असम: बाढ़ में तैरती लाश और 'गंदा' पानी पीने को मजबूर लोग

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए सिलचर से
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सिलचर शहर के बिलपार इलाक़े में लोगों की भारी भीड़ है. परेशान लोगों की इस भीड़ में अधिकतर के कपड़े पानी में भीगे हुए हैं. सेना की गाड़ियां खड़ी हैं और उनमें नावें लदी हुई हैं. नारंगी रंग की पोशाक पहने एनडीआरएफ़ यानी नेशनल डिज़ास्टर रिस्पॉन्स फ़ोर्स के जवान रबड़ की नाव में हवा भर रहें है.

एनडीआरएफ़ के एक वरिष्ठ अधिकारी लोगों को फ़ोन पर दिलासा दे रहें है कि उनकी टीम जल्दी ही बचाव के लिए पहुंच रही है.

कैमरा देखते ही कुछ लोग शिकायत करने आ जाते हैं तो कुछ लोग ग़ुस्सा हो जाते हैं. एक व्यक्ति वहां से चिल्लाते हुए गुज़रता है कि किसी भी नेशनल मीडिया ने हमारी परेशानी को नहीं दिखाया.

बिलपार मोड़ से महज़ दो क़दम आगे बढ़ते ही बाढ़ का गंदा पानी घुटने तक आ जाता है. इससे आगे की गलियों में 8 से 10 फ़ुट पानी भरा हुआ है.

पानी जिस तेज़ गति से इन गलियों से गुज़र रहा है वहां कोई भी खड़ा नहीं हो सकता. मोड़ पर खड़े ट्रकों से राहत के तहत दिए जा रहे राशन को नावों में लोड किया जा रहा है. लेकिन यह राशन बाढ़ में डूबे इलाक़े की आबादी के मुक़ाबले बहुत कम नज़र आता है.

32 साल की शोमा कैमरे को देखते ही ग़ुस्सा हो जाती है. वो ज़ोर से कहती हैं, "यहां कैमरा करने से क्या होगा, जहां पानी मकानों के ऊपर से गुज़र रहा है वहां जाकर देखो."

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पीने के पानी को तरस रहे हैं लोग

कमर तक पानी में डूबी शोमा एक बार फिर ग़ुस्से में कहती हैं, "चार दिन से कोई नहीं आया है. घर पानी में डूबा हुआ है. बच्चों के साथ किस हाल में रह रहें है किसी ने आकर नहीं देखा. हमें पीने के पानी की एक बोतल तक नहीं मिली. किससे जाकर कहें?"

बिलपार मोड़ पर खड़े 28 साल के सुभाष सहायता का इंतज़ार कर रहें हैं ताकि वो कैंसर पीड़ित अपनी बूढ़ी मां को अस्पताल तक ले जा सके.

वो कहते हैं, "डॉक्टर ने आज चेकअप की तारीख़ दी थी अगर नहीं गए तो मां की तबीयत ज़्यादा बिगड़ सकती है. घर में बाढ़ का पानी भरा हुआ है फिर भी डॉक्टर दिखाने के लिए मां को लेकर यहां तक पहुँचा हूं. लेकिन अस्पताल तक पहुँचने के लिए आगे गर्दन तक भरे पानी को पार करना होगा."

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नाक में खाने की नली लगाए पास में खड़ी सुभाष की बीमार मां सिर्फ़ इतना कहती हैं कि बाढ़ ने हम सभी के जीवन को ख़तरे में डाल दिया है.

सुभाष जिस कैंसर अस्पताल में अपनी मां को लेकर जा रहे हैं वो भी पानी में डूबा हुआ है. हालांकि कैंसर अस्पताल एक भी दिन के लिए बंद नहीं किया गया है.

वहीं थोड़ी दूर अपनी नाव के साथ खड़े नरेश कहते हैं, "बाढ़ ने हमारा सबकुछ छीन लिया. अब तो खाने के लाले पड़ने वाले हैं."

नरेश पहले अपनी जीविका के लिए मछली बेचने का काम करते थे लेकिन जब से बाढ़ आई है वो लकड़ी से बनी एक देशी नाव चलाते हैं.

वो कहते हैं, "जिन लोगों के घर में ज़्यादा पानी है या फिर कोई बीमार है तो मैं उनकी इस नाव से मदद करता हूं. मैंने यह नाव भाड़े में ली है. इससे थोड़ी बहुत जो कमाई होती है उससे अपने परिवार के लिए खाने-पीने का सामान ले जाता हूं."

बाढ़ में डूबे जिन रिहायशी इलाक़ों में एनडीआरएफ़ की नाव पर हमारी बीबीसी की टीम लोगों से उनका हाल जानने गई थी वे आर्थिक रूप से काफ़ी संपन्न लगे.

पक्के बहुमंज़िला मकान और घर में पानी के नीचे दबी महंगी गाड़ियां... लेकिन बाढ़ की इस तबाही के बाद वे एक बोतल पीने के पानी के लिए भी तरसते दिखे. इन इलाक़ों में बीते पांच दिनों से न बिजली है और न ही पीने का साफ़ पानी मिल रहा था. घर के बाहर जिस रफ़्तार से पानी बह रहा था उसमें बाहर निकलने का जोखिम कोई नहीं उठा सकता.

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1984 में आई बाढ़ की ख़ौफ़नाक़ यादें, आज भी ज़िंदा हैं

असम में क़रीब दो लाख आबादी वाले सिलचर शहर में हम जिन रिहायशी इलाक़ों में गए इनमें ज़्यादातर बाढ़ के पानी में डूबे हुए मिले. शहर के कई पुराने इलाक़ों में पानी बुरी तरह से भरा हुआ था और हज़ारों लोग अब भी बाढ़ के पानी के कारण घर में क़ैद हैं. कनकपुर इलाक़े में कई मकान ऐसे थे जिनकी पहली मंज़िल पानी में डूब गई थी.

बराक नदी के किनारे बसा सिलचर शहर असम के कछार ज़िले का मुख्यालय है.

राजधानी शहर गुवाहाटी से दक्षिण पूर्व में क़रीब 320 किलोमीटर दूर स्थित सिलचर की स्थापना 1832 में कैप्टन थॉमस फिशर ने की थी. उस समय फिशर ने कछार के मुख्यालय को सिलचर के जानीगंज में स्थानांतरित कर दिया था. इस पुराने शहर के लोग जितना पुराना इतिहास बताते है अब वे उतनी ही पुरानी 1984 में आई भीषण बाढ़ को याद कर रहें है. शहर की दास कॉलोनी में रहने वाले प्रोफ़ेसर सी आर भट्टाचार्य अपनी छत से आवाज़ लगाते हुए कहते हैं, "ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी. हमारा ग्राउंड फ्लोर का मकान पानी में बर्बाद हो गया. कार पूरी तरह पानी में डूबी हुई है."

सिलचर में 20 जून से पहले जिन सरकारी सड़कों पर लोग अपना वाहन चलाते थे अब वो उन पक्की सड़कों पर नाव से आना-जाना कर रहें है. बिलपार, राधा माधव रोड़, दास कॉलोनी हर तरफ़ पानी में डूबे घर और उनके भीतर से राहत के लिए आ रही आवाज़ें बाढ़ की त्रासदी को बयां करती हैं. इन्हीं इलाक़ों में पक्के मकानों के नीचे खड़ी महंगी गाड़ियों की छत के ऊपर से बाढ़ का पानी गुज़र रहा है.

आर्थिक रूप से संपन्न इस इलाक़े के लोगों ने शायद ही इस तरह की त्रासदी की बात सोची होगी. रबड़ की बोट लेकर नारंगी कलर की जर्सी पहने जैसे ही एनडीआरएफ़ के जवान सीटी बजाते हैं लोग छत पर से रस्सी के सहारे अपना थैला नीचे फेंक देते हैं ताकि उन्हें पानी की बोतल और कुछ खाने के लिए बिस्कुट मिल जाए.

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बाढ़ का पानी साफ़ करके पीने को मजबूर

जब लोग ज़्यादा शिकायत करते हैं तो एनडीआरएफ़ के एक अधिकारी उन्हें उम्मीद देते हुए कहता है कि अभी इससे काम चलाइए, हम फिर आएंगे. एनडीआरएफ़ का एक जवान बाढ़ पीड़ितों को राहत के साथ दवाइयों की कुछ छोटी शीशी देते हुए कहता है, "एक शीशी को 20 लीटर पानी में मिला लेना. इससे पानी साफ़ हो जाएगा. कई लोगों की शिकायत है कि उनके पास पीने का पानी नहीं है इसलिए वो बाढ़ के गंदे पानी को ही किसी तरह साफ़ कर पी रहे हैं."

सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो साझा किए जा रहे हैं जहां लाश को पानी में बहा दिया गया है. कुछ लोग वीडियो की क्लिप दिखाते हुए कहते हैं कि पिछले सप्ताह एक महिला का शव बाढ़ के पानी में तैरता हुआ पाया गया था. परंतु बाद में स्थानीय स्वयंसेवकों ने उनका अंतिम संस्कार किया.

यह बात पूछने पर सिलचर के रहने वाले रानू कहते हैं कि चारों तरफ़ बाढ़ का पानी है और श्मशान घाट भी पूरी तरह डूब चुका है तो ऐसे में अंतिम संस्कार कहां करेंगे.

महिला के शव के साथ उनके बेटे ने कथित तौर पर एक चिट्ठी लिख कर छोड़ी थी जिसमें उन्होंने लोगों से अपनी मां का अंतिम संस्कार करने की अपील की थी. वो महिला रंगीरखारी इलाक़े की रहने वाली थीं जहां बाढ़ ने तबाही मचाई हुई है.

सिलचर के रहने वाले दिलीप कहते हैं कि लोगों के घर के बाहर पानी इतनी तेज़ी से बह रहा है कि कोई बाहर निकलने का जोखिम नहीं उठा सकता.

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कुछ इलाक़ों तक नहीं पहुंचे हैं एनडीआरएफ़ के जवान

एनडीआरएफ़ के ट्रेनिंग प्राप्त जवान भी पानी में डूबे कुछ इलाक़ों में पहुंच नहीं सके है. बचाव अभियान और राहत बांटने के काम में लगे एनडीआरएफ़ के एक जवान ने बताया "यह शहरी बाढ़ है लेकिन पानी में इतना ज़्यादा फ़ोर्स है कि वहां कोई खड़ा तक नहीं हो सकता. पानी के तेज़ बहाव का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पानी के फ़ोर्स से व्यक्ति की हड्डी तक टूट सकती है. हमारी टीम ने चक्रवात तूफ़ानों में, बाढ़ में काम किया है लेकिन यह बहुत जटिल बाढ़ है. हमने कुछ लोगों को टीन की बनी छत को काटकर निकाला है. हमारी टीम पूरी कोशिश कर रही है कि हर व्यक्ति को बचाया जाए और सभी पीड़ितों तक राहत का सामान पहुँचाया जाए."

पिछले 38 सालों में यह दूसरी सबसे बड़ी बाढ़ है जिसने सरकारी भवनों, सड़कों, स्कूल, कॉलेजों को जिस तरह नुक़सान पहुँचाया है उसे वापस पटरी पर लाने में महीनों लग जाएंगे.

स्थानीय प्रशासन ने बेघर हुए लोगों के लिए कुछ राहत शिविर खोले हैं जहां बच्चे- बूढ़े सब बेहाल दिखे. बिजली के खंभे पानी में डूब जाने से कई दिनों तक लोगों को अंधेरे में रहना पड़ा लेकिन अब कुछ इलाक़ों में बिजली व्यवस्था ठीक कर ली गई है.

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ज़िला प्रशासन के अधिकारियों के अनुसार, बाढ़ में अपना घर-बार गंवा चुके लोगों को सरकार राशन से लेकर सभी ज़रूरी सुविधा मुहैया करा रही है. बाढ़ पीड़ित इलाक़े में पहुंचे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कहा, "सिलचर की बाढ़ मानव निर्मित थी. अगर बेथुकांदी में तटबंध को कुछ बदमाशों ने नहीं तोड़ा होता तो ऐसा नहीं होता."

लेकिन स्थानीय नागरिकों की शिकायत है कि बराक नदी का बांध टूटने के बाद अगर प्रशासन ने सही उपाय किए होते तो इतनी ज़्यादा बाढ़ नहीं आती. इस संदर्भ में स्थानीय नागरिकों के एक मंच ने चार जून को ज़िला उपायुक्त से लिखित में अपील भी की थी.

असम में अब भी 22 ज़िले बाढ़ की चपेट में हैं जहां 2254 गांव बाढ़ प्रभावित बताए गए हैं. असम आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से जारी बाढ़ रिपोर्ट में इस समय 21 लाख 52 हज़ार से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. राज्य सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित ज़िलों में खोले गए राहत शिविरों में 1 लाख 91 हज़ार से ज़्यादा बेघर हुए लोगों ने शरण ले रखी है.

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