हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता

'अनामिका', 'परिमल', 'गीतिका', 'रागविराग', निराला के प्रमुख काव्य संग्रह हैं.
इमेज कैप्शन, 'अनामिका', 'परिमल', 'गीतिका', 'रागविराग', निराला के प्रमुख काव्य संग्रह हैं.

महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की एक कविता है ‘कुकुरमुत्ता’ जो तीन अप्रैल 1941 को उन्होंने लिखी और पहली बार ‘हंस’ के मई 1941 अंक में छपी थी. बाद में तरुण मासिक में इलाहाबाद से जुलाई 1941 में छपी और फिर 1948 में संशोधन के साथ स्वतंत्र रूप से प्रकाशित हुई. यह कविता मुझे बेहद पसंद है.

तब से लेकर आज तक यह रचना प्रासंगिक बनी हुई है. निराला जहां एक ओर संस्कृतनिष्ठ हिंदी में ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी कविता लिखते हैं वहीं वो ‘कुकुरमुत्ता’ में आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते दिखाई देते हैं.

निराला छायावाद के एक महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं लेकिन इस कविता से उनका रुपांतरण प्रगतिशील कवि के रूप में दिखाई देता है. इसलिए यह कविता अलग तरह से हमारे सामने आती है.

हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू के मिले-जुले भाषाई प्रयोग की छवि इस कविता को सुगम बनाती है और वैचारिक स्तर पर निराला को साधारण जनों से जोड़ती है. इसीलिए यह कविता मुझे बेहद पसंद है. इस लंबी कविता का एक छोटा सा अंश है –

"आया मौसम, खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब; वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्ता पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-अबे, सुन बे, गुलाब, भूल मत जो पायी खुशबू, रंग-ओ-आब, खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट! कितनों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रक्खा, सहाया जाड़ा-घाम, हाथ जिसके तू लगा, पैर सर रखकर वो पीछे को भागा औरत की जानिब मैदान यह छोड़कर, तबेले को टट्टू जैसे तोड़कर, शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा तभी साधारणों से तू रहा न्यारा। वरना क्या तेरी हस्ती है, पोच तू कांटों ही से भरा है यह सोच तू कली जो चटकी अभी सूखकर कांटा हुई होती कभी। रोज पड़ता रहा पानी, तू हरामी खानदानी। चाहिए तुझको सदा मेहरुन्निसा जो निकाले इत्र, रू, ऐसी दिशा बहाकर ले चले लोगों को, नहीं कोई किनारा जहाँ अपना नहीं कोई भी सहारा ख्वाब में डूबा चमकता हो सितारा पेट में डंड पेले हों चूहे, ज़बां पर लफ़्ज प्यारा। देख मुझको, मैं बढ़ा डेढ़ बालिश्त और ऊंचे पर चढ़ा और अपने से उगा मैं बिना दाने का चुगा मैं कलम मेरा नही लगता मेरा जीवन आप जगता तू है नकली, मैं हूँ मौलिक तू है बकरा, मैं हूँ कौलिक तू रंगा और मैं धुला पानी मैं, तू बुलबुला तूने दुनिया को बिगाड़ा मैंने गिरते से उभाड़ा

तूने रोटी छीन ली जनखा बनाकर एक की दी तीन मैंने गुन सुनाकर। " (निराला की कविता 'कुकुरमुत्ता' से जो 1941 में लिखी गई थी)

यह कविता एक ऐसी कविता है जो बहुत साधारण भाषा में और गहरे अर्थों के साथ मनुष्य की भावनाओं को अभिव्यक्त करती है और सारी व्यवस्थाओं को तहस-नहस करती है सिर्फ़ एक कुकुरमुत्ता और गुलाब के माध्यम से. इसलिए मुझे यह कविता बेहद पसंद है.

(प्रस्तुति : अमरेश द्विवेदी)

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