मिथिला मखाना क्यों है ख़ास, जीआई टैग से क्या फ़ायदा?
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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
फ़िल्म अभिनेत्री करीना कपूर से साल 2011 में एक बुक लॉच के दौरान फिट सेहत का राज़ पूछा गया.
जवाब में उन्होंने कहा, " तीन साल पहले तक मुझे साबूदाना गर्ल के नाम से जाना जाता था. इस टैग से परेशान होकर मैंने रूजुता दिवेकर ( करीना कपूर की डायटीशियन) से इसे बदलने के लिए कहा. और नतीजा आपके सामने है. अब मैं बन गई हूं मखाना गर्ल."
11 साल पहले मखाना खाने के फ़ायदे का कुछ इस तरह से गुणगान किया था फ़िल्म स्टार करीना कपूर ने. स्नैक के तौर पर मखाना को प्रसिद्धी कहां और कब मिली इसकी भले ही कोई तय तारीख ना हो - लेकिन फ़िल्मी सितारे से लेकर आम जनता में आज इस स्नैक के कई फैन आपको ज़रूर मिल जाएंगे.
करीना कपूर ने अपने मखाना प्रेम के बारे में आगे बताया, "हर शाम फ़िल्म सेट पर मेरे स्पॉट बॉय प्रकाश मेरे लिए एक कटोरी मखाना लेकर आते थे.
शाहरुख खान उस कटोरे को देख कर अकसर आश्चर्य से पूछते थे - क्या है ये? मैंने उनसे ट्राई करने को कहा. उन्होंने चखा और उन्हें भी मखाने से प्यार हो गया. फ़िल्म इंडस्ट्री में हर कोई जानता है कि मैं मखाना गर्ल हूं."
पिछले कुछ सालों में मखाना अब भारत के हर राज्य में लोगों के घरों का अभिन्न अंग बन गया है.
पान की दुकान में लटके चिप्स जैसे मखाना स्नैक्स के पैकेट से लेकर मखाना खीर और मखाना फ्लैक्स - कई तरह की ब्रांडिंग से इसे बेचा और ख़रीदा जा रहा है.
इसकी इसी प्रसिद्धि के बाद अब भारत सरकार भी जागी है.
मिथिलांचल मखाना को जीआई टैग मिल गया है. 'जियोग्राफ़िकल इंडिकेशंस टैग' खास उत्पाद के क्षेत्र, उसके इतिहास और गुण के आधार पर मिलता है, जिसके लिए कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार आवेदन कर सकता है.
इस फैसले के बारे में जानकारी देते हुए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ट्विटर पर लिखा, "जीआई टैग मिलने से अब मखाना की खेती करने वाले किसानों को लाभ मिलेगा और कमाना और आसान होगा. त्योहारी सीज़न में बिहार के बाहर वाले लोग भी इस शुभ सामग्री का प्रयोग कर पाएंगे."
आज की कहानी भारत में मिलने वाले मखाने के खज़ाने की.
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भारत में मखाना व्यापार
दुनिया का 85-90 फ़ीसदी मखाना भारत में होता है. भारत का 90 फ़ीसदी मखाना बिहार में होता है.
बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सुपौल, सीतामढ़ी, अररिया, कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज मखाने की खेती के लिए विख्यात हैं. मिथिलांचल, कदम कदम पर पोखर ( तालाब), मछली और मखाना के लिए दुनिया में जाना जाता है.
इस वजह से ये ख़बर बिहार के मखाना किसानों के लिए काफ़ी सुखद है.
भारत से मखाना जिन देशों में निर्यात किया जाता है, उसमें अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा सबसे आगे है. भारत से सालाना 100 टन मखाना ही निर्यात किया जाता है. सुनने में आपको ये मात्रा काफी कम लग रही होगी, लेकिन मखाना बहुत हल्का होता है इसलिए संख्या कम भारी नहीं है.
भारत में हर साल 50-60 हज़ार टन मखाने के बीज की पैदावार होती है, जिससे 20-25 हज़ार टन मखाने का लावा निकलता है.
मखाना प्राकृतिक, शुद्ध आहार माना जाता है, जो व्रत में और ऐसे भी (बिना व्रत वाले दिन भी) हेल्दी स्नैक्स की तरह भारत के घरों में इस्तेमाल किया जाता है.
सेहत के लिए फायदेमंद होने की वजह से इसका व्यापार साल दर साल दुनिया में बढ़ता ही जा रहा है.
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मखाने में न्यूट्रिशन की भरमार पर रखें ये ख़्याल
100 ग्राम मखाने से 350 किलो कैलोरी एनर्जी मिलती है. इसमें फैट यानी वसा नाम मात्र का होता है, 70-80 ग्राम कार्बोहाइड्रेट. 9.7 ग्राम प्रोटीन होता है जो शरीर के लिए काफी फायदेमंद है, 7.6 ग्राम फाइबर, 60 मिलीग्राम कैल्शियम और 40- 50 मिलीग्राम पोटेशियम मिलता है, फास्फोरस 53 मिलीग्राम.
मशहूर न्यूट्रिशनिस्ट डॉक्टर शिखा शर्मा बीबीसी से बातचीत में कहती है, "मखाने में शरीर के लिए ज़रूरी मिनरल मिलते हैं - कैल्शियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस ज़्यादा है. लेकिन ऐसा नहीं की ज़्यादा मिनरल की ज़रूरत हो तो ज़्यादा मात्रा में सेवन कर ले. ज़्यादा मखाना खाने से कब्ज़ की समस्या हो सकती है. मखाना में जो फाइबर है वो पेट को स्वस्थ रखने में ज़्यादा मददगार नहीं होता."
इस वजह से डॉक्टर शिखा कहती है, "दिन में 50 ग्राम से ज़्यादा मखाना नहीं खाना चाहिए. उसे सूखा नहीं खाना चाहिए. ये आंतों को ड्राई करने का काम करता है. इस वजह से फ्रूट जूस, घी के साथ भूनकर, एलोवेरा जूस या दूध के साथ ही बच्चों को दें या खुद भी सेवन करें. वजह कम करना हो, या फिर अगर आप डायबिटीज से परेशान हैं या फिर पॉलिसिस्टिक ओवरी के मरीज़ हों - इन सब मामले में डॉक्टर मरीज़ को मखाना खाने की सलाह देते हैं. गर्भवती महिलाओं के लिए भी सीमित मात्रा में ये स्वास्थ्यवर्धक साबित होते हैं."
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मखाने की खेती
भारत में मखाने के लिए इकलौता रिसर्च सेंटर बिहार के दरभंगा शहर में ही है. वहां के प्रधान वैज्ञानिक और हेड डॉक्टर इंदु शेखर सिंह ने बीबीसी से बातचीत में इसकी खेती के बारे में विस्तार से बताया.
उनके मुताबिक़, "मखाना की खेती स्थिर जल जमाव वाले क्षेत्र में ज़्यादातर की जाती है. बशर्ते वहां बालू वाली मिट्टी ना हो. ज़रूरी है कि जल जमाव वाली जगह पर कीचड़ भी हो. 3-4 फीट गहराई हो तो ज़्यादा अच्छा होता है.
पानी का pH ( अम्लता) न्यूट्रल हो तो ज़्यादा बेहतर है. आम तौर पर ये 6.5 से 7.5 के बीच होना मखाना के लिए अच्छा माना जाता है. खेती वाले मौसम में बहुत गर्मी या बहुत अधिक ठंड नहीं पड़नी चाहिए.
हालांकि मखाना खेतों में भी उगाया जाता है. धान के खेत की मेड़ की ऊंचाई अगर 2 से 2.5 फीट कर दी जाए और उसमें 1.5 पानी भर दें, तो खेतों में भी मखाना उगाया जा सकता है.
उत्पादकता की बात करें तो तालाब के मुकाबले खेतों में ज्यादा है. तालाब में प्रति हेक्टेयर 20-25 कुंतल मखाना की पैदावार होती है जबकि खेतों में 30-35 कुंतल होता है. लेकिन दोनों में चुनौतियां भी अलग तरह की है.
तालाब में मखाना काफ़ी नीचे दबा होता है तो निकालने में दो-तिहाई बीज उसी के भीतर रह जाते है. ऐसे में अलग सीजन में बीज का ख़र्चा बच जाता है. खेतों में कम पानी में मखाना उगाने में घास की समस्या बहुत होती है. तालाब में उस समस्या से बहुत हद तक किसानों को निजात मिल जाता है."
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मखाने का सीज़न
मखाने का वैसे तो सीज़न फरवरी से जुलाई माना जाता है. बहुत से लोग सोचते हैं कि कमल से मखाने का कोई लेना देना है. पर ऐसा नहीं है. दोनों पानी और कीचड़ में होते हैं इसके अलावा विशेष समानता दोनों के बीच नहीं है.
लेकिन नवंबर के महीने में नर्सरी बना कर बीज का छिड़काव कर दिया जाता है. एक हेक्टेयर में अगर खेती करनी है तो 20 किलोग्राम बीज की ज़रूरत पड़ती है.
फिर नर्सरी में पौधा फरवरी के दूसरे सप्ताह में तैयार हो जाता है. उसके बाद इसे जल जमाव वाले खेत में ट्रांसफर किया जाता है. खेतों में जुलाई तक ये पूरा तैयार हो जाता है.
जुलाई के बाद इसके फसल कटाई का सीजन होता है. पहले फल बनता है. एक फल में औसतन 50-60 बीज हो सकते हैं.
जिसके बाद प्रोसेसिंग का काम शुरू होता है. आम तौर पर मछुआरे ही इसकी फसल कटाई का काम करते हैं. लेकिन इसकी खेती में कई दिक़्क़तें भी हैं.
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मखाने की खेती की मुश्किलें
मखाने की खेती में आज भी लोगों की मेहनत ज़्यादा लगती है और मशीन की कम.
मखाने की खेती में बांस लकड़ी से बने उपकरणों का प्रयोग होता है, जिन्हें गांज, करा, खैंची, चलनी, अफरा एवं थापी कहा जाता है.
मणिपुर जैसे राज्य में फल फटने के बाद कीचड़ में ही मखाने के बीज ना फैल जाएं इससे पहले ही उन्हें काट कर बाहर निकाल लिया जाता है.
फल से फट कर बीज मिट्टी में 10-15 सेंटीमीटर नीचे सेटल हो जाता है - तब मछुआरे इसे निकालते हैं. सुबह से लेकर दोपहर के 1.30- 2 बजे तक उन्हें पानी में रहना पड़ता है. उसके बाद पानी गर्म हो जाता है.
बांस की बनी टोकरी का इस्तेमाल कर इन्हें पानी से निकाला जाता है. इस टोकरी को गांज कहते हैं. इससे मिट्टी से बीजों को छांटने में मदद मिलती है.
फिर एल्युमिनियम के बर्तन में उन्हें जमा किया जाता है. बाद में पैरों से मसल कर बाक़ी की गंदगी निकाली जाती है. फिर पानी में उन्हें धोया जाता है. उसके बाद दो- तीन दिन धूप में सुखाया जाता है. फिर शुरू होता है प्रोसेसिंग का काम.
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इन सब कामों के लिए आधुनिक उपकरणों की गैरमौजूदगी ही मखाना किसानों की सबसे बड़ी समस्या है. इसकी खेती का लिए वैज्ञानिक तरीका आज भी नहीं है.
कीचड़ में मखाने के बीज निकालने की प्रक्रिया के लिए मछुआरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है, जिनकी संख्या बहुत कम है और उतने ही कम लोगों को इसके तकनीक के बारे में पता भी है.
दरभंगा मखाना रिसर्च सेंटर के हेड डॉक्टर इंदु शेखर कहते हैं, "पूर्णिया के कृषि कॉलेज में इसे पानी से निकालने के लिए तकनीक विकसित करने का काम चल रहा है. लेकिन उसमें थोड़ा वक़्त और लगेगा."
मखाने के फल से पके बीज निकालने के बाद उसकी रोस्टिंग की जाती है उसके लिए भी मशीनें उपलब्ध नहीं है. लोहे की कढ़ाई में ही इसे किया जाता है. उसके बाद लावा बनाया जाता है.
हांलाकि प्रसंस्करण के लिए आधुनिक मशीनों को बनाने का काम लुधियाना के ICAR इंस्टीट्यूट में चल रहा है.
चूंकि मखाना के बीज अलग अलग साइज़ के होते हैं, तो पहले उन्हें साइज़ के हिसाब से छांटा जाता है. बांस की छलनी से लगभग 15 साइज़ों में इसे छांटा जाता है, जिसे ग्रेडिंग कहा जाता है.
हर ग्रेड के मखानों का उसके बाद रोस्टिंग और पॉपिंग किया जाता है, जिसे आम भाषा में लावा भुनाई भी कहा जाता है.
जुलाई में हार्वेस्टिंग होने के बाद घरों में तक पहुँचने में इसे और दो महीने का वक़्त लगता है. उसके बाद मखाने की अलग अलग तरह से मार्केटिंग की जाती है.
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जीआई टैग से क्या फ़ायदा होगा?
अब जब मिथिलांचल के मखाने को जीआई टैग मिल गया है, तो मिथिलांचल में हर्ष उल्लास का माहौल है. मिथिलांचल, कदम कदम पर पोखर ( तालाब), मछली और मखाने के लिए प्रसिद्ध है.
जीआई टैग के लिए आवेदन मिथिलांचल मखाना उत्पादक संघ ने आवेदन दिया था. इस संघ में 5000 उत्पादक जुड़े हुए हैं.
मिथिलांचल के मखाना उत्पादकों का मानना है कि जीआई टैग मिलने से जितने जागरूक उपभोक्ता होंगे वो मिथिलांचल का मखाना ही ख़रीदना पसंद करेंगे. उनके ब्रांड की नकल कोई दूसरा नहीं कर पाएगा. इससे उनके प्रोडक्ट की माँग बढ़ेगी.
पूर्व में ऐसा जीआई टैग दार्जिलिंग की चाय, मैसूर के सिल्क, कुल्लू की शॉल, लखनऊ की जरदोज़ी जैसी कई चीज़ों को मिल चुका है.
भारत से जिन देशों में मखाना निर्यात किया जाता है वहां भी मिथिलांचल के मखाना की माँग बढ़ेगी.
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इतना ही नहीं उत्पादकों को भरोसा है कि जीआई टैग मिलने के बाद मखाने को भी एमएसपी वाले कृषि उत्पादों की सूची में शामिल किया जा सकेगा और मखाना किसानों को इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सकता है. इसकी माँग मखाना किसान कुछ समय से कर रहे हैं.
आज की तारीख में मखाना के बड़े लावा की कीमत 600-800 रुपये प्रति किलो है. छोटे लावे की कीमत 400-500 रुपये प्रति किलो मिल सकेगा. हालांकि न्यूट्रिशनल वैल्यू दोनों की एक समान ही होती है.
जीआई टैग के बाद दूसरे राज्यों में किसान इसे उगाने के लिए आगे आएंगे.
दरभंगा का मखाना इंस्टीट्यूट अब इसकी खेती के प्रचार प्रसार में जुट गया है. बिहार से निकल कर अब इसकी खेती उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ तक फैल गई है. अब तक इसको पानी से निकालने के प्रक्रिया बहुत किसानों को मालूम नहीं है. इस वजह से कम राज्यों तक इसकी खेती सीमित थी.
जीआई टैग के बाद अब बारी एचएस कोड ( हार्मोनाइज़िग सिस्टम) मिलने की है. मखाना किसानों को उम्मीद है कि ऐसा होने पर आने वाले दिनों में इसका निर्यात काफ़ी बढ़ जाएगा.
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