होर्मुज़ को लेकर ट्रंप की डेडलाइन क़रीब, भारत समेत इन देशों ने की ईरान से डील

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इमेज कैप्शन, ईरान ने भारत समेत कुछ देशों के जहाज़ों को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने की सीमित अनुमति दी है (फ़ाइल फ़ोटो
    • Author, ओसमंड चिया
    • पदनाम, बिज़नेस रिपोर्टर
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी कि अगर ईरान मंगलवार रात आठ बजे तक (वॉशिंगटन के समयानुसार) होर्मुज़ स्ट्रेट खोलने को तैयार नहीं हुआ, तो वो 'ईरान को एक रात में ही तबाह' कर सकते हैं.

लेकिन उनकी इस ताज़ा धमकी से पहले ही कुछ देशों ने ईरान के साथ अपने जहाज़ों को इस अहम समुद्री मार्ग से गुज़रने देने के लिए समझौते कर लिए थे.

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण फिलीपींस है.

एशियाई देश ऐसे समझौतों को लेकर ख़ास तौर पर उत्सुक रहे हैं, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्थाएँ खाड़ी क्षेत्र के ईंधन पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं.

फिलीपींस से पहले भारत और पाकिस्तान ने भी ईरान से समझौते किए हैं ताकि उनके कुछ जहाज़ों को होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने दिया जाए.

ईरान ने अमेरिकी और इसराइली हवाई हमलों के जवाब में होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने वाले जहाज़ों पर हमले की धमकी दी, जिसके बाद यह अहम मार्ग अंतरराष्ट्रीय तनाव का केंद्र बन गया है.

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इस सँकरे जलमार्ग में जहाज़ों की आवाजाही रुकने के बाद से तेल की क़ीमतों में तेज़ उछाल आया है.

दुनिया की कुल तेल सप्लाई का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा आम तौर पर इसी रास्ते से गुज़रता है.

पिछले हफ़्ते ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका को खाड़ी के तेल की ज़रूरत नहीं है.

उन्होंने बार-बार कहा था कि जिन देशों को होर्मुज़ से तेल चाहिए, उन्हें ख़ुद वहाँ जाकर तेल लेने की कोशिश करनी चाहिए.

भारत, पाकिस्तान और फिलीपींस के अलावा चीन ने भी माना है कि ईरान युद्ध के दौरान उसके जहाज़ों ने भी इस मार्ग का इस्तेमाल किया है.

हालाँकि, ईरान के इन देशों को दिए गए ये आश्वासन (समझौते) कितने लंबे समय तक टिकेंगे, इसे लेकर अब भी सवाल बने हुए हैं.

शिपिंग कंसल्टेंसी मैरिस्क्स के दिमित्रिस मैनियाटिस ने कहा, "हमें अब भी नहीं पता कि ये गारंटी सिर्फ़ कुछ जहाज़ों पर लागू होती है या किसी ख़ास देश के झंडे वाले सभी पोतों पर."

इसके बावजूद, यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी सिडनी के रॉक शी का कहना है कि खाड़ी के तेल पर निर्भर देश अब यह समझने लगे हैं कि अगर उन्हें सप्लाई को फिर से शुरू कराना है, तो उन्हें ईरान के साथ बातचीत करनी ही होगी.

कूटनीति

फिलीपींस ईरान के साथ समझौता करने वाला ताज़ा देश बन गया है.

देश की विदेश मंत्री थेरेसा लाज़ारो ने कहा कि ईरानी अधिकारियों ने फिलीपींस के झंडे वाले जहाज़ों के लिए इस जलमार्ग से 'सुरक्षित, बिना किसी रुकावट और आवाजाही का भरोसा दिया है.

उन्होंने कहा कि ईरान के साथ गुरुवार को हुई 'बेहद सार्थक फ़ोन बातचीत' के बाद हुआ यह समझौता तेल और फ़र्टिलाइज़र्स सप्लाई सुनिश्चित करने में 'बेहद अहम' है.

फिलीपींस अपना 98 फ़ीसदी तेल मिडिल-ईस्ट से आयात करता है और ईरान युद्ध शुरू होने के बाद वहाँ पेट्रोल की क़ीमतें दोगुनी से ज़्यादा हो चुकी हैं जिसके बाद वहाँ ऊर्जा को लेकर आपातकाल घोषित कर दिया गया था.

ऐसा करने वाला वो पहला देश बन गया था.

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सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के एनर्जी स्टडीज़ इंस्टीट्यूट के रोजर फूकेट का कहना है कि ईरान का यह दावा कि अमेरिका और उसके सहयोगियों को छोड़कर होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) सभी देशों के लिए खुला है, अब भी अनिश्चितता से घिरा हुआ है.

उन्होंने कहा कि फिलीपींस, जिसे अक्सर अमेरिका का सहयोगी माना जाता है, एक दिलचस्प उदाहरण है.

इससे यह संकेत मिलता है कि ईरान "मुद्दों को अलग-अलग खानों में रखकर देखने को तैयार" है.

उनके मुताबिक़, "ईरान ये फ़र्क करता दिख रहा है कि कौन सा देश अमेरिका का औपचारिक सहयोगी है और कौन सा देश इस युद्ध में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रहा है."

दूसरे देशों ने भी ईरान के साथ बातचीत की है.

पाकिस्तान ने 28 मार्च को घोषणा की थी कि ईरान ने उसके 20 जहाज़ों को होर्मुज़ से गुज़रने की अनुमति दे दी है.

पाकिस्तानी विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने कहा, "यह ईरान की एक स्वागतयोग्य और रचनात्मक पहल है, जिसकी सराहना की जानी चाहिए. बातचीत, कूटनीति और ऐसे भरोसा बढ़ाने वाले क़दम ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता हैं."

भारतीय जहाज़ों को जाने की अनुमति

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ईरान ने भारतीय झंडे वाले जहाज़ों के भी होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने की अनुमति दी है.

भारत में ईरानी दूतावास ने पिछले हफ़्ते एक्स पर पोस्ट किया, "हमारे भारतीय दोस्त सुरक्षित हाथों में हैं, चिंता की कोई बात नहीं."

भारत में ईरानी दूतावास ने ये टिप्पणी दक्षिण अफ़्रीका में ईरानी दूतावास की उस पोस्ट को शेयर करते हुए की जिसमें कहा गया था कि, "होर्मुज़ स्ट्रेट का भविष्य केवल ईरान और ओमान तय करेंगे."

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मार्च में फ़ाइनेंशियल टाइम्स से कहा था कि भारतीय टैंकरों की आवाजाही कूटनीति का नतीजा है.

ईरानी तेल के सबसे बड़े ख़रीदार चीन ने भी पिछले हफ़्ते पुष्टि की कि उसके कुछ जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़र चुके हैं, हालाँकि उसने ईरान का नाम नहीं लिया और न ही जहाज़ों के बारे में अधिक जानकारी दी.

विदेश मंत्रालय की एक प्रवक्ता ने पत्रकारों से कहा, "संबंधित पक्षों के साथ समन्वय के बाद हाल ही में तीन चीनी जहाज़ होर्मुज़ से गुज़रे. हम सहायता देने वाले संबंधित पक्षों के आभारी हैं."

जहाज़ों की आवाजाही पर नज़र रखने वाले आँकड़े बताते हैं कि हाल के हफ़्तों में अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरानी तेल की लाखों बैरल खेप चीन पहुँचाई गई है.

चीन के ईरान के साथ दोस्ताना कूटनीतिक संबंध हैं और वह पाकिस्तान के साथ मिलकर अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम कराने की कोशिशों में भी शामिल रहा है.

अब तक क्या कुछ स्पष्ट नहीं है

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यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इन देशों ने किन शर्तों पर अपने जहाज़ों के लिए सुरक्षित रास्ते की बातचीत की और क्या इन जहाज़ों ने होर्मुज़ स्ट्रेट पार करने के लिए ईरान को कोई टोल भी दिया है.

पिछले सप्ताह एलएनजी ले जा रहा एक जापानी जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रा. शिपिंग कंपनी मित्सुई ओएसके लाइन्स ने बीबीसी को ये जानकारी दी.

कंपनी ने कहा, "जहाज़ और सभी चालक दल के सदस्यों की सुरक्षा की पुष्टि हो चुकी है."

लेकिन कंपनी ने यह बताने से इनकार किया कि क्या कोई टोल चुकाया गया था या चालक दल ने सुरक्षित रास्ता कैसे सुनिश्चित किया.

मार्च में मलेशिया ने भी कहा था कि उसके कुछ टैंकरों को ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने की मंज़ूरी दी है. प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने इसके लिए ईरान के राष्ट्रपति को धन्यवाद दिया.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक़, मलेशिया के परिवहन मंत्री एंथनी लोक ने इसका क्रेडिट 'ईरानी सरकार के साथ अच्छे कूटनीतिक रिश्तों' को दिया.

हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि मलेशिया के झंडे वाले दूसरे जहाज़ों को भी यही भरोसा मिलेगा या नहीं.

मलेशिया के कुल तेल आयात का लगभग दो-तिहाई हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है.

दूसरे देशों के लिए इन समझौतों के क्या मायने होंगे, यह भी अब तक अनिश्चित है.

उदाहरण के लिए, क्या अन्य देश अपने जहाज़ों का झंडा बदलकर उन देशों का झंडा इस्तेमाल करेंगे जिन्हें सुरक्षित रास्ते की अनुमति मिली हुई है.

मैनियाटिस के मुताबिक़, फ़िलहाल ऐसे देशों के कई टैंकर जिन्हें सुरक्षित रास्ते का भरोसा नहीं मिला है वो पनामा और मार्शल आइलैंड्स जैसे देशों के झंडे लेकर होर्मुज़ से गुज़र रहे हैं.

हालाँकि अर्थशास्त्री रॉक शी का कहना है कि ये समझौते भले ही 'कूटनीतिक सफलता' हों, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं.

उनके अनुसार, यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि ईरान के ये आश्वासन कितने लंबे समय तक टिकेंगे और क्षेत्र में सैन्य अभियान इन पर क्या असर डालेंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.