वज़न कम करना कुछ लोगों के लिए इतना मुश्किल क्यों होता है

    • Author, निक ट्रिगल
    • पदनाम, हेल्थ संवाददाता, बीबीसी
  • पढ़ने का समय: 14 मिनट

"मोटे लोगों को बस ज़्यादा सेल्फ-कंट्रोल की ज़रूरत है, यह निजी ज़िम्मेदारी की बात है. इसे निभाना आसान है, बस कम खाओ."

ये लाइनें उन 1 हज़ार 946 कमेंट्स में थीं, जो पिछले साल मेरे लिखे एक आर्टिकल के नीचे पाठकों ने पोस्ट किए थे. यह आर्टिकल वज़न कम करने वाले इंजेक्शन के बारे में था.

बहुत से लोग मानते हैं कि मोटापा कम करना सिर्फ़ इच्छाशक्ति की बात है. ऐसे लोगों में कुछ मेडिकल प्रोफेशनल भी शामिल हैं.

ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अमेरिका के लोगों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार, 10 में से 8 लोगों ने कहा कि मोटापे को सिर्फ़ लाइफ़स्टाइल से पूरी तरह से रोका जा सकता है. यह स्टडी मेडिकल जर्नल द लांसेट में पब्लिश की गई थी.

माफ़ी चाहते हैं, हम इस स्टोरी का कुछ हिस्सा लाइटवेट मोबाइल पेज पर नहीं दिखा सकते.

लेकिन 20 साल तक मोटे और ज़्यादा वज़न वाले लोगों के साथ काम कर चुकीं डायटिशियन बिनी सुरेश इससे सहमत नहीं हैं.

उनका मानना ​​है कि यह सिर्फ़ आधी-अधूरी तस्वीर है.

वह कहती हैं, "मैं अक्सर ऐसे मरीज़ों को देखती हूँ जो बहुत मोटिवेटेड हैं, जानकार हैं और लगातार कोशिश कर रहे हैं, फिर भी वज़न कम करने में संघर्ष कर रहे हैं."

'वेटवॉचर्स' की मेडिकल डायरेक्टर डॉक्टर किम बॉयड इस बात से सहमत हैं. उनका कहना है, "इच्छाशक्ति और 'सेल्फ-कंट्रोल' जैसे शब्द ग़लत हैं. दशकों से लोगों को बताया गया है कि कम खाओ और ज़्यादा एक्सरसाइज़ करो. इससे वज़न कम हो जाएगा... लेकिन मोटापा कहीं ज़्यादा जटिल मामला है."

उन्होंने और जिन दूसरे एक्सपर्ट्स से मैंने बात की, वे बताते हैं कि किसी व्यक्ति के मोटापे के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ अभी पूरी तरह से समझे नहीं जा सके हैं. लेकिन यह स्पष्ट है कि यहाँ सबके लिए मामला एक समान नहीं है.

ब्रिटेन में सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए रेगुलेशन का सहारा लिया है.

इस मामले में सबसे ताज़ा कदम है रात 9 बजे से पहले टेलीविज़न पर जंक फूड के विज्ञापन और ऑनलाइन प्रमोशन पर पूरी तरह से प्रतिबंध, जो लागू हो चुका है.

फिर भी, कई लोगों का मानना है कि यह कदम भी ब्रिटेन में मोटापे की बढ़ती समस्या से निपटने में ज़्यादा कारगर नहीं होगा, जहाँ औसतन हर चार वयस्कों में एक से ज़्यादा इस समस्या से प्रभावित है.

बायोलॉजी के ख़िलाफ़ एक लड़ाई

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इमेज कैप्शन, लंदन के क्लीवलैंड क्लिनिक में डायटेटिक्स की हेड बिनी सुरेश का कहना है कि सिर्फ़ इच्छाशक्ति के भरोसे वज़न मैनेज करने और उसे बनाए रखने की उम्मीद करना अवास्तविक और अनुचित दोनों है (सांकेतिक तस्वीर)
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प्रोफेसर सदफ़ फ़ारूक़ी, एक कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हैं और गंभीर मोटापे और संबंधित एंडोक्राइन बीमारियों वाले मरीज़ों का इलाज करती हैं.

वह बताती हैं, "किसी का वज़न कितना बढ़ता है, यह उनके जीन्स से काफ़ी प्रभावित होता है और ये जीन्स हर किसी के लिए मायने रखते हैं."

वह कहती हैं कि कुछ खास जीन्स दिमाग़ के उन हिस्सों पर असर डालते हैं जो पेट से दिमाग़ को भेजे गए सिग्नल के जवाब में भूख और खाना खाने को रेगुलेट करते हैं.

"मोटापे वाले लोगों में इन जीन्स में बदलाव या वेरिएंट पाए जाते हैं, जिसका मतलब है कि उन्हें ज़्यादा भूख लगती है और संभावित तौर पर खाने के बाद भी उनमें पेट भरने का एहसास कम होता है."

कम से कम अब तक जितने जीन्स के बारे में पता चला है, शायद उनमें सबसे ज़रूरी जीन एमसी4आर जीन है. इस जीन में एक म्यूटेशन होता है, जो ज़्यादा भोजन करने को बढ़ावा देता है और इसका मतलब है कि हमें यह कम महसूस होता है कि हमारा पेट भरा हुआ है. यह जीन मोटे तौर पर दुनिया के पाँच में से एक इंसान में पाया जाता है.

प्रोफेसर फ़ारूक़ी कहती हैं, "अन्य जीन मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं. यानी हम कितनी तेज़ी से एनर्जी बर्न करते हैं. इसका मतलब है कि कुछ लोगों का वज़न उतनी ही मात्रा में खाना खाने से दूसरों की तुलना में ज़्यादा बढ़ेगा और उनका फ़ैट ज़्यादा बढेगा. या वे एक्सरसाइज़ करते समय कम कैलोरी बर्न करेंगे."

उनका अनुमान है कि ऐसे हज़ारों जीन हो सकते हैं जो वज़न पर असर डालते हैं और हमें उनमें से सिर्फ़ 30 से 40 के बारे में ही विस्तार से पता है.

यो-यो डायटिंग के पीछे का विज्ञान

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इमेज कैप्शन, मोटापे से दिल की बीमारी, स्ट्रोक, टाइप 2 डायबिटीज़ और कुछ तरह के कैंसर भी हो सकते हैं (सांकेतिक तस्वीर)

लेकिन इस कहानी के कई हिस्से हैं.

बेरिएट्रिक सर्जन और 'व्हाई वी ईट टू मच' किताब के लेखक एंड्रयू जेनकिंसन बताते हैं कि हर किसी का एक वज़न होता है जिसे उनका दिमाग़ समझता है या सोचता है कि यह उनके लिए सही वज़न है - भले ही वह ज़्यादा वज़न हो या नहीं.

इसे 'सेट वेट पॉइंट थ्योरी' के नाम से जाना जाता है.

उनका कहना है, "यह (सेट वेट) जेनेटिक्स से तय होता है, लेकिन इसके पीछे दूसरे फैक्टर्स भी हैं, मसलन आपके भोजन करने का माहौल, आपके अंदर स्ट्रेस की स्थिति और आपकी नींद."

इसका मतलब है कि शरीर का वज़न एक थर्मोस्टेट की तरह होता है. आपका शरीर उस पसंदीदा रेंज को बनाए रखने की कोशिश करता है.

उस थ्योरी के अनुसार, अगर वज़न इस 'सेट पॉइंट' से नीचे चला जाता है, तो भूख बढ़ जाती है और मेटाबॉलिज़्म धीमा हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे थर्मोस्टेट बहुत ज़्यादा ठंड होने पर गर्मी बढ़ा देता है.

डॉक्टर जेनकिंसन का कहना है कि एक बार जब आपका पॉइंट सेट हो जाता है, तो इच्छाशक्ति से इसे बदलना बहुत मुश्किल होता है.

यह यो-यो डायटिंग को भी समझा सकता है.

वह कहते हैं, "उदाहरण के लिए अगर आपका वज़न 20 स्टोन (क़रीब 127 किलोग्राम) है और आपका दिमाग़ चाहता है कि आपका वज़न 20 स्टोन ही रहे और आप कम कैलोरी वाली डायट लेते हैं और दो स्टोन वज़न कम करते हैं, तो आपके शरीर का रिएक्शन वैसा ही होगा जैसे कि आप भूखे रह रहे हों."

वह आगे कहते हैं, "इसका नतीजा यह होगा कि आपको बहुत ज़्यादा भूख लगेगी, आपके व्यवहार में भोजन ढूंढना शामिल हो जाएगा और मेटाबॉलिज़्म कम हो जाएगा. भूख के ये सिग्नल बहुत ज़्यादा ताक़तवर होते हैं. ये प्यास लगने के सिग्नल जितने ही मज़बूत होते हैं, ये हमें ज़िंदा रहने में मदद करने के लिए होते हैं."

उनका कहना है, "बहुत ज़्यादा भूख लगना ऐसी चीज़ है जिसे नज़रअंदाज़ करना सच में बहुत ही मुश्किल है."

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इमेज कैप्शन, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में जेनेटिक्स ऑफ ओबेसिटी स्टडी की हेड प्रोफेसर फ़ारूक़ी के मुताबिक़ समान मात्रा में खाने के बाद भी कुछ लोगों का वज़न ज़्यादा बढ़ता है, कुछ का कम (सांकेतिक तस्वीर)

डॉक्टर जेनकिंसन इसके पीछे के साइंस के बारे में लेप्टिन की भूमिका बताते हैं.

उनका कहना है, "यह एक हार्मोन है जिसे फैट सेल्स बनाते हैं. यह हाइपोथैलेमस के लिए एक सिग्नल की तरह काम करता है, जो दिमाग़ का वह हिस्सा है जो मूल रूप से आपके वज़न के सेट पॉइंट को कंट्रोल करता है, ताकि उसे बताया जा सके कि शरीर में कितनी एनर्जी स्टोर है."

"हाइपोथैलेमस लेप्टिन लेवल को देखेगा और अगर ऐसा लगता है कि हम बहुत ज़्यादा एनर्जी या बहुत ज़्यादा फैट स्टोर कर रहे हैं, तो यह अपने आप हमारे व्यवहार को बदल देगा, हमारी भूख कम कर देगा और हमारे मेटाबॉलिज़्म को बढ़ा देगा."

डॉक्टर जेनकिंसन बताते हैं कि कम से कम लेप्टिन को इसी तरह काम करना चाहिए, लेकिन अक्सर, यह फेल हो जाता है, खासकर पश्चिमी भोजन में.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लेप्टिन सिग्नल इंसुलिन के साथ एक सिग्नलिंग पाथवे शेयर करता है.

डॉक्टर जेनकिंसन के मुताबिक़, "इसलिए अगर इंसुलिन का लेवल बहुत ज़्यादा होता है, तो यह असल में लेप्टिन सिग्नल को कमज़ोर कर देता है और अचानक दिमाग़ यह समझ नहीं पाता कि कितना फैट जमा है."

अच्छी बात यह है कि यह सेट पॉइंट फिक्स नहीं होता. यह लगातार लाइफस्टाइल में बदलाव, बेहतर नींद, स्ट्रेस कम करने और लंबे समय तक सेहत से जुड़ी अच्छी आदतों को अपनाने से धीरे-धीरे बदल सकता है.

यह थर्मोस्टेट को रीसेट करने जैसा है. समय के साथ, धीरे-धीरे और लगातार एडजस्टमेंट शरीर को एक नई, हेल्दी रेंज को अपनाने में मदद कर सकते हैं.

मोटापे की ख़तरनाक स्थिति

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इमेज कैप्शन, द फूड फाउंडेशन की पिछले साल की एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि हेल्दी खाना, कम हेल्दी खाने की तुलना में प्रति कैलोरी दोगुने से ज़्यादा महंगा होता है (सांकेतिक तस्वीर)

इनमें से कोई भी मोटापे में बढ़ोतरी का कारण नहीं बताता. आख़िरकार, हमारे जीन और हमारे शरीर की बायोलॉजिकल बनावट तो नहीं बदले हैं.

पिछले एक दशक में ज़्यादा वज़न या मोटापे की कैटेगरी में आने वाले वयस्कों का अनुपात लगातार बढ़ा है. हेल्थ फाउंडेशन के 2025 के विश्लेषण से पता चलता है कि अब ब्रिटेन के 60% से ज़्यादा वयस्क इस कैटेगरी में आते हैं, जिसमें लगभग 28% मोटे लोग शामिल हैं.

इसका एक कारण ख़राब क्वालिटी वाले और ज़्यादा कैलोरी वाले भोजन हैं. ख़ासकर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाने की बहुत ज़्यादा मात्रा और उनकी कम कीमत इसकी बड़ी वजह हैं.

इसमें फास्ट फूड और मीठे ड्रिंक्स की ज़बरदस्त मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग, भोजन में उनकी बढ़ती मात्रा और फिजिकल एक्टिविटी के सीमित मौक़े को जोड़ दें जो अक्सर शहरी जीवन या समय की कमी के कारण होता है, तो काफ़ी खतरनाक स्थिति बन जाती है.

प्रोफेसर फ़ारूक़ी कहते हैं, " इसका नतीजा यह है कि हम एक आबादी के तौर पर ज़्यादा मोटे हो गए हैं और, बेशक जेनेटिक तौर पर जिनका वज़न बढ़ने की ज़्यादा संभावना थी, उनका वज़न बढ़ा है."

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट इसे ओबेसोजेनिक एनवायरनमेंट कहते हैं.

यह शब्द पहली बार 1990 के दशक में इस्तेमाल किया गया था जब रिसर्चर्स बढ़ते मोटापे की दरों को खाने की उपलब्धता, मार्केटिंग और शहरी जीवन शैली जैसे बाहरी कारणों से जोड़ने लगे थे.

कई एक्सपर्ट्स का तर्क है कि ये सभी कारण मिलकर ज़्यादा भोजन करने और शारीरिक सक्रियता की कमी की ओर ले जाते हैं. जिसका मतलब है कि बहुत ज़्यादा मोटिवेटेड लोगों को भी संतुलित वज़न बनाए रखने में मुश्किलें आती हैं.

लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि इच्छाशक्ति भी एक मुश्किल शब्द क्यों बन गया है.

'मोटापा एक निजी जिम्मेदारी' से जुड़ी बहस

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इमेज कैप्शन, ब्रिटेन में सरकार ने रात 9 बजे से पहले टेलीविज़न पर कुछ अनहेल्दी खाने की चीज़ों के विज्ञापन पर बैन लगा दिया है और इनके ऑनलाइन प्रमोशन पर पूरी तरह से रोक लगा दी है (सांकेतिक तस्वीर)

न्यूकैसल सिटी काउंसिल में अपने ऑफिस में बैठीं पब्लिक हेल्थ डायरेक्टर एलिस वाइज़मैन को हर जगह खाना ही खाना दिखता है.

उनका कहना है, "वहां कॉफी शॉप, बेकरी और टेकअवे हैं. आप बिना किसी फ़ूड प्लेस के पास से गुज़रे स्कूल या काम पर नहीं जा सकते. और यह दिखना मायने रखता है. अगर आप काम पर जाते समय बहुत सारे टेकअवे से गुज़रते हैं, तो इसकी संभावना ज़्यादा होती है कि आप उनमें से कुछ ख़रीद लेंगे. आपका शरीर लगभग अपने आस-पास के भोजन को देखकर रिएक्ट करता है."

वाइज़मैन गेट्सहेड में पब्लिक हेल्थ डायरेक्टर हैं. यहां साल 2015 से किसी नए हॉट फूड टेकअवे को अनुमति नहीं दी गई है.

लेकिन पूरे देश में, फास्ट-फूड और टेकअवे इंडस्ट्री लगातार बढ़ रही है - यह हर साल 30 अरब डॉलर से ज़्यादा की है.

ऑफकॉम कम्युनिकेशंस मार्केट की सबसे ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन में फूड एडवरटाइजिंग ख़र्च पर उन प्रोडक्ट्स का दबदबा है जिनमें फैट, नमक और चीनी ज़्यादा होती है, जैसे कि कन्फेक्शनरी, मीठे ड्रिंक्स, फास्ट फूड और स्नैक्स.

लेकिन वाइज़मैन का कहना है कि जंक फूड या आधिकारिक तौर पर "कम हेल्दी भोजन" के टीवी और ऑनलाइन विज्ञापन को रोकने के लिए लागू किए गए नए उपाय सिर्फ़ कुछ हद तक ही काम करेंगे.

द फूड फाउंडेशन की पिछले साल की एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि हेल्दी खाना, कम हेल्दी खाने की तुलना में प्रति कैलोरी दोगुना से ज़्यादा महंगा होता है.

वाइज़मैन कहती हैं, "जिन परिवारों के पास पैसे की कमी होती है, उनके लिए हेल्दी खाना मुश्किल होता है."

वह कहती हैं, "मैं यह नहीं कह रही कि निजी ज़िम्मेदारी की कोई भूमिका नहीं होती. लेकिन जब आप इस बारे में सोचते हैं, तो आपको पूछना होगा कि बदला क्या है? हमारी इच्छाशक्ति अचानक ही कम नहीं हो गई है."

सुरेश भी इससे सहमत हैं. उनका कहना है, "हम ऐसे माहौल में रह रहे हैं जो ज़्यादा खाने के लिए बनाया गया है. मोटापा चरित्र की कमी नहीं है. यह एक जटिल, पुरानी स्थिति है जो बायोलॉजी और बहुत ज़्यादा मोटापा बढ़ाने वाले माहौल से बनती है."

"सिर्फ़ इच्छाशक्ति काफ़ी नहीं है और वज़न घटाने को सिर्फ़ अनुशासन का मामला मानना ​​नुक़सान पहुँचा सकता है."

हालांकि इच्छाशक्ति को लेकर लोगों राय में अंतर भी है.

'ए कैलोरी इज़ ए कैलोरी' किताब के लेखक प्रोफेसर कीथ फ्रेयन मानते हैं कि 40 साल पहले शायद इतने ज़्यादा वज़न वाले लोग नहीं होते थे.

वह कहते हैं, "माहौल बदला है, लोगों की इच्छाशक्ति या कुछ और नहीं. मुझे चिंता है कि 'विलपावर' को नज़रअंदाज़ करने से लोग आसानी से ऐसे वज़न को स्वीकार कर लेते हैं जो शायद उनकी इच्छा के अनुसार न हो, या उनकी सेहत के लिए ठीक न हो."

वह उन लोगों के बड़े डेटाबेस की ओर इशारा करते हैं जिन्होंने सफलतापूर्वक वज़न कम किया है और उस वज़न को बनाए रखा है.

उदाहरण के लिए अमेरिका में नेशनल वेट कंट्रोल रजिस्ट्री, जिसमें दस हज़ार से ज़्यादा लोग शामिल हैं.

कीथ फ्रेयन के मुताबिक़, "वे लोग वज़न कम करने और उसे बनाए रखने दोनों को 'मुश्किल' बताते हैं. इसमें से कम वज़न बनाए रखना, ज़्यादा मुश्किल है. मैं यह कहना चाहूंगा कि अगर आप उन लोगों से कहें कि इसमें 'इच्छाशक्ति' का इससे कोई लेना-देना नहीं है, तो उन्हें बहुत बुरा लगेगा."

क़ानून के सहारे लोगों को सही रास्ते पर लाना कहाँ तक संभव

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इमेज कैप्शन, कुछ लोगों का मानना है कि मोटापे से निपटने के लिए रेगुलेशन ज़रूरी है (सांकेतिक तस्वीर)

इस मामले में ज़ाहिर तौर पर बड़ी बहस यह है कि इसके लिए सरकार को कितनी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.

वाइज़मैन का मानना ​​है कि मोटापे से निपटने में रेगुलेशन एक ज़रूरी टूल है.

उनका तर्क है कि बाय-वन-गेट-वन फ्री जैसे प्रमोशन लोगों को बिना सोचे-समझे ख़रीदारी करने के लिए बढ़ावा देते हैं.

लेकिन राइट-विंग थिंक टैंक पॉलिसी एक्सचेंज में हेल्थ और सोशल केयर के हेड गैरेथ लियोन का तर्क है कि ज़्यादा कानून बनाना आगे बढ़ने का सही तरीका नहीं है.

वह कहते हैं, "आप लोगों को कानून बनाकर फिट नहीं बना सकते. जो खाना लोग मज़े से खाते हैं, उन पर बैन और टैक्स लगाने से सिर्फ़ लोगों की ज़िंदगी मुश्किलें बढ़ेंगी, ज़िंदगी का मज़ा कम होगा और चीज़ें ज़्यादा महंगी होंगी. वो भी ऐसे समय में जब ब्रिटेन पहले से ही महंगाई से जूझ रहा है."

इंस्टीट्यूट ऑफ़ इकोनॉमिक अफेयर्स, जो एक राइट-विंग थिंक टैंक है. यहाँ लाइफस्टाइल इकोनॉमिक्स के हेड क्रिस्टोफर स्नोडन का भी मानना ​​है कि मोटापा एक "व्यक्तिगत समस्या" है, न कि पब्लिक हेल्थ की समस्या.

वह तर्क देते हैं, "मोटापा व्यक्ति के निजी फैसलों के कारण होता है. इसलिए आप किसी निजी शख़्स से आगे नहीं बढ़ सकते. मुझे यह एक काफ़ी अजीब विचार लगता है कि लोगों को पतला बनाना सरकार की ज़िम्मेदारी है."

"मैं इन (नई) नीतियों का एक गंभीर स्वतंत्र मूल्यांकन देखना चाहूंगा और अगर वे काम नहीं करती हैं तो उन्हें रद्द कर देना चाहिए."

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इमेज कैप्शन, फास्ट-फूड और टेकअवे इंडस्ट्री लगातार बढ़ रही है (सांकेतिक तस्वीर)

जहां तक ​इच्छाशक्ति की बात है तो यह हमेशा किसी न किसी तरह की भूमिका निभाएगी. फर्क केवल यह है कि एक्सपर्ट्स को लगता है कि यह किस हद तक भूमिका निभा सकती है.

सुरेश का मानना ​​है कि यह एक बड़ी तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा है. इसमें पहला कदम लोगों को यह बताना है कि इस मामले में और कौन से फैक्टर्स काम कर रहे हैं.

उनका कहना है, "यह नज़रिया विलपावर के बारे में नैतिक फैसलों से ध्यान हटाता है. यह करुणा और विज्ञान आधारित सपोर्ट सिस्टम की तरफ़ ले जाता है जो आख़िर में लंबे समय तक सफलता के बेहतर मौक़े देता है."

ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी की साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर एलेनोर ब्रायंट का कहना है कि विलपावर को मजबूत करने के तरीके भी हैं.

"यह हर समय एक जैसा नहीं रहता. यह आपके मूड, आप कितने थके हुए हैं और, आपको कितनी भूख लगी है, इस पर निर्भर करता है..."

यह भी मायने रखता है कि आप इसके बारे में कैसे सोचते हैं.

इच्छाशक्ति दो तरह की होती है – फ्लेक्सिबल और रिजिड. यानी लचीली और कठोर.

जो व्यक्ति इस मामले में रिजिड होता है, वह इसे ब्लैक एंड व्हाइट की तरह देखता है.

डॉक्टर एलेनोर ब्रायंट के मुताबिक़, "अगर आप टेम्पटेशन के आगे झुक जाते हैं, तो आप हार मान लेते हैं. आप वह बिस्किट खाते हैं और फिर खाते ही रहते हैं."

साइकोलॉजिकल शब्दों में, इसे डिसइनहिबिटेड ईटिंग कहा जाता है.

ब्रायंट कहती हैं "जबकि, जो व्यक्ति फ्लेक्सिबल होता है, वह कहता है, 'ठीक है, मैंने एक बिस्किट खा लिया है. लेकिन मैं यहीं रुक जाऊंगा.' कहने की ज़रूरत नहीं है, फ्लेक्सिबल होना ज़्यादा सफल होता है."

लेकिन वह कहती हैं, "खाने के मामले में विलपावर का इस्तेमाल करना शायद ज़िंदगी के दूसरे मसलों की तुलना में ज़्यादा मुश्किल है."

सुरेश इस बात से सहमत हैं, हालांकि वह कहती हैं कि एक बार जब लोग विलपावर की सीमाओं को समझ जाते हैं, तो इसका इस्तेमाल करने की उनकी क्षमता असल में मज़बूत हो जाती है.

उनका मानना है, "जब ये मरीज़ समझते हैं कि उनकी समस्या बायोलॉजी से जुड़ी है, न कि अनुशासन की कमी से, और उन्हें स्ट्रक्चर्ड न्यूट्रिशन, लगातार खाने के पैटर्न, साइकोलॉजिकल रणनीति और व्यवहारिक लक्ष्यों के साथ सपोर्ट किया जाता है, तो खाने के साथ उनका रिश्ता काफ़ी बेहतर हो जाता है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.