क्यों अनुराग कश्यप 'आधे जीनियस' हैं

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इस साल जिन हिंदी फिल्मों को लेकर खासी चर्चा हुई है गैंग्स ऑफ वासेपुर उनमें से यकीनन एक है. निर्देशक अनुराग कश्यप की इस फिल्म को जहाँ समाज के एक तबके ने काफी सराहा है वहीं कुछ लोगों के लिए ये फिल्म बहुत हिंसात्मक और भाषा की सीमाओं को लाँघने वाली है.

<link type="page"><caption> इंडस्ट्री में साढ़े चार जीनियस हैं: पीयूष मिश्रा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/07/120705_piyushmishra_chat_skj.shtml" platform="highweb"/></link>

इन तमाम विषयों पर <bold>बीबीसी संवाददाता</bold> ने अनुराग कश्यप से विशेष बातचीत की. इस दौरान अनुराग से <link type="page"><caption> पीयूष मिश्रा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/07/120705_piyushmishra_chat_skj.shtml" platform="highweb"/></link> के इस बयान पर भी प्रतिक्रया माँगी जिसमें पीयूष ने कहा था कि हिंदी फिल्मों में चाढ़े चार जीनियस हैं जिनमें से आधे जीनियस अनुराग हैं. पेश है बातचीत के कुछ अंश

गैंग्स ऑफ वासेपुर को लोगों ने काफी पंसद किया. जाहिर है दूसरे भाग से लोगों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं. क्या आपके ऊपर भी दबाव है- उम्मीदों का दबाव?

नहीं ऐसा कुछ नहीं है. पहले पार्ट को लेकर हम ज्यादा घबराए हुए थे क्योंकि पहला भाग बहुत जटिल था, बहुत उलझा हुआ था क्योंकि उसमें बहुत सारी कहानियाँ थी, बहुत सारा रिसर्च करना था उसमें, 50 साल की लंबी कहानी थी, बिहार के बारे में थोड़ा बहुत समझाने की कोशिश की थी, वो दौर समझाने की कोशिश थी. लेकिन दूसरे पार्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है. अब लोग सभी किरदारों को जानते हैं. तो सीधी कहानी है. लोगों को ज्यादा मजा आएगा.

कुछ लोगों को गैंग्स हिंसा से भरपूर लगी जिसमें बहुत ज्यादा गाली गलौच है........

दरअसल लोगों को एक तरह की फिल्में देखने की आदत पड़ी हुई है. सिनेमा को लेकर उन लोगों का आइडिया बड़ा बँधा बँधाया सा है. इसलिए वो जब गालियाँ सुनते हैं तो घबरा जाते हैं. इसलिए नहीं कि वो खुद गाली नहीं सुन सकते, बल्कि इसलिए कि उन्हें लगता कि इसका क्या असर पड़ने वाला है. वो अपने ऊपर थोड़ी ज्यादा ही जिम्मेदारी ले लेते हैं. हर आदमी अगर सिर्फ अपने लिए ही जिम्मेदार रहे तो गालियाँ इतनी बुरी नहीं लगेंगी.

आपकी ज्यादातर फिल्मों में कास्टिंग अलग ही होती है. जिन कलाकारों के बारे में सुना नहीं होता वो आपकी फिल्मों में दिखते हैं. या जिनके बारे में सोचा नहीं होता कि ये अभिनेता ऐसा काम कर सकता है वो पर्दे पर दिखता है. ये महज इत्तेफाक है या आप चुन चुन कर ऐसे कलाकारों को ढूँढते हैं ?

शुरुआत में हम चुन चुन कर फिल्मी कलाकारों को ढूँढते थे. इस वजह से अब लोगों को लगता है कि हमारे दफतर में आएँगे तो काम मिल जाएगा. इसलिए अब तो बहुत सारे हुनरमंद लोग अपने आप हमारे ऑफिस में खुद चलकर आ जाते हैं. हमारी किस्मत अच्छी है कि अच्छे कलाकर खुद ब खुद अब चले आते हैं. टेलेंट मुझे कभी ढूँढना नहीं पड़ा. टेलेंट मेरे ऑफिस में चल चल कर आता है. जरूरत है बस इस हुनर को परखने की, पहचानने की और मौका देने की.

आपकी किसी भी फिल्म की सफलता या असफलता आपकी अगली फिल्मों पर कितना असर डालती हैं?

बहुत असर पड़ता है क्योंकि अगर आपको दर्शक मिलते हैं तो आपको ताकत मिलती है. अगर दर्शक आपके और आपके काम को पहचानते हैं तो वो अगली फिल्म में भी बड़ी संख्या में आएँगे. ऐसे में प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर भी ज्यादा साथ देते हैं.

<bold>कुछ दिन पहले अभिनेता <link type="page"><caption> पीयूष मिश्रा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/07/120705_piyushmishra_chat_skj.shtml" platform="highweb"/></link> बीबीसी हिंदी के दफतर आए थे. उन्होंने बड़ी दिलचस्प बात कही थी कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में साढ़े चार जीनियस हैं जिनमें से आधा जीनियस अनुराग कश्यप हैं. क्या कहेंगे आप?</bold>

ये उनकी दरियादिली है कि वो मुझे इतना तवज्जो देते हैं. वो मुझे आधा जीनियस मानते हैं क्योंकि वो हमेशा मुझे बोलते हैं कि तुम कर तो बहुत कुछ सकते हो लेकिन करते नहीं हो. मैं उन्हें बहुत बड़ा जीनियस मानता हूँ. जब कोई तारीफ करता है तो मुझे समझ में नहीं आता कि क्या करना है. कोई बुराई करे तो मुझे पता होता है कि मुझे क्या करना है.