ममता से मोदी तक... पश्चिम बंगाल के चुनाव में कौन कितना ताक़तवर

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इमेज कैप्शन, नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल चुनाव में सबसे बड़े चेहरे हैं
    • Author, रूपसा सेनगुप्ता
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला
    • ........से, कोलकाता
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

पश्चिम बंगाल में इस महीने होने वाले विधानसभा चुनाव किसी के लिए सत्ता में बने रहने की लड़ाई है तो किसी के लिए कुर्सी हथियाने की और किसी के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा की.

इस बात पर अनुमान लगाए जा रहे हैं कि इसमें कौन जीतेगा और कौन विपक्ष की भूमिका में रहेगा. राजनीति पर बहस करने वाले अक़सर कहते हैं कि चुनावी गणित हमेशा सीधा नहीं होता.

इसकी वजह यह है कि चुनाव कभी मुद्दों पर होते हैं और कभी नतीजा उम्मीदवारों पर निर्भर होता है. इसमें कई बार एकदम अलग समीकरण काम करते हैं.

पश्चिम बंगाल चुनाव के इस समीकरण में कई राजनेता अहम भूमिका निभा रहे हैं. इनमें से कोई चुनाव लड़ रहा है तो कोई दूसरों के समर्थन में प्रचार कर रहा है. कई लोग बंगाल के रहने वाले नहीं हैं- लेकिन ये लोग किसी न किसी तरीके से इस चुनाव के अहम किरदार के तौर पर उभरे हैं.

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ये लोग कौन हैं और कौन सी बात उनके पक्ष या विरोध में जा सकती है, इस रिपोर्ट में इसी का ज़िक़्र किया गया है.

ममता बनर्जी

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी अपने चुनाव अभियान के दौरान अक़सर कहती हैं कि राज्य की सभी 294 सीटों पर वही उम्मीदवार हैं. उनकी पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी उनको एकमात्र और अद्वितीय नेता बताते हैं.

संसदीय लोकतंत्र में ममता बनर्जी चार दशक से भी लंबे समय से सक्रिय हैं. उन्होंने वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर वाममोर्चा के 34 साल लंबे शासन का अंत किया था. राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद बीते 15 साल से वह लगातार सत्ता में हैं.

बीते कुछ साल के दौरान उनकी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगते रहे हैं. राज्य में विभिन्न मुद्दों पर आम लोगों की नाराज़गी भी सामने आती रही है.

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इमेज कैप्शन, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस चुनाव में एक अहम किरदार हैं
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राजनीतिक विश्लेषकों का एक गुट मानता है कि इन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए यह चुनावी लड़ाई उनकी पार्टी के लिए आसान नहीं होगी.

  • क्यों बढ़त हासिल है

ममता बनर्जी लंबे समय से आम लोगों के बीच मुख्यमंत्री के बजाय दीदी के तौर पर अपनी पहचान बनाने का प्रयास करती रही हैं. महिला मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल, जनसंपर्क औऱ लड़ाकू नेता की छवि ने आम लोगों में उनकी अलग पहचान बनाई है. वह बार-बार कहती रही हैं कि तृणमूल कांग्रेस संगठन की नींव मज़बूत करने के लिए वह कड़े फैसले लेने से भी नहीं हिचकेंगी.

उनकी पार्टी भाजपा के ख़िलाफ़ लगातार मुखर रही है. ममता बंगाल के प्रति केंद्र की उपेक्षा के मुद्दे पर सक्रिय रही हैं. इसके साथ ही वह लगातार आरोप लगाती रही हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में बांग्ला बोलने वालों को बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है.

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के सवाल पर भाजपा पर आरोप लगाने के साथ ही इस मुद्दे पर राज्य के लोगों के हित में दलील देने के लिए वह वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में बहस कर चुकी हैं. तृणमूल कांग्रेस ममता की इस तारणहार वाली भूमिका का भी बड़े पैमाने पर प्रचार कर रही हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, स्वास्थ्य साथी और हाल में शुरू की गई युवा साथी जैसी योजनाएं इस महीने होने वाले चुनाव पर असर डाल सकती हैं.

कई लोग मानते हैं कि बीते कई चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जीत में महिला और मुसलमान वोटरों की उल्लेखनीय भूमिका रही है. यह दोनों तबके इस चुनाव में भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.

  • इन वजहों से दिक्कत हो सकती है

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और जबरन चंदा उगाही जैसे कई आरोप लगे हैं. शिक्षा और नगर निगम में होने वाली बहालियों में भ्रष्टाचार के अलावा राशन घोटाले जैसे मामले सामने आए हैं. इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेता और मंत्री जेल भी जा चुके हैं.

दूसरी ओर, कोलकाता, दुर्गापुर और सिलीगुड़ी समेत राज्य के विभिन्न इलाक़ों में महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं पर राज्य में बड़े पैमाने पर आक्रोश का माहौल रहा है. कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या की घटना की जांच में अपनी भूमिका और राज्य में महिला सुरक्षा के सवाल पर राज्य सरकार कटघरे में खड़ी रही है.

कई लोग मानते हैं कि ये मुद्दे सत्तारूढ़ पार्टी के ख़िलाफ़ जा सकते हैं. भ्रष्टाचार के अभियुक्त नेताओं को पार्टी में शामिल करने और उनको टिकट देने के मुद्दे पर विपक्ष तृणमूल के ख़िलाफ़ हमलावर रहा है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी

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इमेज कैप्शन, नरेंद्री मोदी और अमित शाह की निगाहें पश्चिम बंगाल पर हैं (फ़ाइल फ़ोटो)

पश्चिम बंगाल पर लंबे समय से भाजपा की निगाहें टिकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनाव के पहले से ही बंगाल का दौरा करते रहे हैं.

इस महीने के विधानसभा चुनाव से पहले भी तस्वीर ऐसी ही नज़र आ रही है. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल का सवाल हो या फिर वोटरों का दिल जीतने के लिए बंगाली अस्मिता के समर्थन का, पार्टी बार-बार आम लोगों को यह समझाने का प्रयास करती रही है कि बंगाल उसके लिए बेहद अहम है.

  • बढ़त कहां है

भाजपा प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की छवि को सामने रख कर चुनाव लड़ना चाहती है. यह एक बड़ा फैक्टर हो सकता है. दूसरी ओर, अमित शाह को भाजपा का मुख्य चुनावी रणनीतिकार माना जाता है.

यह दोनों नेता अपनी जनसभा और चुनावी रैलियों में केंद्र सरकार की विकास योजनाओं का ब्योरा देने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस पर केंद्रीय योजनाओं का लाभ राज्य के आम लोगों तक न पहुंचने देने के भी आरोप लगा रहे हैं.

भाजपा इसके साथ ही सीमा पार से घुसपैठ, भ्रष्टाचार और चंदा उगाही के आरोपों पर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधती रही है. इस चुनाव में भी पार्टी ने इसे ही अपना हथियार बनाया है.

  • आरोप और आलोचना

बीते कुछ वर्षों में बंगाल में भाजपा की नींव मज़बूत हुई है. लेकिन इसके बावजूद यह देखना ज़रूरी है कि नरेंद्र मोदी को सामने रखकर बंगाल में चुनाव जीतना पार्टी के लिए कितना आसान होगा.

दूसरी ओर, एसआईआर और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर लोगों के नाम कटने के मुद्दे पर उसकी आलोचना हो रही है.

तृणमूल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल बंगालियों की सांस्कृतिक विरासत और मानसिकता के साथ भाजपा के मतभेदों के लिए उसकी आलोचना करती रही हैं. वह भाजपा के ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के भी आरोप लगाती रही है.

अभिषेक बनर्जी

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इमेज कैप्शन, चुनाव अभियान के दौरान एक रैली में अभिषेक बनर्जी

तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी दक्षिण 24-परगना जिले की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से सांसद हैं. वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. लेकिन इससे उनका महत्व ज़रा भी कम नहीं होता.

तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि पार्टी की रणनीति, पैसों और चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों से लेकर पार्टी संगठन मज़बूत करने तक हर काम में उनकी अहम भूमिका है.

  • फ़ायदा

पार्टी के पुराने नेताओं की भीड़ में अभिषेक बनर्जी एक ऐसा युवा चेहरा हैं जो पहले ही संसदीय राजनीति में कामयाबी हासिल कर चुके हैं. उन्होंने पार्टी की नींव मज़बूत करने पर ख़ास ध्यान दिया है.

उनकी 'ब्वॉय नेक्स्ट डोर' वाली छवि ने जनसंपर्क में मदद की है. वह आम लोगों के बीच पार्टी की एक स्मार्ट औऱ साफ-सुथरी चमकती छवि पेश करने में भी कामयाब रहे हैं.

कई लोग उनको भविष्य का नेता मानते हैं.

  • नुक़सान

विपक्ष ने अभिषेक के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और आर्थिक गड़बड़ियों का आरोप लगाया है. इसके अलावा कांग्रेस की तरह ही तृणमूल कांग्रेस पर भी 'परिवारवाद' के आरोप लग रहे हैं.

कुछ विश्लेशकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के ख़िलाफ़ लगे आरोपों से पार्टी की छवि पर असर पड़ सकता है.

शुभेंदु अधिकारी

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इमेज कैप्शन, शुभेंदु अदिकारी नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं.

कभी ममता बनर्जी के नज़दीकी रहे और अब भाजपा के महत्वपूर्ण नेता शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता के तौर पर सक्रिय भूमिका में रहे हैं. भाजपा उनके सहारे नंदीग्राम जीतना चाहती है. वह उनका ही इलाक़ा है. इसके साथ ही ममता बनर्जी को सीधी चुनौती देते हुए इस बार कोलकाता की भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं.

  • बढ़त होने की वजह

शुभेंदु ने वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराया था.

बीते कुछ साल के दौरान विपक्ष के ताकतवर नेता के तौर भाजपा की ओर से वह सरकार के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहे हैं. पूर्व मेदिनीपुर और आसपास के इलाकों में उनका ख़ासा असर है.

  • आरोप

विपक्षी नेता उनके ख़िलाफ़ धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के आरोप लगा रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे का जमकर प्रचार कर रही है.

एसआईआर की पूरक सूची में नंदीग्राम से जिन वोटरों के नाम कटे हैं उनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं. यह मुद्दा राज्य में भाजपा के लिए परेशानी की वजह भी बन सकता है.

हुमायूं कबीर

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इमेज कैप्शन, हुमायूं कबीर ने हाल में अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाई है

चुनावी समीकरणों के लिहाज से वह भले केंद्रीय किरदार नहीं हों, सबकी निगाहें हुमायूं कबीर पर टिकी हैं.

कबीर को किसी दौर में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी का करीबी माना जाता था. लेकिन कांग्रेस के बाद वह पहले भाजपा और फिर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे. यानी वह कभी न कभी तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों में रह चुके हैं.

चुनाव से पहले उन्होंने 'आम जनता उन्नयन पार्टी' नाम के नए राजनीतिक दल का गठन किया है. विधानसभा चुनाव से पहले बाबरी मस्जिद की नकल पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनाने के फैसले और उसके शिलान्यास के ज़रिये उन्होंने राजनीतिक हलके में हलचल मचा दी थी.

इस चुनाव में उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ सीटों पर समझौता किया था. हालांकि शुक्रवार, 10 अप्रैल को ओवैसी की पार्टी ने इस गठबंधन से बाहर निकलने का फ़ैसला किया.

  • प्रभाव

कबीर फ़िलहाल मुर्शिदाबाद जिले के नौदा और रेजिनगर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. उस इलाके में उनका ख़ासा असर है. माना जा रहा है कि चुनाव में इस इलाके के मुसलमान अहम भूमिका निभा सकते हैं. उनकी पार्टी कुल 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसमें नंदीग्राम और भवानीपुर सीटें भी शामिल हैं.

  • आलोचना

कई बार दल बदलने और विवास्पाद बयानों के कारण उनकी आलोचना होती रही है. भाजपा और तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि मुसलमान वोटों में सेंध लगा कर वह दूसरे दलों को फ़ायदा पहुंचाने का प्रयास करेंगे.

विशेषज्ञों का क्या कहना है

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इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीख का एलान करते चुनाव आयोग के अधिकारी

इन राजनेताओं और विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका के बारे में एक सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं, "मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक के तौर पर ममता बनर्जी की काफ़ी अहमियत है. दूसरी ओर, मोदी और शाह भाजपा के कर्ता-धर्ता हैं. इस राज्य में मोदी और शाह के अलावा भाजपा के पास कोई अलग चेहरा नहीं है. नरेंद्र मोदी के नाम पर प्रचार होता है और अमित शाह प्रचार करवाते हैं. भाजपा पश्चिम बंगाल पर कब्ज़े के लिए बेताब है."

शुभेंदु अधिकारी के बारे में उनका कहना था, "वह खुद भाजपा के उत्पाद नहीं हैं. उल्टे भाजपा ने उनका अधिग्रहण किया है. उनकी एकमात्र योग्यता यह है कि उन्होंने पिछली बार नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया था."

शिखा मुखर्जी के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी ममता के बाद पार्टी में नंबर दो हैं. उन्होंने ज़मीन पर काफ़ी काम किया है. इसके साथ ही संगठन को मज़बूत करने के साथ ही रैलियां भी आयोजित की हैं.

लेकिन वह हुमायूं कबीर को ज़्यादा महत्व देने के लए तैयार नहीं हैं. शिखा कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि हुमायूं कबीर को इतनी अहमियत दी जानी चाहिए. वह कुछ दिन पहले भाजपा में थे उसके बाद तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और अब अपनी अलग पार्टी बना ली है. कल वह कहां होंगे, यह कहना मुश्किल है."

राजनीतिक विश्लेषक उज्ज्वल राय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर कहते हैं, "ये दोनों जब भी किसी चुनाव में जाते हैं तो उसका महत्व बढ़ जाता है. यह दोनों पहले भी बंगाल के दौरे पर आए थे. लेकिन चुनाव पर कोई असर नहीं डाल सके थे. इस बार भाजपा एसआईआर के मुद्दे पर काफ़ी उत्साहित है और वह इस बार चुनाव में कामयाबी हासिल करना चाहती है."

उनका कहना था, "ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताक़त हैं और उनकी छवि लड़ाकू नेता की है. उनके साथ अभिषेक बनर्जी भी हैं. विपक्षी दल आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी की नाकामियों को ही अपना चुनावी मुद्दा बनाते हैं."

राय कहते हैं, "यह याद रखना होगा कि ममता का सबसे बड़ा करिश्मा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेता के तौर पर है. वह एसआईआर को राजनीतिक तौर पर इतना बड़ा मुद्दा बना रही हैं कि भाजपा को इस पर जवाब देना पड़ रहा है. दिलचस्प बात यह है कि एक सत्तारूढ़ पार्टी दूसरी सत्तारूढ़ पार्टी से सवाल कर रही है."

उनका कहना था कि एसआईआर का मुद्दा फिलहाल बाकी तमाम मुद्दों पर भारी पड़ रहा है.

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इमेज कैप्शन, पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है

वह कहते हैं, "रोटी, कपड़ा और मकान जैसे लोगों की मौलिक ज़रूरतें अब पृष्ठभूमि में चली गई हैं. अब एसआईआर पर ही सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है."

राय का कहना था, "तृणमूल कांग्रेस लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि एसआईआर की आड़ में अल्पसंख्यकों के नाम सूची से काटे जा रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा समझाना चाहती है कि अवैध वोटरों के नाम ही सूची से कटे हैं और इनमें से ज़्यादातर तृणमूल कांग्रेस का वोट बैंक थे. दोनों पार्टियां आक्रामक रणनीति के सहारे आगे बढ़ रही हैं."

वह शुभेंदु अधिकारी की भी अहमियत बताते हैं, "शुभेंदु अधिकारी की ख़ासियत यह है कि उनका चुनाव क्षेत्र नंदीग्राम है और वह एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने मुख्यमंत्री को हराया है. इस बार वह नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर से भी चुनाव लड़ रहे हैं."

राय के मुताबिक, शुभेंदु के ऐसा करने के दो कारण हैं. पहला यह कि वह यह संदेश देना चाहते हैं कि नंदीग्राम में ममता को हराने के बाद अब वह उनको उनके घर भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं.

दूसरा यह कि वह मुख्यमंत्री की चुनावी रणनीति में सेंध लगाते हुए उनके वोट तंत्र को ढहाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी सोच यह है कि इससे ममता को भवानीपुर में ज़्यादा समय देना पड़ेगा और वह राज्य के दूसरे हिस्सों में ज़्यादा प्रचार करने का समय नहीं निकाल सकेंगी. इससे भाजपा को सहूलियत होगी.

राय की निगाह में हुमायूं कबीर बेहद दिलचस्प भूमिका में हैं.

वह कहते हैं, "तृणमूल कांग्रेस को मुसलमानों के ज़्यादा वोट मिलते हैं. इसलिए हुमायूं कबीर अहम हो गए हैं. उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई है. वह यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी पार्टी ही मुसलमानों की एकमात्र हितैषी है और तृणमूल कांग्रेस अब तक महज़ वोट बैंक के तौर पर उनका इस्तेमाल करती रही है. वह बाबरी मस्जिद की तर्ज पर मस्जिद भी बना रहे हैं."

राय का कहना था, "दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस उन पर मुस्लिम वोटों में सेंध लगा कर भाजपा को फायदा पहुंचाने के आरोप लगा रही है. लेकिन दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि वह दरअसल दूसरे तरीके से ममता बनर्जी की ही मदद कर रहे हैं. इससे खेल दिलचस्प हो गया है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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