'सिंहासन' के पास पहुंचकर फिसलने वाले राजनीतिक सूरमा
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- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
25 जुलाई 2012 को राष्ट्रपति भवन के सेंट्रल हॉल में जब कांग्रेस नेता प्रणब मुखर्जी भारत के 13वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ग्रहण कर रहे थे, वहां मौजूद तमाम लोग ये भलीभांति जानते थे कि प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति की जगह प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेना चाहते थे.
लेकिन नियति को ये मंज़ूर ना था और ऐसा एक नहीं बल्कि तीन बार हुआ जब कांग्रेस पार्टी के प्रति निष्ठावान होने के बावजूद प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई बताते हैं, ''वर्ष 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई, तब प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनने का पहली बार मौका मिला. वो उस समय इंदिरा गांधी के बाद पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखते थे, इंदिरा के विश्वासपात्र थे, पार्टी में क़द्दावर नेता थे.''
''इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को लगा कि वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं. दूसरी बार जब साल 2004 में कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी दलों को जनादेश मिला, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार हार गई, उस समय प्रणब मुखर्जी अपने राजनीतिक कौशल के बलबूते नंबर एक की पोजीशन में थे."
"तीसरा मौका तब आया जब साल 2011-12 में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे थे, तब यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी थी, उस समय कांग्रेस में कई नेता मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति और प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे.''
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राजीव गांधी की मंडली
कांग्रेस के प्रति निष्ठावान, राजनीतिक कौशल और क़द्दावर नेता होने के बावजूद प्रणब मुखर्जी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सके.
रशीद किदवई इसकी वजह बताते हैं, ''इंदिरा गांधी की हत्या के समय राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में थे, प्रणब मुखर्जी भी उनके साथ थे. हत्या की ख़बर मिलने पर दोनों दिल्ली रवाना हुए. विमान में राजीव गांधी ने प्रणब मुखर्जी से पूछा कि नेहरूजी के निधन के बाद क्या हुआ था, प्रणब मुखर्जी ने कहा गुलज़ारीलाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया क्योंकि वो सबसे वरिष्ठ थे. फिर राजीव ने पूछा शास्त्री के निधन के बाद क्या हुआ था, इसके जबाव में प्रणब ने कहा कि तब फिर गुलज़ारीलाल को वरिष्ठता के आधार पर ज़िम्मेदारी दी गई थी."
"लेकिन दिल्ली पहुंचने पर राजीव की मंडली के नेता प्रणब की बात का ये कहकर खंडन करते हैं कि वरिष्ठता का हवाला देकर वो ख़ुद प्रधानमंत्री बन जाना चाहते हैं. राजीव को राजनीति में आए तब दो-ढाई साल हुए थे, उन्हें ये बात कुछ इस तरह समझाई गई कि प्रणब, राजीव को हटाकर ख़ुद प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं. नतीजा ये हुआ कि प्रणब मुखर्जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.''
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सोनिया को प्रणब पर भरोसा नहीं था!
राजीव गांधी और उनकी मंडली से नाराज़ प्रणब मुखर्जी चार साल तक कांग्रेस से बाहर रहे, उन्होंने अलग पार्टी बना ली. बीच-बचाव हुआ और उनकी कांग्रेस में वापसी भी हुई. लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी तक प्रणब के हाथ कभी नहीं पहुंच सके.
रशीद किदवई बताते हैं, ''साल 2004 के चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई लेकिन सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया. तब सोनिया ने प्रणब को नज़रअंदाज़ करके मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया. इसकी बड़ी वजह ये थी कि सोनिया-प्रणब के बीच एक खाई थी. राजीव से जो उनकी ग़लतफ़हमी शुरू हुई थी, वो सोनिया के साथ भी जारी रही और वो कभी सोनिया के विश्वासपात्र नहीं बन पाए.''
''यही वजह थी कि प्रणब प्रधानमंत्री तो दूर की बात, गृहमंत्री भी नहीं बन पाए. हालांकि, साल 2011-12 में प्रणब कांग्रेस में कई ज़िम्मेदारियां संभाल रहे थे. तब सोनिया और प्रणब की मीटिंग हुई, प्रणब को लगा कि अब उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन सोनिया ने उन्हें राष्ट्रपति बनने की पेशकश की.''
राष्ट्रपति बनने के साथ ही प्रणब मुखर्जी का प्रधानमंत्री बनने का सपना हमेशा के लिए टूट गया. प्रणब के बाद बात अब एक मराठा राजनेता की.
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'साज़िश का चक्रव्यूह' और विश्वसनीयता का संकट
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद चंद्र गोविंदराव पवार चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, सात बार लोकसभा का चुनाव जीते और कांग्रेस में आते-जाते रहे. शरद पवार प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे. लेकिन उनकी विश्वसनीयता इस दावेदारी की राह में इस तरह रोड़ा बनी कि वो इससे कभी पार नहीं पा सके.
वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर बताते हैं, ''देवेगौड़ा की सरकार गिरने के बाद शरद पवार 1998 में प्रधानमंत्री बन सकते थे. सोनिया गांधी कांग्रेस की जब अध्यक्ष बनीं, तब वो विपक्ष के नेता भी थे. सोनिया गांधी ने उन्हें विपक्ष के नेता की ज़िम्मेदारी सौंपी थी.''
''लेकिन शरद पवार की राजनीति से साज़िश की बू कभी नहीं गई. इस वजह से कांग्रेस के बाकी नेता उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए तैयार नहीं थे. वर्ष 1999 में शरद पवार ने जब कांग्रेस छोड़ी तो उनके साथ बस दो नेता बाहर गए.''
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'जो बोया वही काटा'
शरद पवार एक समर्थ नेता थे, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के अपने रास्ते में कांटे कई वर्ष पहले ही बिखेर दिए थे जो आख़िर उन्हीं के पैरों में चुभे. कांग्रेस के लिए शरद पवार और विश्वसनीयता वैसे ही थे जैसे पूरब और पश्चिम, जिनका कोई मेल संभव नहीं था.
कुमार केतकर बताते हैं, ''इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी का राज आया, तब उन्होंने भारतीय जनसंघ (उस समय बीजेपी नहीं बनी थी) सोशलिस्ट और वो सब जो कांग्रेस के ख़िलाफ़ थे, उनके साथ महाराष्ट्र में एक प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाकर सरकार बनाई. ये वर्ष 1978 की बात है. तब उन्होंने कांग्रेस-एस नामक एक पार्टी भी बनाई.''
''उस दौर में शरद पवार ने इंदिरा गांधी की जमकर आलोचना की. लेकिन 1986 में शरद ने सारी आलोचना छोड़कर राजीव गांधी का हाथ थाम लिया. उन्होंने कांग्रेस के भीतर अपनी चालाकियां शुरू कर दीं."
"1988 में जब राजीव प्रधानमंत्री बने, शरद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हो गए. लेकिन 1989 में वीपी सिंह की सरकार बनने पर शरद पवार ने उनके साथ गुपचुप डीलिंग शुरू की, ये जानते हुए कि वीपी सिंह राजीव गांधी को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते थे.''
''1991 में राजीव गांधी की हत्या होने के बाद शरद पवार सोनिया गांधी के पास जाते हैं कि आप कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार करिए जबकि 1999 में वही शरद पवार सोनिया गांधी विदेशी हैं-ऐसा कहकर पार्टी छोड़ देते हैं और नई पार्टी बना लेते हैं.''
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ज्योति बसु और 'ऐतिहासिक भूल'
अब बात मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उस राजनेता की, जो पश्चिम बंगाल में 23 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे, जिनके बारे में वर्ष 1996 के संसदीय चुनाव से पहले ये चर्चा होने लगी थी कि वो एक दिन भारत के प्रधानमंत्री ज़रूर बनेंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं जिसे 'ज्योति बसु' ने ऐतिहासिक भूल बताया था.
सीपीआईएम की केंद्रीय समिति के सदस्य जोगेंद्र शर्मा बताते हैं, ''ज्योति बसु प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं थे, लेकिन उनके सामने ये पेशकश ज़रूर की गई थी कि उन्हें प्रधानमंत्री बनना चाहिए.''
''ग़ैर-भाजपा और ग़ैर-कांग्रेसी दल इस स्थिति में आ गए थे कि कांग्रेस के समर्थन से उनकी सरकार बन सकती थी. ऐसे गठबंधन को कौन चला सकता है, इस पर चर्चा की प्रक्रिया में नाम आया ज्योति बसु का, जो दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर जनहित में गठबंधन को बरकरार रख सकते थे.''
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'हम शायद चूक गए'
गठबंधन में शामिल किसी दल को ज्योति बसु के नाम पर आपत्ति नहीं थी. लेकिन ज्योति बसु प्रधानमंत्री नहीं बन सके. जोगेंद्र शर्मा इसकी वजह बताते हैं, ''वर्ष 1996 का ये मामला है. केंद्रीय समिति की बैठक में जब हम चर्चा कर रहे थे तो हमारे सामने ये सवाल था कि पार्टी के संविधान के हिसाब से वो कौन सी शर्ते हैं जिनके आधार पर हमें सरकार में शामिल होना चाहिए या नहीं होना चाहिए.''
''गुण-दोषों पर चर्चा होने के बाद चार के बहुमत से ये निर्णय हुआ कि हम इस सरकार में शामिल नहीं होंगे. हालांकि, हमारे महासचिव कॉमरेड सुरजीत इसके पक्ष में थे, कॉमरेड ने बड़ी मेहनत की थी. लेकिन उन्हें समर्थन नहीं मिला और फ़ैसला ये हुआ कि सरकार में शामिल नहीं होना है, समर्थन बाहर से दिया जा सकता है. ज्योति बसु नहीं चाहते थे कि केंद्रीय समिति के फ़ैसले को बदला जाए."
सीपीआईएम में बाद में इस फ़ैसले पर बहुत बहस भी हुई और पार्टी जब वर्तमान से अतीत में झांककर देखती है तो तब विरोध करने वाले कई कॉमरेड आज मानते हैं कि 'हम शायद चूक गए'. ज्योति बसु ने भले ही इस फ़ैसले को स्वीकार किया था, लेकिन उन्होंने इसे 'हिमालयन मिस्टेक' भी माना था. पार्टी में उनके कई साथी भी आज ऐसा ही मानते हैं.
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कांग्रेस के वफ़ादार पर शत्रुओं की भरमार
अब बात कांग्रेस के उस नेता की जिसे भारत की राजनीति में चाणक्य भी कहा जाता है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, राजीव गांधी के ज़माने में कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष और उग्रवाद के दौर में पंजाब के राज्यपाल रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह भारत के उन राजनेताओं में शुमार रहे जिन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना गया.
वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह बताते हैं, ''दो अवसर आए जब अर्जुन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे. पहला तब जब नरसिम्हा राव को भारत का प्रधानमंत्री बनाया गया. कांग्रेस पार्टी के भीतर तब अर्जुन सिंह के नाम पर भी चर्चा थी. उस समय नरसिम्हा राव लगभग रिटायर हो चुके थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी उन्हें झाड़-पोंछकर ले आई और उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया जबकि अर्जुन सिंह देखते रह गए.''
''दूसरा मौका साल 2004 में तब आया था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया था. तब अर्जुन सिंह को कांग्रेस की वफ़ादारी के दम पर पूरी उम्मीद थी कि सोनिया गांधी उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाएंगी. लेकिन बाज़ी मारी मनमोहन सिंह ने और बाद में मनमोहन से अर्जुन सिंह के काफ़ी मतभेद हो गए.''
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सोनिया को जंचे नहीं अर्जुन
कांग्रेस पार्टी में लगभग 15 साल तक प्रधानमंत्री की कुर्सी के दावेदार रहे अर्जुन सिंह लाख चाहकर भी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सके.
एनके सिंह इसकी वजह बताते हैं, ''सबसे बड़ी वजह ये थी कि अर्जुन सिंह उन पुराने कांग्रेसियों में थे जो समाजवाद में यकीन करते थे. देश में आर्थिक सुधार जिस तरह से किया जा रहा था, वो उस तरीके के ख़िलाफ़ थे और समय-समय पर कांग्रेस नेतृत्व से अपना विरोध दर्ज कराते रहे थे, जबकि पूरी कांग्रेस पार्टी दूसरी तरफ़ जा रही थी.''
''दूसरी बड़ी वजह ये थी कि कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं से अर्जुन सिंह के व्यक्तिगत रिश्ते ख़राब हो चुके थे. कांग्रेस में उनके अनुयायी तो थे लेकिन मित्र कोई नहीं था. सोनिया को पहले नरसिम्हा राव पसंद आए और उसके बाद मनमोहन जंचे. इससे तमाम कोशिशों के बाद भी अर्जुन सिंह प्रधानमंत्री नहीं बन सके.''
जब सोनिया ने सुनी अंतरात्मा की आवाज़
किंगमेकर होना एक बात है और ख़ुद किंग बनना दूसरी बात. सोनिया गांधी के लिए ये बात कही जा सकती है जो दूसरों को प्रधानमंत्री बनाती रहीं, लेकिन खुद प्रधानमंत्री नहीं बन सकीं.
सोनिया ने अंतरात्मा की आवाज़ का हवाला देकर प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने से विनम्रता से तब मना कर दिया था, जब बीजेपी नेता सुषमा स्वराज सोनिया के प्रधानमंत्री बनने पर अपना सिर मुंडाने के लिए तैयार थीं और पूरी भारतीय जनता पार्टी सड़कों पर उतरने का मन बना चुकी थी.
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वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी बताती हैं, ''साल 2003 के आख़िर में कई राज्यों में चुनाव हुए थे जहां कांग्रेस बहुत बुरी तरह हारी थी. तब आशंका ये थी कि कांग्रेस 2004 के आम चुनाव में दहाई के अंकों में सिमट जाएगी. कांग्रेस में बड़ी निराशा थी. उस दौर में सोनिया गांधी बाहर निकलीं और उत्तर भारत में जगह-जगह उन्होंने रोड शो किया.''
"सोनिया गांधी ने कांग्रेस की इस रणनीति को भी पलट दिया था कि हम अकेले लड़ेंगे अकेले सरकार बनाएंगे, गठबंधन के लिए वो ख़ुद रामविलास पासवान के घर पहुंचीं. विपक्ष के बाकी नेताओं से भी उन्होंने एक-एक करके गठबंधन किया. यूपीए गठबंधन के बीज सोनिया गांधी ने ही बोए थे. 2004 में शाइनिंग इंडिया के माहौल में कांग्रेस का जीतना सोनिया गांधी की उपलब्धि मानी गई. जब सरकार बनाने की बात आई तो सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार थीं.''
'बच्चे ही नहीं चाहते थे कि सोनिया पीएम बनें'
क्या विदेशी मूल के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के बेहद आक्रामक तेवर की वजह से सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नहीं बनने का फ़ैसला किया था, या इसके पीछे कोई और भी वजह थी?
नीरजा चौधरी बताती हैं, ''जो नटवर सिंह ने लिखा है, कुछ और लोगों ने कहा है और विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले जैसा मुझे बताया था कि हम सब तो तैयार थे, उनके बच्चे ही नहीं चाहते थे. जिस हिंसा ने इंदिरा गांधी की जान ली, जिस हिंसा ने राजीव गांधी की जान ली, तो क्या उनके बच्चों का ये मानना था कि सिक्योरिटी रिस्क होगा बड़ा भारी. मुझे लगता है ये फैक्टर भी ज़रूर रहा होगा. हो ये भी सकता है कि सोनिया गांधी ने ये सोचा हो कि आगे जाकर उनके बच्चों की कहानी खत्म हो जाएगी, क्योंकि विदेशी मूल का बताकर हर बात के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता था.''
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संघ के दुलारे आडवाणी
इस लेख में प्रधानमंत्री पद के आख़िरी दावेदार संघ के दुलारे और बीजेपी में शिखर पर रहे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी हैं. वही आडवाणी जो पाकिस्तान में जिन्ना की मज़ार पर जाकर उनका गुणगान करने की वजह से संघ और बीजेपी नेताओं की आलोचना के पात्र बनें.
20 मई 2014 को संसद के केंद्रीय कक्ष में जब लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम का औपचारिक प्रस्ताव संसदीय दल के सामने रखा, तब उनकी भाव-भंगिमा और शब्दों का चयन ग़ौर करने लायक था.
वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह बताते हैं, ''बात शुरू होती है नब्बे के दशक से, जब राम जन्मभूमि का आंदोलन शुरू हुआ. वीपी सिंह की सरकार आई और फिर रथयात्रा निकली, उस यात्रा के बाद लालकृष्ण आडवाणी की जो छवि उभरी, वो राष्ट्रव्यापी थी. उस समय बीजेपी के सबसे बड़ा नेता अटल बिहारी वाजपेयी थी और आडवाणी की ये छवि अटल से कहीं कम या छोटी नहीं थी.''
''कभी-कभी तो वाजपेयी भी आडवाणी के सामने छोटे लगने लगे थे. लोग भी आडवाणी को पसंद कर रहे थे. लेकिन बीजेपी की गोवा बैठक में आडवाणी ने वाजपेयी को अगला प्रधानमंत्री दावेदार घोषित कर दिया. आडवाणी उस समय शीर्षस्थ नेता थे. वो चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे क्योंकि तब संघ और बीजेपी दोनों में उनकी व्यापक स्वीकार्यता थी.''
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पीएम इन वेटिंग
लालकृष्ण आडवाणी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, उनके मन की ये बात बीजेपी में किसी से छिपी नहीं थी. लेकिन आडवाणी के आगे अक्सर अटल बिहारी वाजपेयी खड़े रहे, जो बकौल आडवाणी भारत जैसे देश के लिए 'उनसे बेहतर' नेता थे.
अजय सिंह के मुताबिक, ''साल 2002-2003 की बात होगी. वाजपेयी ने अपने घर में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि 'ना टायर्ड ना रिटायर्ड, आडवाणीजी के नेतृत्व में विजय की ओर प्रस्थान.' ये इतना भारी बयान था कि आडवाणीजी सकते में आ गए. तब कोशिश ये हो रही थी कि आडवाणी प्रधानमंत्री बनें, वाजपेयी की तबीयत भी गड़बड़ा रही थी. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. 2004 में चुनाव हारने के बाद आडवाणी लोकसभा में विपक्ष के नेता बने, पार्टी अध्यक्ष भी थे, जबकि वाजपेयी के पास कोई पद नहीं था, वहां से एक दूसरे आडवाणी नज़र आए जो लगा कि प्रधानमंत्री के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं. ये बात दीगर है कि चुनाव हार चुके थे.''
2014 का लोकसभा चुनाव संभवत: वो आख़िरी मौका था जिसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री बनने के बारे में सोचना बंद कर दिया होगा.
लालकृष्ण आडवाणी, सोनिया गांधी, अर्जुन सिंह, ज्योति बसु, शरद पवार और प्रणब मुखर्जी, भारतीय राजनीति के वो चेहरे हैं, जिन्हें क़ैद करने के लिए फोटोग्राफरों के कैमरे हमेशा मचलते रहे, लेकिन सियासत और वक़्त ने उन्हें वो दिन दिखाए, जिसकी उन्होंने शायद कभी कल्पना भी नहीं की थी. राजनीति शायद इसी को कहते हैं.
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