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भारत-चीन सीमा: गलवान घाटी की ताज़ा सैटेलाइट तस्वीर क्या कहती हैं?
भारत के तमाम बड़े अख़बारों ने आज एक ख़बर प्रमुखता से छापी है. ख़बर भारत-चीन सीमा पर तनाव से जुड़ी है.
इन ख़बरों में लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी में 22 जून 2020 की सैटेलाइट तस्वीरों का ज़िक्र है. इन तस्वीरों के आधार पर अख़बारों ने छापा है कि 15-16 जून की रात गलवान घाटी में जहाँ दोनों सेनाओं के बीच हिंसक झड़प हुई थी, वहाँ दोबारा चीनी सेना दिख रही हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अख़बार की लीड लगाई है- सैटेलाइट इमेज बताते हैं, पीएलए ने संघर्ष की साइट पर कैंप लगा लिए हैं. हालाँकि अख़बार ने खब़र के साथ कोई सैटेलाइट इमेज नहीं लगाई है.
हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार कह रहा है- सैटेलाइट इमेज संकेत दे रहे हैं, कोई पीछे नहीं हटा है. हिंदुस्तान टाइम्स ने ये ख़बर बॉक्स बना कर छापी है.
इंडियन एक्सप्रेस ने लीड लगाई है - सैटेलाइट तस्वीर में गलवान में चीनी सेना दिख रही है. इसी तरह की हेडलाइन कमोबेश हिंदी के अख़बारों और टीवी चैनलों में भी चल रही हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी इन सैटेलाइट तस्वीरों को ट्वीट किया है.
ये सैटेलाइट तस्वीरें मैक्सार टेक्नोलॉजी ने खींची है. बीबीसी इनकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता.
लेकिन भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद के मद्देनज़र ये काफ़ी अहम है, इसलिए हमने इन तस्वीरों की अहमियत जानने के लिए बात की लेफ़्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (रिटायर्ड) से.
लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) संजय कुलकर्णी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर 1982 से 1984 तक तैनात थे. फिर 2013 से 2014 तक उन्होंने भारतीय सेना के 14 कोर के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के तौर पर भी काम किया. 2014 से 2016 तक वो सेना के इंफ़ैन्ट्री विभाग में डीजी के पद पर भी रहे हैं.
दोनों देशों की सीमा पर जिस इलाक़े से तनाव की ख़बरें आ रहीं है उन इलाक़ों में उन्होंने लंबा समय बिताया है और अच्छी समझ रखते हैं.
उन्हीं के शब्दों में जानिए इन तस्वीरों से इलाक़े में तनाव पर क्या कहा जा सकता है.
उनके साथ बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह के साथ बातचीत के अंश :
सवाल : इस तरह के सैटेलाइट इमेज कितने सही होते हैं?
लेफ़्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी(रिटायर्ड) - ऐसी सैटेलाइट तस्वीरों की व्याख्या सही से करना बेहद ज़रूरी है. इसका मतलब ये कि पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि ये तस्वीरें कितनी ऊंचाई से ली गई हैं, कितनी दूरी से ली गई हैं. तस्वीरों में आपको चीज़ें जितनी भयानक दिख रही हैं सीमा पर उतनी नहीं है. स्थिति चिंताजनक हैं, लेकिन सीमा के दोनों तरफ़ सैनिक हैं. भारत की तरफ़ भी और चीन की तरफ़ भी.
ऐसी तस्वीरें लेने वाले कई बार ग़लती कर जाते हैं. ये पता लगाने में दिक़्क़त आती है कि जहाँ सैनिकों का जमावड़ा दिख रहा है, दरअसल वो चीनी सैनिक हैं या फिर भारतीय सैनिक है.
ये पता लगाने में दिक़्क़त इसलिए भी आती है क्योंकि एलएसी की लाइन ख़ुद में एक परसेप्शन है. दोनों तरफ़ के दावे अपने-अपने हैं. इसलिए मेरा मानना है कि सैटेलाइट तस्वीरें बहुत हद तक सही होती हैं लेकिन पूरी तरह सही नहीं होतीं. अगर आपको उनको सही से पढ़ना नहीं आता हो तो दिक़्क़त आ सकती है.
सवाल : मैक्सार टेक्नोलॉजी ने जो सैटेलाइट तस्वीरें कल (बुधवार) जारी की हैं, क्या उसको देख कर ये कह सकते हैं कि 15 जून को जहाँ हिसंक झड़प हुई थी, वहाँ चीनी सेना की मौजूदगी अब भी है?
लेफ़्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (रिटायर्ड) - बिल्कुल कह सकते हैं. गलवान घाटी के पेट्रोलिंग साइट 14, पर थोड़ा कंफ्यूज़न हो सकता है. लेकिन उसकी दूसरी तरफ़ जो हाई-वे जी 219 का इलाक़ा है, वहाँ चीनी सेना का जमावड़ा दिख रहा है. इसमें कोई शक नहीं है. ये इमेज बिल्कुल सही लग रहे हैं. 2500 किलोमीटर का ये हाई-वे लद्दाख के पूर्वी इलाक़े में है, जिसमें से 180 किलोमीटर अक्साई चिन से गुज़रता है. एलएसी से इसकी दूरी 100 किलोमीटर है. भारत ने भी इस इलाक़े में अपना बिल्डअप किया है, जितना वो कर सकता है.
सवाल : मिलिट्री ऑपरेशन में क्या इस तरह की तस्वीरों का इस्तेमाल सेनाएँ करती हैं?
लेफ़्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी (रिटायर्ड): वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात सैनिकों तक ऐसी तस्वीरें आम तौर पर नहीं पहुँचती. लेकिन हाँ कमांड के स्तर पर ऐसी जानकारियां ज़रूर साझा की जाती हैं. अक्सर ऊपर के अधिकारी ( मंत्रालय से ब्रिग्रेडियर तक) इन जानकारियों पर अमल करते हैं. उन तक ही ये तस्वीरें पहुँचती हैं और रणनीति बनाई जाती है.
फिर सीमा पर तैनात सैनिकों के साथ प्लान साझा किया जाता है. ग्रांउड लेवल पर सैनिक वही देख पाते हैं, जो वो अपने पास मौजूद हथियार और दूरबीन के ज़रिए देख सकते हैं. हर सरकार के पास अपने यंत्र-तंत्र होते हैं ऐसी तस्वीरें खींचने के लिए.
सवाल: क्या इन तस्वीरों से पता लगा सकते हैं कि भारत-चीन गलवान सीमा पर डि-एस्कलेशन (तनाव कम) अभी नहीं हुआ है?
लेफ़्टिनेंट जनरलसंजय कुलकर्णी(रिटायर्ड): हमें ये समझना होगा कि डिसएंगेजमेंट होगा तो ही डि-एस्कलेशन होगा. दोनों एक दूसरे पर निर्भर करते हैं. डिसएंगेजमेंट का मतलब है सेनाएँ आपस में आमने-सामने ना हों और तभी तनाव दूर होगा. इन ताज़ा तस्वीरों को देख कर लग रहा है कि दोनों सेनाओं के बीच में दूरी है.
लेकिन इन तस्वीरों की तुलना बीते दिनों की तस्वीरों से करने की ज़रूरत होगी. मसलन किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले ये देखना होगा कि एक महीने पहले की तस्वीरें उसी इलाक़े की कैसी दिख रही थीं. कुछ सैटेलाइट 15 दिनों में इमेज लेते हैं, कुछ 21 दिनों में. उसके बाद ही पता लगाया जा सकता है कि दोनों समय में ग्राउंड पर कितना फ़र्क़ आया है. पहले कितने टैंक दिखे थे और अब कितने हैं. पहले वहाँ कितनी गाड़ियां दिख रही थी और अब कितनी हैं. तभी वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सकता है.
सवाल: क्या सैटेलाइट इमेज से पता चल सकता है कि 15 जून के बाद गलवान घाटी में संघर्ष की जगह निर्माण कार्य हुआ है या नहीं?
लेफ़्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी(रिटायर्ड): पता चल सकता है लेकिन इसमें दो दिक़्क़तें आ सकती हैं. पहली ये कि सैटेलाइट इमेज को पढ़ने वाला अच्छा होना चाहिए, नहीं तो ग़लतियां हो सकती हैं. दूसरी बात ये कि चीन भारत को बुद्धू ना बना रहा हो. ऐसा ना हो कि गत्ते की गाड़ी बना कर रखा हो और तस्वीर में बस एक छाया दिख रही हो. सैटेलाइट तस्वीरों को ठीक से पढ़ने वाला नहीं हुआ तो वो हर छाया को गाड़ी या तंबू ही समझ सकता है.
लद्दाख एक ऊंचाई पर बसे रेगिस्तान जैसा है. वहाँ ज्यादा पेड़ पौधे हैं नहीं. नदी है या पहाड़ है. इसलिए वहाँ सिर्फ़ परछाई होती है. जो तस्वीरों का सही जानकार होगा, उसको पता होगा कि किसी देश की सेना कैसे तंबू लगाती है, बंकर कैसे बनाती है, गाड़ियों की तैनाती कैसे करती है. इन सबको देख कर आसानी से पता लगाया जा सकता है कि निर्माण कार्य हो रहा है या नहीं. इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों की रेजोल्यूशन भी अहमियत रखती हैं. फ़िलहाल जो तस्वीरें टीवी चैनलों और अख़बारों में दिख रही है उसमें बहुत क्लीयर कुछ नहीं कहा जा सकता. अभी सिर्फ़ ये पता चल रहा है कि हाईवे जी-219 के पास चीनी सेना का जमावड़ा है.
सवाल : एक तरफ़ सैटेलाइट तस्वीरों को देखें और दूसरी तरफ़ दोनों देश बातचीत के टेबल पर बैठें हो - क्या एक साथ दोनों बाते संभंव हैं?
लेफ़्टिनेंट जनरल संजय कुलकर्णी(रिटायर्ड): बातचीत हो रही है और बातचीत होते रहनी चाहिए. बातचीत पर चीन अमल करे या ना करे, ऐसी सूरत के लिए भारत सरकार की तैयारी पूरी होनी चाहिए. ये सोच कर कि बातचीत असफल हो, उस सूरत में क्या विकल्प बचते हैं, किसी देश को उस मौक़े के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए. मेरी राय में चीन इस समय बातचीत की टेबल पर और टाइम बाय (समय माँगने) की रणनीति अपना रहा है. इससे ज़्यादा उसकी कोशिश कुछ और करने की मुझे नहीं दिखती.
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