किसान ट्रैक्टर से गणतंत्र दिवस की परेड में पहुँच जाएंगे: राकेश टिकैत
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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ क़रीब दो हफ़्ते से राजधानी के नज़दीक ग़ाज़ीपुर सीमा पर डटे यूपी और उत्तराखंड के किसानों को शनिवार को मौसम में बढ़ी ठंड और बारिश भी नहीं डिगा पाई.
किसानों का कहना है कि जब तक सरकार नए क़ानून को वापस नहीं ले लेती, तब तक वो यहां से नहीं लौटेंगे.
भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत कहते हैं कि सरकार यदि अपनी ज़िद पर अड़ी रही तो किसान 26 जनवरी को ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए इंडिया गेट पर पहुंचेंगे.
बीबीसी से बातचीत में राकेश टिकैत कहते हैं, "अभी तक किसानों ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे आम लोगों को कोई परेशानी हो लेकिन यदि हमारी बातें नहीं सुनी जाती हैं तो हम आंदोलन को तेज़ करने के लिए बाध्य होंगे और सीमा पर जाम लगाएंगे. 26 जनवरी को किसान अपने ट्रैक्टरों के साथ इंडिया गेट पर पहुंचेंगे और राजपथ पर होने वाली परेड में शामिल होंगे."
राकेश टिकैत कहते हैं कि 'किसानों के लिए इससे पहले बनाए गए क़ानून भी किसानों का नुकसान करने वाले थे लेकिन अब जो नया क़ानून बनाया गया है, वो तो पूरी तरह से किसानों को बर्बाद कर देगा.'
वो कहते हैं, "अभी सरकारी ख़रीद केंद्र पर भी एमएसपी पर अनाज आसानी से नहीं बिक पाते, जब निजी क्षेत्र के हवाले ये कर दिया जाएगा, तब भला कोई कैसे एमएसपी पर अऩाज ख़रीदेगा. इसीलिए हम चाहते हैं कि सरकार एमएसपी पर लिखित और क़ानूनी गारंटी दे कि एमएसपी से नीचे दाम पर कोई भी किसान का अनाज नहीं ख़रीद सकेगा."
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'किसान पूरी तैयारी से आए हैं'
राकेश टिकैत इन अफ़वाहों को पूरी तरह से ख़ारिज करते हैं कि यूपी के सभी इलाक़ों के किसान प्रदर्शन में शामिल नहीं हैं.
वो कहते हैं, "पूर्वांचल और दूर-दराज के किसान इतनी दूर भले ही न आ पा रहे हों लेकिन वो अपने ज़िलों में इस क़ानून का विरोध कर रहे हैं. जब ज़रूरत होगी वो यहां पहुँच जाएंगे. कुछ किसान खेती के कामों में भी उलझे हुए हैं. जो लोग भी ये अफ़वाह फैला रहे हैं कि किसान सिर्फ़ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं, उन्हें यहां आकर देखना चाहिए कि लोग कहां-कहां से आए हैं."
दूर-दराज के किसानों के न आ सकने की एक बड़ी वजह राकेश टिकैत ट्रेनों के न चलने को भी बताते हैं. हालांकि यूपी के कई ऐसे ज़िलों से भी किसान प्रदर्शन स्थल पर मौजूद हैं जो कि दिल्ली से चार-पाँच सौ किमी दूर हैं.
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लखीमपुर के पलिया से आए किसान रविंदर सिंह कहते हैं कि उनके साथ सौ से भी ज़्यादा लोग चार दिन पहले यहां आए थे और तब से सभी लोग यहीं पर हैं. जबकि यूपी के रामपुर ज़िले से आए दर्जनों किसानों का कहना था कि वो लोग पूरी तैयारी से आए हैं और यहां कई दिनों तक रह सकते हैं.
रामपुर के ही बिलासपुर से आए युवा किसान शमशेर सिंह कहते हैं, "हम लोग तीन दिन तक तो इधर-उधर चक्कर काटते रहे लेकिन पुलिस वाले जगह-जगह रास्ता रोक रहे थे. बड़ी मुश्किल में नौ दिसंबर को यहां पहुंचे. हमारे साथ रामपुर और बरेली से सैकड़ों लोग आए हैं और सभी लोग अपने ट्रैक्टरों और अपनी गाड़ियों से आए हुए हैं. सरकार की बात पर भरोसा इसलिए नहीं है क्योंकि हम लोगों का इस सरकार से भरोसा पहले से ही उठ चुका है."
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'आढ़तियों को बिचौलिया बताकर दुश्मन बताया जा रहा है'
ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर कुछ किसान अपने परिवारों के साथ भी आए हुए हैं. मेरठ के रहने वाले रघुराज सिंह ऐसे ही किसान हैं. उनके साथ उनकी बूढ़ी मां, पत्नी और दो बच्चे भी हैं. ट्रैक्टर की ट्रॉली पर ही घरनुमा ठिकाना बना लिया है.
वो कहते हैं, "खेती का काम अपने चचेरे भाई को सौंप कर आ गया हूं. वो ही देख रहा है. ज़्यादा ज़मीन नहीं है लेकिन जो है उस पर गन्ना बो रखा है."
वहीं रामपुर से आए कि सान हरनाम सिंह कहते हैं कि आढ़तियों को बिचौलिया बताकर हमारा दुश्मन बताया जा रहा है.
वो कहते हैं, "आढ़ती तो किसानों के लिए चलते-फिरते एटीएम जैसे होते हैं. किसानों को अक़्सर रुपए-पैसों की ज़रूरत होती है. हम अपनी फसल बेचते हैं तो तुरंत पैसा नहीं मिलता, चीनी मिल वाले तो महीनों पैसा रोके रहते हैं, ऐसी स्थिति में हम किसानों की मदद आढ़ती लोग ही करते हैं. तो आढ़ती और किसान का संबंध दोस्ती का होता है, दुश्मनी का नहीं."
शनिवार को किसानों ने यूपी के टोल प्लाज़ा को फ़्री करने की घोषणा की थी. इस घोषणा की वजह से टोल प्लाज़ा पर बड़ी संख्या में पुलिस बल भी तैनात किए गए थे, फिर भी कई जगह किसानों ने टोल फ़्री कराने में सफलता पाई.
14 दिसंबर से किसानों ने हर ज़िला मुख्यालय में प्रदर्शन की घोषणा की है और दिल्ली में आंदोलन और तेज़ करने की तैयारी में हैं.
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