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सोमवार, 27 दिसंबर, 2004 को 16:51 GMT तक के समाचार
 
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सितारे बेच रहे हैं दुनिया भर की चीज़ें
 

 
 
फ़िल्मी सितारे
फ़िल्मी सितारे अपनी छवि का इस्तेमाल कर रहे हैं चीज़ें बेचने के लिए
अभिनेता अमरीश पुरी से एक साक्षात्कार के दौरान पूछा गया, क्या आप टेलीविज़न के लिए काम करेंगे?

अमरीश पुरी ने बिना एक क्षण गँवाए जवाब दिया, "सेब सड़ जाएगा तो आलू के भाव नहीं बिकेगा."

ये ठीक है कि अमरीश पुरी अब तक किसी टेलीविज़न के चैनल पर काम करते नहीं दिखाई दिए लेकिन वे टेलीविज़न में ही आने वाले विज्ञापनों में हवाई चप्पल बेचते दिखाई दिए.

और अमरीश पुरी ही पीछे क्यों रहते जब सदी के अभिनेता चुने गए अमिताभ बच्चन तेल, दर्दनाशक मल्हम, शीतल पेय, पेंट और बैंक सभी के विज्ञापनों में नज़र आ रहे हों तो वे ही क्यों परहेज करें.

और फिर कौन नहीं है जो इस समय विज्ञापन नहीं कर रहा है. शाहरुख ख़ान, आमिर ख़ान, संजय दत्त और ऐश्वर्या राय, प्रीति ज़िंटा से लेकर सचिन तेंदुलकर, इरफ़ान पठान और जावेद अख़्तर तक सभी तो कुछ न कुछ बेच रहे हैं.

सितारे ही सितारे

एक ज़माना था जब विज्ञापनों की अपनी एक अलग दुनिया थी और साबुन से लेकर टॉवेल तक बेचने के लिए मॉडल हुआ करते थे.

अमरीश पुरी
अमरीश पुरी भी विज्ञापनों में दिखाई दे रहे हैं

बाज़ार की तस्वीर बदली तो विज्ञापन की दुनिया भी बदलने लगी. धीरे-धीरे सितारों का प्रवेश शुरु हुआ और फिर मॉडलिंग करने वालों की ज़रुरत ख़त्म होने लगी क्योंकि फ़िल्म और दूसरे क्षेत्रों के सितारे ही मॉडलिंग करने लगे.

पहले तो शुरु हुआ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों से लेकिन धीरे धीरे ये दायरा सिमटता गया और फिर बड़े से बड़े सितारे भी च्यवनप्राश और जूते चप्पल तक सब बेचते नज़र आए.

इस दौर में वे लोग भी विज्ञापनों में नज़र आए जिनको विज्ञापनों में देखने की उम्मीद नहीं की जा रही थी.

मसलन जयपुर की महारानी गायत्री देवी हीरा बेचती दिखाई दे रही हैं और भोपाल के नवाब और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी नवाब पटौदी आलू के चिप्स.

शतरंज के चैंपियन विश्वनाथन आनंद एक कंप्यूटर इंस्टिट्यूट के विज्ञापन में आए. नारायण कार्तिकेयन को कार रेस चैंपियन के रुप में शायद कम लोग जानते होंगे लेकिन एक बड़ी कंपनी की कार का विज्ञापन करने वाले के रुप में उसे बच्चे भी जानते हैं.

नए मुहावरे

चूंकि इन सितारों की पहचान आम मॉडलों की तुलना में ज़्यादा थी इसलिए ज़ाहिर था कि इनकी पहुँच भी ज़्यादा थी. और फिर टेलीविज़न चैनलों की भरमार ने इस पहुँच को और बढ़ा दिया.

हालत ये हो गई है कि उत्पादों को उन मुहावरों से पहचाना जाने लगा है जो विज्ञापन कंपनियाँ इन सितारों के लिए रच रही हैं.

मसलन अब आप कहें 'ठंडा मतलब..' तो कोई भी बच्चा बता देगा कि यह किस शीतल पेय का विज्ञापन है. 'आराम का मामला' कहने से कोई भी बता देता है कि ये किस चीज़ का विज्ञापन है.

हालत ये हो गई है कि बच्चे को बाज़ार लेकर जाएँ तो वो ऐसी कोई चीज़ लेना ही नहीं चाहता जिसे उसके पसंद का सितारा न बेच रहा हो.

बाज़ार ने पिछले दो दशकों में भारतीय समाज में बहुत सी तब्दीलियों का सबब बना है और उसका जिस तरह से विस्तार हो रहा है उससे लगता है कि अभी बहुत कुछ देखने को बचा हुआ है.

 
 
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