कोरोना वायरस के दौर में मुंबई पुलिस के किस आदेश पर बरपा है हंगामा?
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- Author, मयूरेश कोण्णूर
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी मराठी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
सोशल मीडिया पर कोविड-19 से जुड़ी भ्रामक जानकारी फैलाने को लेकर मुंबई पुलिस के नए आदेश पर महाराष्ट्र में सियासत तेज़ हो गई है.
बीजेपी ने प्रदेश की शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी सरकार की आलोचना की है और कहा है कि कोरोना वायरस फैलने से रोकने में नाकाम रही प्रदेश सरकार अपनी आलोचना नहीं बर्दाश्त कर पा रही.
इस आदेश को मीडिया और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़िलाफ़ कदम भी कहा जा रहा है.
इधर, मुंबई पुलिस स्पष्ट किया है इसका उद्देश्य किसी को सरकार की आलोचना करने से रोकना नहीं है बल्कि भ्रामक जानकारियां फैलने से रोकना है.
मुंबई पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी डीसीपी प्रणय अशोक ने मई 23 को एक आदेश जारी कर कहा था, "ये देखने में आया है कि व्हाट्सऐप, ट्विटर, फ़ेसबुक, टिकटॉक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिय प्लेटफॉर्म और इंटरनेट मैसेजिंग के ज़रिए भ्रामक जानकारी, ग़लत जानकारी, वीडियो और तस्वीरें शेयर की जा रही हैं."
"इस तरह की जानकारी से आम जनता में डर और कंफ्यूज़न फैलता है, कोविड-19 महामारी रोकने के काम में लगे सरकारी कर्मचारियों के प्रति लोगों के मन में अविश्वास पैदा होता है और समुदायों के बीच भी आपसी भेदभाव बढ़ता है."
पुलिस के अनुसार ये निषेधाज्ञा आदेश 25 मई से 8 जून तक लागू रहेगी.
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आदेश में क्या कहा गया है?
आदेश के अनुसार इसका उद्देश्य कोविड-19 को लेकर लोगों के मन में डर और कंफ्यूज़न फैलने से रोकना है लेकिन ऐसा देखा जा रहा है कि राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता इससे खासे नाराज़ हैं.
आदेश के अनुसार, "कोई भी व्यक्ति ऐसी जानकारी शेयर न करे जिससे सरकारी कर्मचारियों में लोगों भरासा कम हो या फिर कोविड-19 महामारी को रोकने के उनके काम में बाधा पैदा हो, और न ही ऐसी जानकरी शेयर करे जिससे किसी की जान को ख़तरा हो या समाज में अशांति फैले."
आदेश के अनुसार इस तरह की भ्रामक जानकारी के लिए सोशल मीडिया ग्रूप के ऐडमिन को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा. और इस आदेश का उल्लंघन करने पर भारतीय दंड संहिता की दारा 188 के तहत सज़ा भी दी जा सकती है.
मुंबेई समेत महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में कोरोनो वायरस संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था इस चुनौती का सामना करने में संघर्षरत है. इस बीच सोशल मीडिया पर विपक्ष, आम आदमी और मीडिया सरकार की आलोचना कर रहे हैं.
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बीजेपी ने कहा है कि महाराष्ट्र में स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई है और मुंबई पुलिस का आदेश सरकार की आलोचना करने वालों को चुप कराने की कोशिश है.
प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष और विधायक मंगलप्रभात लोढ़ा ने बॉम्बे हाईकोर्ट में ये कहते हुए एक याचिका दायर की है कि ये आदेश असंवैधानिक है
वहीं बीजेपी नेता किरित सोमैय्या ने कहा है कि आदेश का उद्देश्य भ्रामक जानकारियों को फैलने से रोकना हो सकता है लेकिन इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के आवाज़ को दबाने के लिए भी किया जा सकता है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुझे डर है कि महाराष्ट्र में राजनेताओं के इशारे पर इस आदेश का इस्तेमाल आलोचकों की आवाज़ दबाने के लिए किया जा सकता है."
कुछ दिन पहले किरित सोमैय्या ने ट्विटर पर एक वीडियो साझा किया और दावा किया था कि ये कोविड-19 से जुड़ा वीडियो है. सोशल मीडिया पर ही मुंबई पुलिस ने उनकी ग़लती दुरुस्त करते हुए कहा था कि ये वीडियो पुराना है और कोविड-19 से इसका कोई नाता नहीं. बाद में ये ट्वीट डिलीट कर दिया गया था.
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आदेश पर राजनीतिक हलचल
इस मुद्दे पर राजनीतिक आलोचना और बहस शुरू होने के बाद, मुंबई पुलिस ने स्पष्ट किया है कि वो सरकार की आलोचना पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाना चाहते.
मुंबई पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी डीसीपी प्रणय अशोक ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा है, "इस आदेश का उद्देश्य किसी को सरकार की आलोचना करने से रोकना नहीं है. इसका उद्देश्य सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही ऐसी भ्रामक जानकारी को रोकना है जिससे सरकारी काम के प्रति लोगों का भरोसा कम न हो."
समाचार एजेंसी एएनआई ने मुंबई पुलिस पीआरओ डीसीपी प्रणय अशोक के हवाले से कहा, "यह आदेश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सरकार की आलोचना पर प्रतिबंध लगाने के लिए जारी नहीं किया गया है. इसका उद्देश्य सोशल मीडिया में ग़लत सूचना फैलने पर रोक लगाना है, जो सरकारी कार्यों में सार्वजनिक विश्वास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है"
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लेकिन राजनीतिक बहस को एक तरफ किया जाए तो क्या ऐसे मुश्किल वक्त में पुलिस के इस आदेश को नागरिकों और मीडिया केअधिकारों का हनन कहा जा सकता है?
वकील और मानव अधिकार कार्यकर्ता असीम सरोदे ने बीबीसी को कहा कि "अगर सोशल मीडिया पर कुछ लोग गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार कर रहे हों और भ्रामक जानकारियां फैला भी रहे हों तो भी ऐसे विषयों में इंसाफ को दरकिनार नहीं किया जा सकता है."
"ये आदेश सामाजिक व्यवस्था के सामने मौजूद ख़तरे को देखते हुए समाज में शांति बनाए रखने के उद्देश्य से है और इसलिए ये सही है. लेकिन यहां मुद्दा ये है कि कौन तय करेगा कि सोशल मीडिया पर लिखा कौन सा कमेंट या पोस्ट या फिर कौन सी राय सामाजिक शांति के लिए ख़तरा है. अगर पुलिस को ये तय करने का अधिकार है कि क्या क़ानून के ख़िलाफ़ है और वो कानूनी कार्रवाई भी कर सकती है तो ये क़ानून की उचित प्रक्रिया की मूल अवधारणा के ख़िलाफ़."
वो कहते हैं कि सरकार पर भरोसा न करना अपने आप में एक अस्पष्ट अवधारणा है. राज्य सरकार के किए ग़लत काम, मीडिया द्वारा सरकारी विभागों के काम का विश्लेषण मौलिक अधिकार के तहत है और इसे किसी सूरत में अपराध नहीं कहा जा सकता.
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कुछ मीडियाकर्मियों का कहना कि इस आदेश का इस्तेमाल ऐसे मीडिया के ख़िलाफ़ किया जा सकता है जो सरकार की आलोचना करते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत देसाई कहते हैं, "पत्रकारों का काम भी सोशल मीडिया पर प्रकाशित होता है. अगर ये जनता के हित में है प्रशासन की आलोचना करना मीडिया का अधिकार है. कोरोना महामारी के दौर में ये ज़रूरी है कि अगर मरीज़ों तक स्वास्थ्य सेवा न पहुंचे तो मीडिया उसकी ख़बर दिखाए. ये सकारात्मक आलोचना है. सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी फैलने से रोकना अगर गंभीर चिंता है तो इसे कोरोना काल तक ही क्यों सीमित रखा जाए? ग़लत जानकारी वाले पोस्ट पर तुरंत एक्शन लिया जाना चाहिए."
इसी साल अप्रैल के महीने में जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के अनुसार कोरोना महामारी के दौर में दुनिया भर की मीडिया की स्वतंत्रता ख़तरे में है. पेरिस स्थित रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर द्वारा संकलित 180 देशों की इस सूची में देशों की रैंकिंग और कोरोना महामारी को लेकर देशों की प्रतिक्रिया दर्ज की गई है.
इस सूची में बीते साल की तुलना में भारत दो स्थान नीचे खिसक आया है और अब 142वें स्थान पर है.
रिपोर्ट में भारत के बारे में कहा गया है, "यहां प्रेस की आज़ादी का लगातार उल्लंघन होता रहा है. इसमें पत्रकारों के ख़िलाफ़ पुलिस हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरफ से हमले और आपराधिक गुटों या भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों के बदल लेने के नाम पर की जाने वाली घटनाएं शामिल हैं."
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के महासचिव क्रिस्टोफ़ डेलॉयर का कहना है, "इस तरह की महामारी ऑथोरिटेरियन सरकारों को कड़े कदम लागू करने का मौक़ा देता है."
भारत में बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश और गुजरात के साथ-साथ कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ वो जगहें हैं जहां कोरोनो वायरस महामारी से जुड़ी ख़बरें करने के लिए कुछ स्थानीय पत्रकारों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की गई है.
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