिल्ली में मिलना शुरू हो गया है.
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