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ट्रिपल तलाक़ के बाद समान नागरिक संहिता की बारी?
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय संसद ने मंगलवार को एक ही बार में तीन तलाक़ देने के तरीक़े को असंवैधानिक क़रार देने वाले बिल को पास कर दिया है.
ये बिल अब राष्ट्रपति के पास जाएगा और उनके हस्ताक्षर होते ही ये विधेयक क़ानून का रूप ले लेगा.
इस नए क़ानून के तहत अगर कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को एक ही बार में तीन तलाक़ दे कर अपनी शादी को तोड़ता है तो उसे तीन साल की जेल की सज़ा हो सकती है.
कुछ विपक्षी दलों ने और लगभग सभी मुस्लिम और सामाजिक संगठनों ने तीन तलाक़ क़ानून का विरोध किया था.
उनका कहना है कि मुस्लिम शादी एक 'सिविल कॉन्ट्रैक्ट' है और 'सिविल कॉन्ट्रैक्ट' में किसी भी पक्ष को उससे अलग होने की आज़ादी होती है.
उनके अनुसार शादी के कॉन्ट्रैक्ट से अलग होने को अपराध घोषित करना ईमानदारी भरा क़दम नहीं है.
सज़ा का प्रावधान
विपक्ष के कई नेताओं ने इसे धार्मिक आज़ादी की वजह से संविधान के ख़िलाफ़ भी बतया है.
सबसे अधिक विरोध इस बात पर था कि जब भारत में किसी भी धर्म में तलाक़ के मामले में सज़ा का प्रावधान नहीं है तो फिर सिर्फ़ मुसलमानों को तलाक़ के लिए क्यों सज़ा दी जा रही है.
कुछ ने कहा कि ये महिलाओं की सुरक्षा का क़ानून नहीं मुस्लिम पुरुषों को जेल में डालने और उन्हें ग़ैर मानवीय रूप में पेश करने की कोशिश है.
लेकिन क़ानून के कई विशेषज्ञ इस नए क़ानून को मुसलमानों के लिए पारिवारिक और लैंगिक समानता के संदर्भ में सुधार का पहला क़दम बता रहे हैं.
भारतीय मुस्लिम समाज दूसरी जातियों की तरह एक पारंपरिक समाज है और आम तौर पर खानदान और समाज के कुछ बुजुर्गों की तरफ से तमाम कोशिशों की नाकामी के बाद ही तलाक़ की बारी आती है.
दूसरे धर्मों की तुलना में...
लेकिन पिछले कुछ दशकों में रोज़गार और बेहतर मौक़ों के लिए बड़े पैमाने पर बड़े-बड़े शहरों में माइग्रेशन, एक्सपोज़र और आज़ादी से इंसानी रिश्तों और सामाजिक मूल्यों में बहुत ज़्यादा बदलाव आया है.
तलाक़ और ख़ास तौर से तीन तलाक़ के मामले में तेज़ी आई है.
भारत के मुसलामानों में शादी एक मज़बूत सामाजिक रिश्ता है लेकिन अपनी पत्नी को तलाक़ देना मुस्लिम समाज में दूसरे सभी धर्मों की तुलना में सबसे आसान है.
भारतीय संविधान में मुस्लिम औरत को तलाक़ के सिलसिले में किसी तरह की क़ानूनी सुरक्षा हासिल नहीं है.
शादी, तलाक़ और विरासत जैसे मामले अंग्रेज़ों के ज़माने से चले आ रहे हैं मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तय किए जाते रहे हैं.
मुसलमानों के मुद्दे
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक स्वतंत्र और बिना चुनाव के गठित संस्था है जो देश के सभी मुसलमानों का नुमाइंदा संगठन होने का दवा करता है.
मुसलमानों के विभिन्न पंथों के उलेमा और धार्मिक संगठनों से जुड़े लोग उसके अधिकारी और सदस्य हैं.
यही संस्था मुसलमानों के धार्मिक और दुनियाबी मामलों पर मुसलमानों और सरकार को गाइड करती रही है.
हालिया वर्षों में कई मुद्दों पर मतभेद के कारण इसमें फूट पैदा हुई है.
बीते सालों में देश में मुस्लिम महिलाओं के 'भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन' और 'वूमेन कलेक्टिव' जैसे बहुत से संगठन बने हैं.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
कई संगठनों ने शादी के लिए एक मॉडल निकाह नामा बनाने और एक ही बार में तीन तलाक़ के तरीक़े को समाप्त करने के लिए आंदोलन चलाया था.
एक मॉडल निकाह नामा तो बन चुका है लेकिन तीन तलाक़ और निकाह हलाला के सिलसिले में पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोई क़दम नहीं उठाया.
सोशल मीडिया और महिला संगठनो के माध्यम से इस तरह के तलाक़ और निकाह के मामले सामने आने लगे हैं.
मोबाइल फोन, वॉट्सऐप पर तलाक़ और ज़ुबानी तीन तलाक़ के सैकड़ों केस सामने आने लगे. लेकिन पर्सनल लॉ बोर्ड सुधार का कोई क़दम न उठा सका.
आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने एक मुक़दमे की सुनवाई के बाद तीन तलाक़ को गैर क़ानूनी क़रार दे दिया.
तीन तलाक़ का चलन
महिलाओं के कुछ संगठनों ने लाखों महिलाओं के हस्ताक्षर के साथ सरकार से मांग की कि वो मुस्लिम महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराए.
तीन तलाक़ का मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार के दौरान चर्चा का विषय बना था. सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इसे ख़ास मुद्दों में शामिल किया था.
मंगलवार को तीन तलाक़ बिल पास हो गया.
इसमें कोई शक नहीं कि इस क़ानून से तीन तलाक़ के चलन में कमी आएगी और तलाक़ देने का मामला अब इतना आसान नहीं होगा जितना इस क़ानून से पहले था.
लेकिन मोदी सरकार के इस क़दम का मक़सद तीन तलाक़ में सुधार से कहीं ज़्यादा अपने हिंदू समर्थकों को को ये मैसेज पहुँचाना लगता है कि उसने वो काम कर दिया जो कांग्रेस की सरकार मुस्लिम वोट बैंक के लिए कई दशकों तक भी नहीं कर सकी.
बीजेपी की सरकार
शाह बानो केस के बाद 1986 में राजीव गाँधी को ऐसा मौक़ा मिला था लेकिन वो वोट बैंक की वजह से रह गया.
इससे भी महत्वपूर्ण बिंदु ये है कि जिस आसानी से ये बिल संसद में पास हुआ है वो बीजेपी की सरकार के लिए काफी उत्साह जनक है.
सरकार ने इस पहलू का भी बहुत गहराई से निरीक्षण किया है कि इस बिल पर उलेमाओं के अलावा आम मुसलमानों का रवैया क्या है.
पूरे देश में मुसलामानों की तरफ से इसके बारे में कोई संगठित प्रतिक्रिया नहीं आई है.
बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में पूरे देश में यूनीफ़ॉर्म सिविल कोड लागू करने का वादा भी शामिल है.
समान नागरिक संहिता
अमरीका और यूरोपीय लोकतंत्र की तरह सभी धर्मों, बिरादरियों के लिए एक सिविल क़ानून की सिफारिश का विरोध सबसे पहले भारतीय संगठनों ने किया था.
लेकिन अब आम नज़रिया ये है कि सिर्फ मुस्लिम उलेमाओं और कुछ उदारवादी बुद्धिजीवी ही इसके विरोध में बचे हैं.
तीन तलाक़ का बिल पास होना बीजेपी की सरकार के लिए राजनीतिक लिहाज़ से एक बहुत बड़ी कामयाबी है.
मोदी सरकार लंबी राजनीतिक परियोजना पर अमल करती है. वो बड़े बदलाव और सुधार के लिए अब संसद का रास्ता अपनाएगी.
हवा इस समय बहुत अनुकूल है. यूनीफ़ॉर्म सिविल कोड बीजेपी का एक पुराना ख्वाब है जिसे वह पूरा होता देखना चाहती है.
ट्रिपल तलाक़ बिल ने यूनिफार्म सिविल कोड के लिए रास्ता खोल दिया लगता है.
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