You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
डोनाल्ड ट्रंप के निशाने पर ईरान का चाबहार बंदरगाह, भारत की कितनी बढ़ेंगी मुश्किलें?
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए कार्यकारी आदेश ने भारत की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
ट्रंप ने अपने विदेश मंत्री से ईरान के चाबहार बंदरगाह को प्रतिबंधों में दी गई छूट को ख़त्म या संशोधित करने के लिए कहा है.
हालांकि अभी तक भारत सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
चाबहार बंदरगाह एक ऐसी परियोजना है जिस पर भारत ने लाखों डॉलर ख़र्च किए हैं.
यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक हितों के लिए भी बेहद अहम है. इसकी मदद से भारत पाकिस्तान को दरकिनार कर अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच पाता है.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
चाबहार, भारत की कनेक्टिविटी योजनाओं का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी आईएनएसटीसी के लिए भी अहमियत रखता है.
इस कॉरिडोर के तहत भारत, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, अर्मीनिया, अज़रबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए जहाज़, रेल और सड़क मार्ग का 7200 किलोमीटर लंबा नेटवर्क तैयार होना है.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका के नए आदेश का भारत पर क्या असर होगा?
ट्रंप के नए आदेश में क्या?
ट्रंप प्रशासन ने 4 फ़रवरी को यह एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पास किया है. इसका मक़सद ईरान सरकार पर दबाव डालना और परमाणु हथियार बनाने के सभी रास्तों को बंद करना है.
ऑर्डर में कहा गया है कि 'ईरान अस्तित्व में आने के बाद से अमेरिका और उसके सहयोगियों के ख़िलाफ़ रहा है. दुनियाभर में आतंकवाद को बढ़ाने में ईरान मदद करता है. वह हिज़बुल्लाह, हमास, तालिबान, अल-क़ायदा और दूसरे आतंकवादी संगठनों की सहायता की है.'
ट्रंप प्रशासन ने ईरान के इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) को विदेशी आतंकवादी संगठन बताया और कहा है कि इस संगठन के एजेंट दुनियाभर में अमेरिकी लोगों को निशाना बनाते हैं.
ऑर्डर में ईरान के परमाणु प्रोग्राम को अमेरिका के लिए एक बड़ा ख़तरा बताते हुए कहा गया है कि इस तरह के कट्टरपंथी शासन को कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने या विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने विदेश मंत्री मार्को रुबियो को यह छूट दी है कि वे ईरान को प्रतिबंधों में दी गई छूट को रद्द या संशोधित कर सकते हैं.
इस आदेश में ख़ासतौर पर ईरान के चाबहार बंदरगाह का ज़िक्र किया गया है. अब कयास लग रहे हैं कि चाबहार पोर्ट को लेकर ईरान को जो छूट पहले मिल रही थी, अब वह ख़त्म या कम हो सकती है.
इसके अलावा ईरान के तेल निर्यात को ख़त्म करने की बात कही गई है, जिसमें चीन को भेजे जाने वाला कच्चा तेल भी शामिल है.
चाबहार को लेकर समझौता
13 मई, 2024 को भारत और ईरान ने एक समझौता किया था. यह समझौता 10 साल के लिए चाबहार स्थित शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह के संचालन को लेकर किया गया था.
यह इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड और पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ ईरान के बीच हुआ था. शाहिद बेहेस्ती ईरान का दूसरा सबसे अहम बंदरगाह है.
उस वक्त भारत के जहाज़रानी मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने ईरान पहुंचकर अपने समकक्ष के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, इस समझौते के तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड क़रीब 120 मिलियन डॉलर निवेश करेगी. इस निवेश के अतिरिक्त 250 मिलियन डॉलर की वित्तीय मदद करने की बात भी कही गई थी. इससे यह समझौता क़रीब 370 मिलियन (करीब 3 हज़ार करोड़ रुपये) का बनता है.
जब यह समझौता हुआ था उस वक्त भी अमेरिका के विदेश मंत्रालय से इसे लेकर सवाल किया गया था.
उस वक्त अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में उप-प्रवक्ता वेदांत पटेल ने कहा था, "हमें इस बात की जानकारी है कि ईरान और भारत ने चाबहार बंदरगाह से संबंधित एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं."
उन्होंने कहा था, "ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध जारी रहेंगे."
पटेल का कहना था कि अगर कोई भी कंपनी ईरान के साथ व्यापारिक समझौते पर विचार कर रही है तो उस पर संभावित प्रतिबंधों का ख़तरा बना रहेगा और इस मामले में भारत को विशेष छूट नहीं दी जाएगी.
साल 2016 में भी दोनों देशों के बीच शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह के संचालन के लिए समझौता हुआ था, जिसे मई 2024 में अगले दस साल के लिए बढ़ा दिया गया.
पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के मुताबिक़ चाबहार पर शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह को बनाने के लिए साल 2016-17 से 2023-24 तक 400 करोड़ रुपये दिए गए.
भारत के लिए मुश्किलें?
आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के मुताबिक़ चाबहार स्थित शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह आईएनएसटीसी के ज़रिए मुंबई को यूरेशिया से जोड़ता है, जिसकी वजह से समय और परिवहन ख़र्च में काफी कमी आई है.
रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2024 में वेसल ट्रैफिक में 43 प्रतिशत और कंटेनर ट्रांसपोर्टेशन में 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग की प्रो. रेशमी काज़ी कहती हैं कि अगर नए प्रतिबंध लगते हैं तो भारत के निवेश ख़तरे में पड़ सकते हैं और बंदरगाह पर चल रहा काम बंद या धीमा पड़ सकता है.
वो कहती हैं, "पहले हम सीधा अफ़ग़ानिस्तान से व्यापार नहीं कर पाते थे, लेकिन अब पाकिस्तान को दरकिनार कर अफ़ग़ानिस्तान सीधा सामान भेजा जा सकता है. ऐसे में यहां अगर मुश्किलें बढ़ती हैं तो पाकिस्तान का प्रभाव अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ने लगेगा, जो भारत के लिए बिल्कुल अच्छा नहीं है."
ऐसी ही बात इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स से जुड़े सीनियर फ़ेलो डॉक्टर फ़ज़्जुर्रहमान भी करते हैं. उनका मानना है कि अमेरिका का नया ऑर्डर भारत के लिए एक झटके की तरह है.
वो कहते हैं, "हमें समझना होगा कि अमेरिका का टारगेट भारत नहीं बल्कि ईरान है. बाइडन प्रशासन के समय भारत को छूट मिली हुई थी, वो ट्रंप के शासन में नहीं मिलेगी. वो साफ़ कर चुके हैं."
फ़ज़्जुर्रहमान कहते हैं, "ट्रंप का रुख़ बहुत आक्रामक है, वो लैटिन अमेरिका, यूरोप, दक्षिण एशिया से लेकर कनाडा तक बहुत सख्त नज़र आ रहे हैं. वो यूनिलेटरल विदेश नीति लेकर आ रहे हैं, जिसमें बातचीत की संभावना ख़त्म हो रही है."
उनका मानना है कि ना सिर्फ़ भारत बल्कि इस तरह के आदेश से ईरान की मुश्किलें भी बढ़ेंगी, क्योंकि पिछले कुछ सालों में ईरान ने अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते अच्छे किए हैं, लेकिन अब फिर से वे पटरी से उतर सकते हैं.
हालांकि दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में पश्चिमी एशिया अध्ययन विभाग की प्रोफे़सर सुजाता ऐश्वर्या की राय इस मामले में अलग है.
वो कहती हैं, "प्रतिबंध हर चीज़ पर लागू नहीं होती हैं. उनमें हमेशा गुंजाइश रहती है कि प्रतिबंधों के बीच में से काम को कैसे किया जाए. ईरान को लेकर प्रतिबंधों को सिलसिला नया नई है. ये दशकों से चल रहा है."
ऐश्वर्या कहती हैं, "ओबामा और बाइडन प्रशासन ने भी भारत को छूट दी थी कि वो एक सीमा में रहकर ईरान में निवेश कर सकता है और भारत हमेशा यह सुनिश्चित करता है कि वह नियमों से बाहर ना जाए. मुझे लगता है कि प्रतिबंधों के बीच चाबहार को लेकर भारत के लिए रास्ते बंद नहीं होंगे."
वो कहती हैं, "ओबामा, बाइडन के समय में प्रतिबंधों की बात मीडिया में आई लेकिन इतना शोर नहीं मचा, जितना ट्रंप के कहने पर मच रहा है, क्योंकि उनकी राजनीति आक्रामक है और वो एक ख़ास वर्ग को कैटर कर रहे हैं."
चीन का बढ़ता प्रभाव और अमेरिका की मुश्किल
भारत को ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से जोड़ने वाले चाबहार पोर्ट को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के लिए चुनौती के तौर पर देखा जाता है.
पाकिस्तान और चीन, ईरानी सरहद के क़रीब ग्वादर पोर्ट को विकसित कर रहे हैं.
चाबहार पोर्ट चीन की अरब सागर में मौजूदगी को चुनौती देने के लिए लिहाज़ से भी भारत के लिए मददगार साबित हो सकता है.
फोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में इंटरनेशनल बिज़नेस के प्रोफे़सर और 'द बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव, जियो पॉलिटिक्स एंड जियो इकोनॉमिक आस्पेक्ट' किताब के लेखक फ़ैसल अहमद का मानना है कि भारत को इसमें परेशानी नहीं होगी.
उनका कहना है, "चीन को काउंटर करने के लिए साल 2022 में अमेरिका के नेतृत्व में इंडो पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क की शुरुआत की गई. इसमें भारत समेत 13 देश शामिल हैं. अगर अमेरिका, भारत के लिए चाबहार प्रोजेक्ट में मुश्किलें पैदा करेगा तो वह इंडो पैसिफिक में फेल कर जाएगा."
वो कहते हैं, "इस फ्रेमवर्क का एक अहम हिस्सा सप्लाई चेन भी है, जिसके लिए डायवर्सिफाई ट्रेड रूट चाहिए. ऐसी स्थिति में चाबहार का महत्व अपने आप बढ़ जाता है, क्योंकि यह नए तरह से रीजनल कनेक्टिविटी देने का काम करता है. अगर इस फ्रेमवर्क को बढ़ाना है तो अमेरिका को चाबहार का समर्थन करना ही पड़ेगा."
फ़ैसल अहमद का मानना है अगर चाबहार को लेकर प्रतिबंध लगाए गए तो ना सिर्फ़ नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बल्कि इंडिया मिडिल यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (आईएमईईसी) पर भी इसका असर पड़ेगा.
आईएमईईसी के ज़रिए भारत, मध्य पूर्व से होते हुए यूरोप को कनेक्ट कर रहा है, तो इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी आईएनएसटीसी के ज़रिए वह अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया से होते हुए यूरोप तक पहुंचेगा.
बीबीसी से बातचीत में फ़ैसल अहमद कहते हैं, "दोनों प्रोजेक्ट्स के लिए चाबहार एक स्ट्रेटेजिक लोकेशन है. भले आईएमईईसी चाबहार से होकर ना जाए, लेकिन वह उसे फ़ायदा पहुंचाने का काम करेगा. ऐसे में अमेरिका के लिए चाबहार पर प्रतिबंध लगाना आसान नहीं होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित