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गुरुवार, 23 दिसंबर, 2004 को 14:11 GMT तक के समाचार
 
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छोड़कर शरम, देह पर मचली कलम
 

 
 
पत्रिकाओं में होड़ लग गई है सेक्स संबंधी विषयों पर सर्वेक्षण करने की
भारत के कई जानी-मानी पत्रिकाएँ इस साल नए मुकाम पर पहुँच गईं.

यह नया मुकाम ड्राइंग रुम, ट्रेन का सफ़र या सार्वजनिक स्थल नहीं थे, मुकाम, बेडरूम या ऐकांत के क्षण थे और लोगों की हमसफ़र थी यौन जिज्ञासाओं की सीढ़ियाँ.

इस बीते साल में ख़बरियों को अचानक कामदेव की याद आने लगी. याद, आई भर नहीं बल्कि जमकर और सिर-चढ़कर बोली भी.

मुखपृष्ठ से लेकर सर्वेक्षणों तक और बाक्स कॉलमों से लेकर विशेष संस्करणों तक यौन संदर्भों पर जमकर लिखा और छापा गया.

यहाँ तक कि आउटलुक और इंडिया टुडे जैसी भारत की सबसे ज़्यादा बिकने वाली साप्ताहिक पत्रिकाओं ने भी इस बार इन संदर्भों पर तो जैसे जवाबी जंग ही छेड़ दी.

इन पत्रिकाओं में एक पर एक आते सेक्स सर्वेक्षणों और यौन विषयों पर केंद्रित सामग्री से एक बार के लगा कि दोनों 'तुम डाल-डाल, हम पात-पात' की जुगलबंदी कर रहे हैं.

और फिर जंग छिड़े तो हथियार भी तरह-तरह के निकल ही आते हैं. मसलन, स्त्री मन की थाह से लेकर विवाहेतर संबंधों और समलैंगिकता से लेकर टीन-एज सेक्स जैसे विषय, बाज़ार को गर्म करने और ज़्यादा से ज़्यादा पाठक बटोरने की कवायद में इस्तेमाल किए जाते रहे.

पर मामला इतना भर ही नहीं था. छापे जा रहे मसाले और अर्धनग्न चित्रों को देखकर यह भ्रम होने लगा कि रिसाला ख़बरों का है या फिर यौन विमर्श का.

बाज़ार बनाम नैतिकता

 जनमानस पर इनके प्रभाव को सकारात्मक तो नहीं कहेंगे. यह नकारात्मक ही है पर बहुत कुछ लोगों के मिजाज और बाज़ार पर निर्भर करता
 
अशोक कुमार, सहायक संपादक, इंडिया टुडे

ऐसा नहीं है कि इस तरह की सामग्री के परोसे जाने का यह पहला दौर था. इससे पहले भी इस तरह की सामग्री छापी जाती रही है, पर इस बार इन ख़बरों को जगह और तवज्जो कुछ ज़्यादा ही मिली.

आख़िर क्या वजहें थीं जो सेक्स संबंधित समाचार इतने ज़रूरी हो गए और पत्रिकाओं को इसके संदर्भ में इतना कुछ छापना और लिखना पड़ा.

इस बाबत जब हमने इंडिया टुडे के सहायक संपादक अशोक कुमार से बातचीत की तो उन्होंने बताया, "इस तरह की सामग्री की आवश्यकता पहले तो नहीं थी पर अब शायद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ प्रतिस्पर्धा के चलते और अपनी प्रसार संख्या को बनाए रखने के लिए ऐसा हो रहा है."

पर इस तरह की सामग्री और उसके प्रस्तुतिकरण से लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस बाबत वो कहते हैं, "जनमानस पर इनके प्रभाव को सकारात्मक तो नहीं कहेंगे. यह नकारात्मक ही है पर बहुत कुछ लोगों के मिजाज और बाज़ार पर निर्भर करता है."

हालांकि अशोक कुमार मानते हैं कि अब इस तरह की जानकारियों को सकारात्मक रूप से लोगोंम तक पहुँचाने की ज़रूरत है और साथ ही इस प्रवृत्ति को सकारात्मक बनाने की ज़रूरत है.

ग़ौरतलब है कि इस बार आउटलुक और इंडिया टुडे के लगभग 10 अंकों के मुख्य पृष्ठ पर ऐसी ख़बरें थी जो सेक्स या इससे संबंधित विषयों पर केंद्रित थीं.

सेक्स पर सवाल

 सेक्स पर सर्वेक्षण ग़लत नहीं है पर भारतीय जनमानस अभी इसपर खुलकर बोलने को तैयार नहीं दिखता
 
अरूणा बूटा, मनोवैज्ञानिक

इस तरह के सर्वेक्षणों और पत्रकारिता में इस तरह के प्रयोग पर विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली.

पिछले दिनों जब इस बाबत जानी-मानी मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अरुणा ब्रूटा से इस बारे में बात की तो उन्होंने बताया, "सेक्स पर सर्वेक्षण ग़लत नहीं है पर भारतीय जनमानस अभी इसपर खुलकर बोलने को तैयार नहीं दिखता."

जब हमने कुछ पाठकों से इस बारे में बातचीत की तो उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री लोगों का ध्यान तो खींचती है पर लोग अभी भी इसे चोरी-छुपे ही पढ़ते है. घर में या सार्वजनिक रूप से समाचार पत्रिकाओं के ऐसे अंकों को पढ़ना अभी देखने को नहीं मिलता.

कुछ लोगों ने तो इसे सस्ती लोकप्रियता और बच्चों को बिगाड़ने वाला भी बताया पर इसके बावजूद ऐसी सामग्री वाले अंक जमकर बिक रहे हैं और पढ़ने वाले ड्राइंग रूम में न सही, पर बेडरूम में इनके पन्नों को उलट रहे हैं और अपनी जिज्ञासाओं का आख़िरी छोर ढूँढ रहे हैं.

दलील कुछ भी दी जाए पर इतना तो साफ़ है कि बाज़ार का सच अब इन पत्र-पत्रिकाओं के सिर चढ़कर बोल रहा है. अब चाहे उसे कोई सीन की डिमांड कहे या फिर पाठक का बदलता मिज़ाज.

 
 
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