योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- बुलडोज़र का दंगों से संबंध नहीं, क्या कहते हैं अभियुक्तों के परिजन

    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ से
  • पढ़ने का समय: 16 मिनट

सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा हलफ़नामा दायर कर प्रयागराज और कानपुर में बुलडोज़र की कार्रवाई के बारे में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि नियमों का पालन करते हुए घर गिराने की कार्रवाई की गई और करवाई का दंगों से कोई लेना देना नहीं हैं.

यूपी सरकार का आरोप है कि याचिकाकर्ता जमीयत उलेमा-ए हिंद ने कोई भी तथ्य नहीं दिए हैं और सिर्फ़ मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर सरकार और उसके अधिकारियों के ख़िलाफ़ आरोप लगाए हैं.

यूपी सरकार का कहना है कि वो संदिग्ध दंगाईयों के ख़िलाफ़ सीआरपीसी,आईपीसी,गैंगस्टर एक्ट और अन्य रिकवरी और कुर्की के कानूनों के तहत कर रही है.

हलफ़नामे में सरकार ने ये भी कहा कि बुलडोज़र की कार्रवाई को चुनौती हाईकोर्ट में देनी चाहिए थी ना कि सुप्रीम कोर्ट में और ये चुनौती बुलडोज़र की कार्रवाई से प्रभावित लोगों को देनी चाहिए.

किस माहौल में हो रही है यह कार्रवाई?

जब पुलिस संदिग्ध दंगाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर ही रही थी, उसी दौरान उत्तर प्रदेश के नेताओं के बयान भी आने लगे थे.

14 जून को उन्नाव से बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने बुलडोज़र की कार्रवाई के बारे में समाचार चैनल आज तक से कहा कि, "हमारे यहां तो बाबा योगी आदित्यनाथ हैं उत्तर प्रदेश में, अगर शुक्रवार को पत्थर चलेगा तो शनिवार को बुलडोज़र ज़रूर चलेगा."

प्रयागराज में जुमे की नमाज़ के बाद फैली हिंसा के बाद पुलिस कार्रवाई चल ही रही थी कि देवरिया से बीजेपी विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने एक थाने के अंदर का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था, जिसमें कुछ युवकों को पुलिस कमरे में खड़ा करके लाठियों से पीटती दिख रही थी और वो हाथ जोड़ कर रहम की भीख मांग रहे है. विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने इस वीडियो का कैप्शन "बलवाइयों को रिटर्न गिफ़्ट" लिख कर इसे 11 जून को ट्वीट किया.

सांसद साक्षी महाराज ने दंगे की कार्रवाई के सवाल के जवाब में बुलडोज़र का ज़िक्र किया, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि, "उसने नियमों का पालन करते हुए घर गिराने की कार्रवाई की और उसका दंगों से कोई लेना देना नहीं है."

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इमेज कैप्शन, बीती 12 जून को जावेद मोहम्मद के घर को बुलडोज़र से ढहाया गया

क्या अभियुक्त जावेद मोहम्मद को घर गिराने के पहले मिले पर्याप्त नोटिस?

संदिग्ध दंगाइयों पर बुलडोज़र की कार्रवाई का योगी सरकार पर आरोप सुप्रीम कोर्ट तब पहुंचा जब प्रयागराज में प्रशासन ने एक्टिविस्ट जावेद मोहम्मद को दंगों का मास्टरमाइंड बता कर गिरफ़्तार किया और उसके बाद शहर के करेली इलाक़े में उनके दो मंज़िला घर को प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीडीए) ने बुलडोज़र चला कर गिरा दिया.

उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप कि गिरफ़्तारी के ठीक बाद जावेद के घर को गिराने की कार्रवाई हुई और घर जावेद मोहम्मद का नहीं बल्कि उनकी पत्नी के नाम पर था.

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उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार ने घर को गिराने की कार्रवाई का पूरा क्रम अपने हलफ़नामे में दिया है.

राज्य सरकार का कहना है कि 4 मई 2022 को मिली एक शिकायत में आरोप लगाया गया कि जावेद मोहम्मद के प्लॉट पर निर्माण बिना नक्शा पास कराए हुआ और उसका इस्तेमाल वेलफे़यर पार्टी ऑफ़ इंडिया के दफ्तर चलाने के लिए हो रहा है, जो कि लैंड यूज़ के ख़िलाफ़ है. शिकायत में ये भी लिखा था कि उनके घर में लोगों का आना जाना लगा रहता है. जिसकी वजह से वहां गाड़ियां खड़ी रहती है और यातायात बाधित होता है.

शिकायत तीन नामज़द लोग सरफ़राज़, नूर आलम, मोहम्मद आज़म और उस मोहल्ले के सम्मानित लोगों के नाम से दी गयी. तीनों नामज़द लोग कौन हैं उनके बारे में हलफ़नामे में तीन शिकायतकर्ताओं के नाम के अलावा कोई अन्य जानकारी मौजूद नहीं है.

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  • 10 मई 2022 को पीडीए ने जावेद मोहम्मद को एक कारण बताओ नोटिस जारी कर सुनवाई के लिए पेश होकर अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया. सुनवाई की तारीख 24 मई के लिए तय की गई. सरकार का दावा है कि ये नोटिस उनके हाथ में देने की कोशिश की गई लेकिन नोटिस देने वाले व्यक्ति का कहना है कि परिवार ने नोटिस लेने से इंकार कर दिया. इसलिए नोटिस को घर पर चस्पा कर दिया गया.
  • 19 मई 2022 को एक और शिकायत जेके आशियाना कॉलोनी के निवासियों ने प्रशासन को दी. जिसमें उन्होंने 4 मई की शिकायत पर कोई प्रशासनिक कार्रवाई न होने का ज़िक्र किया. इसमें भी तीन शिकायतकर्ता सरफ़राज़, नूर आलम और मोहम्मद आज़म के नामों का ज़िक्र है.
  • सरकार का कहना है कि सुनवाई के दिन यानी 24 मई 2022 को ना जावेद मोहम्मद ना ही उनका कोई प्रतिनिधि पेश हुआ.
  • 25 मई 2022 को पीडीए ने जावेद मोहम्मद को अपना घर 15 दिनों के अंदर खुद गिराने का आदेश दिया था. कहा कि 9 जून 2022 तक वो अपना घर नहीं गिराते हैं तो पीडीए (प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी) उनका घर गिराने की कार्रवाई करेगी.

यूपी सरकार का दावा है कि ये नोटिस भी जावेद मोहम्मद के परिवारवालों ने लेने से इंकार कर दिया जिसके बाद इस नोटिस को भी जावेद मोहम्मद के घर पर चस्पा कर दिया गया.

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जावेद मोहम्मद हुए गिरफ़्तार, बताए गए मास्टरमाइंड

10 जून की घटना के आरोप में प्रयागराज पुलिस ने जावेद मोहम्मद को गिरफ़्तार कर लिया और क्योंकि जावेद मोहम्मद ने अपना घर खुद नहीं गिराया, इसलिए 10 जून 2022 को पीडीए ने उन्हें अपना घर 12 जून को 11 बजे तक खाली करने का आदेश दिया ताकि घर को गिराया जा सके.

सरकार का आरोप है कि ये नोटिस भी परिवार वालों को देने की कोशिश की गई लेकिन उन लोगों ने लेने से इंकार कर दिया जिसे फिर बाद में घर पर चस्पा कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट को दिए हलफ़नामे में सरकार का दावा है कि उन्होंने नियमों का पालन करते हुए घर गिराने की कार्रवाई की और उसका दंगों से कोई लेना देना नहीं हैं.

लेकिन 10 जून की हिंसा के बाद पुलिस की संदिग्ध दंगाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बारे में 11 जून को जानकारी देते हुए प्रयागराज के एसएसपी अजय कुमार ने मीडिया को कहा, "जो अवैध निर्माण इनके हैं उनका पीडीए के द्वारा होमवर्क करते हुए ध्वस्तीकरण की भी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी. गैंगस्टर एक्ट लगा कर 14A के तहत इनकी काली कमाई की संपत्तियों का भी ज़ब्तीकरण किया जाएगा. किसी भी एंगल से इनकों बख्शा नहीं जाएगा."

दंगे के एक दिन बाद 11 जून को पीडीए के ज्वाइंट सेक्रेटरी अजय कुमार ने भी करेली में मौजूद मीडिया को बयान दिया कि, "यहां सर्वे ये किया जा रहा है जो आरोपी लोग हैं उनके मकान या दुकान जो भी हैं उनका नक्शा हमारे यहां पास है या नहीं. अगर नहीं पास है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी. उसका चिन्हितकरण किया जा रहा है. 37 लोगों की लिस्ट है मेरे पास उन्हीं का चिन्हितकरण अभी किया जा रहा है."

जब ज्वाइंट सेक्रेटरी अजय कुमार से सवाल किया गया कि अभी तक जांच में क्या पाया गया है, तो उन्होंने कहा, "अभी शुरू हुआ है. चेक किया जा रहा है. नियमानुसार कार्रवाई होगी शासन प्रशासन के आदेश पर."

साथ ही सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल हलफ़नामे में यूपी सरकार ने कहा है, कि "प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी एक स्वायत्त वैधानिक संस्था है, जो प्रवर्तन की कार्रवाई स्वतंत्र रूप से करती हैं."

इमेज कैप्शन, इलाहाबाद हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील रवि किरण जैन वरिष्ठ वकील

यूपी सरकार के सुप्रीम कोर्ट हलफ़नामे पर लोगों की राय

यूपी सरकार कहना है कि दंगों की कार्रवाई और बुलडोज़र की कार्रवाई दोनों अलग- अलग हैं. तो याचिकाकर्ता अपने आरोप को कैसे साबित करेंगे? इस बारे में प्रयागराज के वरिष्ठ वकील रवि किरण जैन कहते हैं, "अदालत उससे जुड़ी परिस्थितियों को देख सकता है और यह जांचने के कोशिश कर सकता है कि क्या प्रशासन ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का इस्तेमाल एक सज़ा के रूप में कर रहा था. क्योंकि सवाल यही है कि वो दंगो में शामिल होने की सज़ा से जुड़ा था या नहीं."

यूपी सरकार का दावा कि प्रयागराज डेवलपमेंट ऑथॉरिटी (पीडीए) के घर गिराने की कार्रवाई एक स्वायत्त संस्था द्वारा स्वतंत्र कार्रवाई है, इस बारे में रवि किरण जैन कहते हैं, "पीडीए में भी ब्यूरोक्रैट्स हैं. वो हमेशा स्वतंत्र रूप से काम नहीं करते हैं. क्योंकि उनके पास घर गिराने जैसे अधिकार हैं तो यह माना जाता है कि वो स्वतंत्र रूप से काम करेंगे. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता है. ज़िले का डीएम पीडीए का वाइस चेयरमैन होता हो. यह कहना कि पीडीए की ध्वस्तीकरण की कार्रवाई इतनी निष्पक्ष थी और उसमें राज्य सरकार की कोई मिलीभगत नहीं थी, ऐसा सही नहीं लगता है."

यूपी सरकार के हलफ़नामे के बारे में जावेद मोहम्मद के वकील के के रॉय का कहना है, "हो सकता है कि पीडीए ने कार्रवाई नियमानुसार और अपने एक्ट और प्रावधानों के आधार पर की हो. लेकिन इसकी टाइमिंग को ज़रा सा देखिए. शुक्रवार10 जून को हिंसा हुई, पत्थरबाज़ी हुई. 10 तारीख की शाम तक आते आते उन्होंने कहा कि यही मास्टर माइंड है. और 11 को ऐलान करते हैं कि घर बुलडोज़र से गिरेगा."

के के रॉय कहते हैं, "जावेद के घर वालों ने शपथ लेकर कहा है कि कोई भी पीडीए का व्यक्ति हमारे घर में बीवी बच्चे किसी के सामने उन नोटिसों को लेकर नहीं आया है.और वो नोटिस तब आई जब प्रशासन ने कहा कि हम बुलडोज़र चलाएंगे और जब जावेद मोहम्मद गिरफ़्तार होकर जेल चले गए."

इमेज कैप्शन, असुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रयागराज जिला अध्यक्ष शाह आलम के भाई सैय्यद मक़सूद अहमद को मिला नोटिस

क्या प्रयागराज में दंगों के दूसरे अभियुक्तों को भी मिले हैं नोटिस?

तो सवाल यह उठता है कि प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी ने जावेद मोहम्मद के अलावा 10 जून की हिंसा के और किन दूसरे आरोपियों के घरों पर नक्शा पास न होने की वजह से नोटिस जारी किया है, और क्या हाल फ़िलहाल में इस घटना के पहले प्रयागराज के करेली में लोगों घर गिराने की कार्रवाई पीडीए ने की है?

प्रयागराज में 10 जून की हिंसा के मामले में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रयागराज ज़िला अध्यक्ष शाह आलम भी अभियुक्त हैं और उनके ख़िलाफ़ पुलिस ने गैर ज़मानती वारंट जारी किया है. शाह आलम कहाँ हैं, ये किसी को नहीं पता है.

लेकिन अब उनके भाई सैय्यद मक़सूद अहमद के घर पर भी पीडीए ने नोटिस चस्पा किया है. नोटिस 14 जून का है जिसमें 29 जून तक उन्हें कारण बताना है कि घर बिना पीडीए की अनुमति के कैसे बनाया और प्राधिकरण इसे गिराने के आदेश क्यों नहीं पारित करे.

इस नोटिस की पुष्टि बीबीसी से एआईएमआईएम के प्रदेश प्रवक्ता मोहम्मद फ़रहान ने की. उनका कहा, "जावेद मोहम्मद का घर, शाह आलम का घर अगल-बगल में हैं, एकदम सटे हुए हैं. अब उनके भाई सैय्यद मक़सूद अहमद के घर पर नोटिस चस्पा कर दिया गया है. यह सैय्यद मक़सूद अहमद साहब देश में रहते भी नहीं हैं. परिवार का यहां कोई नहीं रहता."

मोहम्मद फ़रहान का आरोप है कि नोटिस 24 जून को चस्पा की गई. वो कहते हैं, "लेकिन नोटिस 14 जून की है. अगर 14 को जारी हुई थी तो 15 को लगा देते, 16 को लगा देते. लेकिन आपने 24 की रात को नोटिस लगाई. हमने खुद व्यक्तिगत जाकर चेक किया है. हमें अगल बगल के लोगों ने बताया कि कल लगा कर गए हैं."

इमेज कैप्शन, हिंसा के आरोप में गिरफ्तार साहब के पिता भैया जी

बीबीसी ने हिंसा के मामले में गिरफ़्तार किए गए तीन संदिग्ध दंगाइयों के घर जाकर यह जानने की कोशिश की कि क्या उन्हें भी जावेद मोहम्मद की तर्ज़ पर पीडीए के नोटिस आए हैं.

करेली नयापुरा के 29 साल के साहब को भी प्रयागराज पुलिस ने गिरफ़्तार किया है. उसके घर वाले कहते हैं कि वो अपनी दुकान के काम के सिलसिले में बाहर गया था और पुलिस ने तभी उसे गिरफ़्तार कर लिया. उसके पिता ने बताया कि उन्हें पीडीए का कोई नोटिस नहीं आया है. उनका घर नज़ूल की ज़मीन पर बना है और वो उसका बाकायदा हाउस टैक्स और वॉटर टैक्स अदा करते हैं. इसके बावजूद क्या उन्हें लगता है कि उन्हें नोटिस आ सकता है? साहब के पिता कहते हैं, "अब तो ऊपर वाला जाने कि क्या होगा, फ़िलहाल हमें कोई नोटिस नहीं आया है."

34 साल के मोहम्मद शहीद करेली के जीटीबी नगर थाने इलाके के रहने वाले हैं. पेशे से वो ड्राइवर हैं और उन्हें भी प्रयागराज पुलिस ने गिरफ़्तार कर जेल भेजा है. उनके पिता इश्तियाक़ अहमद ने बीबीसी को बताया कि उनके बेटे की गिरफ़्तारी के बाद घर पर पीडीए के अधिकारी, लेखपाल और तहसीलदार आए थे.

उन्होंने बताया, "उन्होंने पूछा था कि क्या शहीद का घर यही है, तो हमने कहा यही है. फिर उन्होंने पूछा कि क्या आवास विकास का कोई नक्शा है तो हमने कहा कि आवास विकास में किसी का नक्शा नहीं है. 60 गज में कौन सा नक्शा होता है. 100 गज के ऊपर होता है तो नक्शा होता है. तो उन्होंने रिपोर्ट लगाकर अपनी ऑनलाइन प्रक्रिया जो है वो कर दी. बात ख़त्म हो गयी और वो चले गए. कोई नोटिस नहीं आया."

बीबीसी ने रहमत नगर के निवासी 59 साल के स्पोर्ट्स लेक्चरर अकील अब्बास रिज़वी के घर जाकर जानने की कोशिश की, कि क्या उनकी गिरफ़्तारी के बाद उनके परिवार को नोटिस आया या नहीं. लेकिन उनके घर पर किसी से मुलाक़ात नहीं हो सकी.

इमेज कैप्शन, करेली के पार्षद के पति और कांग्रेस के नेता नफीस अहमद

जनता को बना रहे हैं जागरूक

क्या जावेद मोहम्मद का घर गिराने के बाद प्रयागराज के करेली के लोग अब अपने घरों के कागज़ात को खंगाल कर देख रहे हैं? इस बारे में करेली के पार्षद के पति और कांग्रेस के नेता नफ़ीस अहमद कहते हैं, "ज़ाहिर सी बात है. हम लोग भी आम जनता को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं कि अगर आपका नक्शा नहीं है तो आप अप्लाई कर दीजिए. हम लोगों को डरा नहीं रहे हैं. हम लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं. जब हम 50 लाख का घर बना सकते हैं तो हम 2 लाख, 5 लाख का नक्शा क्यों नहीं बना सकते सकते हैं."

नफ़ीस अहमद कहते हैं, "बुलडोज़र को लेकर जो आम लोगों में दहशत फैलाई गई वो अच्छी चीज़ नहीं है. बल्कि अब यह सन्देश देना चाहिए कि सरकार क़ानून के हिसाब से चलने वाली सरकार है. जो नियमों का पालन करेगा उसके लिए कोई डर की बात नहीं है. यह संदेश देना चाहिए."

तो फिर जावेद मोहम्मद का घर सही गिराया गया या ग़लत? नफ़ीस अनवर कहते हैं, "जावेद मोहम्मद का घर जो जल्दबाज़ी में गिराया है उसको हम सही नहीं मानते हैं. इस तरह का क़ानून हमारे यहाँ नहीं है. इस देश के अंदर लोकतंत्र है. यह मकान में जहां आप बैठे हैं, यह मेरी पत्नी के नाम है. अगर हमसे कोई भूल ग़लती हो जाये तो सजा के हक़दार हम हैं या हमारी पत्नी हैं?"

इमेज कैप्शन, के.के. रॉय, जावेद मोहम्मद के वकील

क्या उठ रहे हैं सवाल और क्या है प्रशासन का कहना?

यूपी सरकार के हलफ़नामे से यह बात सामने आई है कि जावेद मोहम्मद के घर पर कार्रवाई कुछ लोगों की शिकायत के आधार पर शुरू हुई. शिकायत तीन नामज़द लोग सरफ़राज़, नूर आलम, मोहम्मद आज़म और उस मोहल्ले के सम्मानित लोगों के नाम से दी गयी. हालांकि तीनों नामजद लोग कौन हैं उनके बारे में हलफ़नामे में कोई जानकारी नहीं है.

जावेद मोहम्मद के वकील के के रॉय ने हलफ़नामे में संलग्न शिकायती पत्र देख कर कहा कि, "शिकायत करने वाले का न कोई नंबर लिखा गया है, न कोई फ़ोन नंबर है, और ना ही कोई हुलिया बताया गया है." के के रॉय इस शिकायत के सत्यता पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि घर की सेल डीड के हिसाब से उस घर की मालकिन जावेद की पत्नी परवीन फ़ातिमा हैं. तो जो भी नोटिस जानी चाहिए थी, वो परवीन फ़ातिमा के नाम जानी चाहिए थी. तो सवाल यह उठता है कि आख़िरकार पीडीए से शिकायत करने वाले यह यह शिकायतकर्ता हैं कौन?

जावेद मोहम्मद के वकील के के रॉय का आरोप है कि, "जब सरकार ने हिंसा के बाद ऐलान किया कि इनका घर बुलडोज़र से गिराएंगे तब इन्होंने तारीखें तय कीं. किसी भी कार्रवाई में यह अंतिम विकल्प है कि आप मकान गिराइए." तो यह सवाल बना हुआ है कि क्या पीडीए की कार्रवाई और पुलिस की कार्रवाई का कोई कनेक्शन नहीं है?

के के रॉय कहते हैं, "अवैध निर्माण के मामलों में लोगों को जुर्माना देकर अपना नक्शा पास करने का मौक़ा दिया जाता है. अगर जुर्माना नहीं भरा जाता है तो उस घर को सील किया जाता है. अगर उसके बाद भी अगर वो घर गैरक़ानूनी पाया जाता है तो फिर उन्हें घर गिराने के लिए 40 दिन का समय दीजिए. और गिराने के आदेश के बाद उन्हें 30 दिन के अपील का समय दीजिए." तो सवाल यह उठता है कि क्या पीडीए ने इस प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की या नहीं?

10 जून की प्रयागराज हिंसा मामले में पुलिस ने 104 लोगों को गिरफ़्तार किया है. लेकिन घर पर बुलडोज़र सिर्फ़ जावेद मोहम्मद के घर पर चला. तो सवाल यह भी बना हुआ है कि क्या यह नोटिस 10 जून को जारी हुए या उससे पहले?

बीबीसी ने प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी के वीसी अरविन्द चौहान से मुलाकात कर इन सभी सवालों के जवाब जानने चाहे. लेकिन उन्होंने मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने की वजह से सिर्फ़ इतना कहा कि, "प्राधिकरण के लिए जो भी मैप सैंक्शन का कार्य होता है, बहुत ही रूटीन तरह का कार्य है.और जो व्यक्ति प्राधिकरण की सीमा में होता है उसको कंपल्सरी है कि प्राधिकरण से मैप सैंक्शन कराए. जब मैप सैंक्शन नहीं कराता है तब उसको एक टाइम देते हैं. उस टाइम में नहीं आता है, तो हम जो प्राधिकरण के एक्ट में जो नियम हैं उसके हिसाब से उसके ख़िलाफ़ में कार्रवाई भी करते हैं. और यह प्राधिकरण की बहुत ही रूटीन प्रक्रिया है."

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क्या सहारनपुर में भी मिले ध्वस्तीकरण के नोटिस?

एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दिया है कि प्रयागराज और कानपुर में घर गिराने की कार्रवाई को दंगों नही जुड़ी है, तो वहीं दूसरी तरफ़ 10 जून को सहारनपुर में हुई हिंसा में शामिल 3 आरोपियों को सहारनपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी की तरफ से घर न गिराने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए और उन्हें जवाब देने के लिए 24 जून को सुबह 10 बजे सहारनपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ़िस बुलाया था.

सहारनपुर विकास प्राधिकरण ने एक नोटिस शहवाज अली को दिया है जो कि सड़कदूधली गैस गोदाम के पास सहारनपुर में रहते हैं. इनको मिले नोटिस में सहारनपुर विकास प्राधिकरण ने लिखा है कि "लगभग 50 वर्ग गज भूतल में आवासीय भवन का निर्माण किया हुआ है. स्थल निरीक्षण के दौरान स्वीकृति नहीं दिखाई गई है" इसलिए वो 24 जून को 10 बजे कार्यालय पर उपस्थित होकर बताएं कि उनके इस अनधिकृत निर्माण को क्यों न तोड़ा जाए.

ऐसा ही दूसरा कारण बताओ नोटिस सहारनपुर विकास प्राधिकरण ने मेहराज को दिया है जिसका पता रामलीला भवन से आगे ठठेरो वाली गली, सहारनपुर लिखा है.

सहारनपुर विकास प्राधिकरण ने तीसरा कारण बताओ नोटिस मो. अली के नाम से दिया है जिनका पता पीर वाली गली लिखा है.

यह नोटिस सही हैं, इसकी पुष्टि सहारनपुर के वकील बाबर वसीम ने की जो अब इन लोगों की एसडीए के नोटिस का जवाब दाख़िल करने में मदद कर रहे हैं.

बाबर वसीम ने बीबीसी को 10 जून की घटना से जुड़ी एफ़आईआर भी दी जिससे यह नज़र आ रहा है कि जिन लोगों के नाम नोटिस जारी हुआ है - मोहम्मद अली, शहवाज अली और मेहराज -तीनों 10 जून की हिंसा के नामज़द आरोपी है और उनका नाम एफ़आईआर में दर्ज है.

वकील बाबर वसीम का कहना है कि वे सात लोगों को मिले ध्वस्तीकरण के नोटिस का जवाब दाख़िल करने में क़ानूनी सहायता कर रहे हैं. उन्होंने शुक्रवार 24 जून को कुछ लोगों के जवाब दाखिल किये हैं.

उन्होंने बताया कि उन्हें जवाब दाख़िल करने में परेशानी हुई और, "एसडीए ने 24 जून की डेट फिक्स की और जवाब देने के लिए सुबह 10 बजे मेरा क्लाइंट उनके ऑफ़िस पहुंच गया. सुबह 10 बजे से 4 बजे तक उन्हें नोटिस रिसीव करने के लिए वहां कोई नहीं मिला."

बाबर वसीम ने बताया , "हम सहारनपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (एसडीए) के वीसी से मिले तो वीसी ने कहा क्योंकि नोटिस एसडीए सचिव ने जारी किया है तो वो ही रिसीव करें. 4 बजे तक सभी लोग वहां पर मौजूद रहे हैं और 4 बजे तक एसडीए के सचिव नहीं आए. तो हमने ये कहा किसी भी ऑफ़िशियल से आप नोटिस रिसीव करा लीजिए. तो उन्होंने कहा कि एक चपरासी है उसको दे दीजिए. हम आपको रिसीविंग तो नहीं देंगे. कल सचिव आएंगे तो उनकी फ़ाइल में लगवा देंगे."

वकील बाबर वसीम कहते हैं कि उन्हें अड़चनों का अंदेशा था तो उन्होंने पहले ही 22-23 तारीख में जवाब रजिस्टर्ड पोस्ट से भेज दिए थे.

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क्या कहना है नोटिस मिलने वाले परिवारों का?

19 साल के मोहम्मद अली को भी सहारनपुर में 10 जून की हिंसा की घटना के बाद गिरफ़्तार कर लिया था और उनके नाम से सहारनपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने घर का नक्शा पास न होने का नोटिस भेजा.

मोहम्मद अली की माँ आसमां कहती हैं कि वो और उनका परिवार पिछले 4 साल से 50 गज के इस घर में रह रहा है और वो धीरे धीरे पैसा जोड़ कर उन्होंने इस घर को खड़ा किया है.

मोहम्मद अली को सहारनपुर विकास प्राधिकरण की तरफ] से नोटिस दिया गया जिसमें कहा गया है कि उनके घर पर बिना नक्शा पास कराए अवैध निर्माण किया गया और उन्हें कारण बताना है कि प्राधिकरण क्यों न इस घर को घर को गिराने की कार्रवाई करे.

आसमां ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने नोटिस का लिखित जवाब दे दिया है.

मोहम्मद अली को बेगुनाह बताते हुए वो कहती हैं, "हमारा बच्चा इस प्रोटेस्ट में नहीं था. फिर भी हमारे बच्चे को गिरफ़्तार कर लिया है. हर एविडेंस मेरे बच्चे के पक्ष में है कि ना वो प्रोटेस्ट में था, ना नमाज में शामिल था, फिर भी गिरफ़्तार किया है इन लोगों ने."

क्या घर का नक्शा पास है? इसके बारे में आसमां कहती हैं, "नक्शा सौ गज का पास होता है. निन्यानवे गज भी जगह है तो नक्शा नहीं पास होगा. ये उनके ही क़ानून के हिसाब से है ये."

तो घर से जुड़े ऐसे नोटिस मिलने पर आसमां कहती हैं, "बहुत भय महसूस होता है जिस दिन मेरे पास नोटिस आया मैं रोती-रोती वकील साहब के पास गई. वकील साहब को सारी बात बताई. इस नोटिस का जवाब वहां पर भी दिया है हमने. अब पता नहीं रिसीव किया है या नहीं किया है लेकिन हमने उनके नोटिस का जवाब दे दिया है."

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सहारनपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (एसडीए) का क्या कहना है

तो सवाल यह उठता है कि दंगे के दिन यानी कि 10 जून को एसडीए ने घर का नक्शा पास न होने के आरोप से जुड़े कितने कारण बताओ नोटिस जारी किए जिसमें कारण ना बताने से घर गिराने के कार्रवाई की चेतावनी दी गई है?

तो क्या अवैध निर्माण और उसे गिराने से जुड़े यह सभी नोटिस 10 जून यानी सहारनपुर के दंगे के दिन गए? सहारनपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी के वीसी आशीष कुमार का कहना है कि, "कितने नोटिस जारी होते हैं, इसकी गिनती बताना मुश्किल है. इसमें जैसे-जैसे अवैध निर्माण संज्ञान में आते रहते हैं तो उनके ख़िलाफ़ नोटिस जारी होते हैं."

नोटिस का जवाब जमा करने में मुश्किलों के आरोप के बारे में वीसी आशीष कुमार कहते हैं, "ऑफ़िस में एक प्रॉपर रिसीप्ट सेक्शन है जो सारी डाक रिसीव करता है. अफ़सर जवाब नहीं रिसीव कर सकते हैं. इसमें पूरा प्रोसेस फॉलो हो रहा है, जो क़ानून के तहत है वो किया जाएगा."

तो क्या संदिग्ध दंगाइयों और उनसे जुड़े लोगों को नोटिस जारी हुए हैं? इस बारे में एसडीए के वीसी आशीष कुमार ने कहा, "आप इसे दंगे की कार्रवाई से नहीं जोड़ सकते हैं. यह अवैध निर्माण के नोटिस हैं. हम यह नहीं देखते हैं कि वो दंगे के आरोपी है कि नहीं. वो हमारा काम नहीं है. जिसे नोटिस मिला है, अगर वो दंगे का आरोपी है तो वो संयोग हो सकता है. इस निष्कर्ष पर बाद में पहुंचा जा सकता है. लेकिन उसका कोई लिंक नहीं है."

लेकिन नोटिस 10 जून के हैं और हिंसा भी 10 जून की है? इस बारे में वीसी आशीष कुमार का कहना है, "हो सकता है अवैध निर्माण की जानकारी हमें उसी दिन मिली हो."

तो क्या पुलिस ने सहारनपुर विकास प्राधिकरण को दंगाइयों की कोई लिस्ट दी? इस बारे में वीसी कहते हैं, "इसमें एसडीए की सचिव आपको बेहतर बता पाएंगी. की यह लिस्ट आये भी थी कि नहीं. लिस्ट के बारे में वो बता सकती हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. जब भी कोई जानकारी आती है, हम अपनी इन्क्वारी करते हैं और नोटिस जारी करते हैं."

बीबीसी ने एसडीए की सचिव किंशुक श्रीवास्तव से इन सवालों के जवाब जानने चाहे लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया.

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