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ऑपरेशन ब्लू स्टार: इंदिरा गांधी से नाराज़ होने के बावजूद ज्ञानी ज़ैल सिंह ने इस्तीफ़ा क्यों नहीं दिया? उनकी बेटी ने बताया
- Author, नवजोत कौर
- पदनाम, बीबीसी पत्रकार
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
"मैंने अपने पिता को कभी रोते नहीं देखा था, लेकिन जब सेना ने दरबार साहिब पर हमला किया, तो मैंने उन्हें अपनी आंखों से रोते देखा."
भारत के पहले सिख राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह के बारे में यह बात उनकी बेटी जोगिंदरपाल कौर ने बीबीसी पंजाबी के साथ एक इंटरव्यू के दौरान की.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना की कार्रवाई के कारण भारत के जिन राजनेताओं को सबसे ज़्यादा आलोचना झेलनी पड़ी ज्ञानी ज़ैल सिंह उनमें से एक हैं.
भारत सरकार का यह सैन्य अभियान जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके हथियारबंद साथियों को दरबार साहिब परिसर से बाहर निकालने के लिए 1984 में चलाया गया था.
जरनैल सिंह भिंडरावाले उस समय सिख धर्म के प्रचारक संगठन दमदमी टकसाल के प्रमुख थे.
ज्ञानी ज़ैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री भी रह चुके थे. वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पंजाब की रियासतों की सामंती व्यवस्था और ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रजा मंडल आंदोलन के नेता थे.
भारतीय राजनीति में उनकी छवि एक सहज राजनीतिज्ञ और मज़बूत नेता की थी. जब 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश पर भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया तो राष्ट्रपति के रूप में ज्ञानी ज़ैल सिंह तीनों सेनाओं के प्रमुख थे.
ज्ञानी ज़ैल सिंह पर ऑपरेशन ब्लू स्टार को रोकने में राष्ट्रपति और सिख नेता के रूप में पर्याप्त भूमिका नहीं निभाने का आरोप लगाया जाता है, हालांकि उनके कई करीबी लोग इस दावे से असहमत हैं.
ज्ञानी ज़ैल सिंह की भूमिका और प्रश्न
ऑपरेशन ब्लू स्टार को हुए 41 साल हो चुके हैं, ज्ञानी ज़ैल सिंह की 25 दिसंबर 1994 को एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद अपनी एक यात्रा के दौरान, उन्होंने अकाल तख्त साहिब के सामने खड़े होकर कहा, "मैं इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए गुरुओं से माफ़ी मांगता हूं."
बाद में उन्होंने अकाल तख्त को लिखित माफ़ीनामा भेजा, हालांकि उन्हें अकाल तख्त पर नहीं बुलाया गया, पर उनकी माफ़ी स्वीकार कर ली गई थी.
ऑपरेशन ब्लू स्टार में ज्ञानी ज़ैल सिंह की भूमिका का ज़िक्र कई वरिष्ठ पत्रकारों और लेखकों ने अपनी-अपनी किताबों में किया है. लेकिन आज भी यह सवाल पूछा जाता है कि, 'ज्ञानी ज़ैल सिंह राष्ट्रपति होते हुए भी ऑपरेशन ब्लू स्टार को क्यों नहीं रोक पाए?'
इसके जवाब में विभिन्न दावे किए जा रहे हैं, एक सिद्धांत उनके करीबी लोगों का है और दूसरा सिख समुदाय से संबंधित विद्वानों का है.
ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा क्यों नहीं दिया?
ज्ञानी ज़ैल सिंह के लिए गए फैसलों के पीछे क्या कहानी थी, यह शायद ही कोई बता सके, लेकिन हमने उस समय ज्ञानी ज़ैल सिंह के करीबी रहे और सिख राजनीति के कुछ विशेषज्ञों से बात करके इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश की.
ज्ञानी ज़ैल सिंह की बेटी जोगिंदरपाल कौर लगभग 90 साल की हैं. वो जून 1984 को याद करते हुए कहती हैं, "मैंने कभी अपने पिता को अपनी आंखों के सामने रोते नहीं देखा था, लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की सरकार के अकाल तख्त साहिब पर हमले के दौरान मैंने अपने पिता को अपनी आंखों से रोते देखा था."
जोगिंदरपाल कौर अब चंडीगढ़ में रहती हैं. जब ज्ञानी ज़ैल सिंह भारत के राष्ट्रपति थे तो जोगिंदरपाल कौर कई दिनों तक राष्ट्रपति भवन में भी रही थीं.
जोगिंदरपाल कौर कहती हैं, "जब ज्ञानी जी हमले के बाद दरबार साहिब की हालत देखने गए तो उन्होंने आकर हमें बताया कि सेना के हमले में अकाल तख्त की इमारत पूरी तरह से नष्ट हो गई है."
वे कहती हैं, "मैं पंजाब में अपने गांव में थी जब हमें पता चला कि दरबार साहिब पर सैन्य कार्रवाई की गई है. मैं अगले ही दिन दिल्ली में राष्ट्रपति भवन पहुंच गई."
"मैंने देखा कि चाचा (ज्ञानी ज़ैल सिंह) बहुत भावुक थे. वह इंदिरा गांधी से नाराज़ थे क्योंकि तीनों सेनाओं के प्रमुख होने के बावजूद ज्ञानी ज़ैल सिंह को दरबार साहिब पर हुए सैन्य हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी."
ज्ञानी ज़ैल सिंह के बड़े भाई के बच्चे उन्हें 'चाचा जी' कहते हैं और उनके अपने बच्चे भी उन्हें 'चाचा जी' ही कहते हैं.
जोगिंदरपाल कौर कहती हैं, "1984 की बात मौत तक उनके ज़ेहन में रही. वे खुद भी गुरबाणी पढ़ने वाले व्यक्ति थे."
"इंदिरा गांधी ने चाचा जी को दरबार साहिब पर सैन्य हमले के बारे में अंधेरे में रखा. उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि इंदिरा गांधी ऐसा कुछ करने जा रही हैं."
जोगिंदरपाल कौर का दावा है, "1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वह (ज़ैल सिंह) बहुत नाराज़ थे, उन्होंने इंदिरा गांधी के सामने अपना विरोध जताया और कहा कि यह ग़लत है."
जोगिंदरपाल कौर का मानना है कि अकाल तख्त पर हमले को देखकर ज्ञानी ज़ैल सिंह दुविधा में थे और असहाय भी.
भारतीय सेना ने 7 जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार के पूरा होने की घोषणा की. स्वर्ण मंदिर की पूरी तरह सफाई करने के बाद गुरबाणी का पाठ शुरू किया गया.
इस ऑपरेशन का नेतृत्व लेफ्टिनेंट जनरल केएस बरार ने किया था. बाद में उन्होंने इस पर एक किताब लिखी, जिसका नाम था 'ऑपरेशन ब्लू स्टार: द रियल स्टोरी'.
जनरल बरार लिखते हैं, "ज्ञानी ज़ैल सिंह 8 जून 1984 की सुबह स्वर्ण मंदिर पहुंचे और घंटाघर के प्रवेश द्वार पर स्वर्ण मंदिर के मुख्य ग्रंथी ज्ञानी साहिब सिंह और मैंने उनका स्वागत किया."
जनरल बरार लिखते हैं, "ज्ञानी ज़ैल सिंह अकाल तख्त की क्षतिग्रस्त इमारत को देखकर दुखी थे, चलते-चलते उनके कदम रुक रहे थे."
"मुख्य ग्रंथी ने दीवारों पर गोलियों के निशानों की ओर इशारा करते हुए ज्ञानी ज़ैल सिंह से कहा कि भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर को अपवित्र किया है"
जोगिंदरपाल कौर कहती हैं, "जब ज्ञानी ज़ैल सिंह को पता चला कि इंदिरा गांधी के आदेश पर स्वर्ण मंदिर पर हमला किया गया है, तो उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा कि वह स्वर्ण मंदिर को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं."
"वहां से दिल्ली लौटने के बाद ही उन्होंने इंदिरा गांधी के प्रति अपनी कड़ी नाराजगी व्यक्त की."
ज्ञानी ज़ैल सिंह की इंदिरा गांधी से नाराज़गी का ज़िक्र "अमृतसर-श्रीमती गांधीज लास्ट बैटल" किताब में भी किया गया है.
यह किताब बीबीसी पत्रकार और लेखक मार्क टली और उनके सहयोगी सतीश जैकब ने लिखी थी.
किताब में कहा गया है, "हमले के बाद ज्ञानी ज़ैल सिंह ने इंदिरा गांधी को स्पष्ट कर दिया था कि स्वर्ण मंदिर पर हमले से उन्हें गहरा दुख हुआ है."
"जिसके बाद देश के पहले सिख राष्ट्रपति अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बारे में सोच रहे थे. जिससे देश में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता था और विपक्ष इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर भी कर सकता था."
'इंदिरा गांधी ने ज्ञानी ज़ैल सिंह से माफी मांगी'
जोगिंदरपाल कौर का यह भी दावा है कि जून 1984 में जब अकाल तख्त पर हमला हुआ और अमृतसर में कर्फ्यू लगा दिया गया, तो राष्ट्रपति भवन के सभी टेलीफोन कनेक्शन काट दिए गए. राष्ट्रपति के कर्मचारियों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि पंजाब में क्या हो रहा है.
जोगिंदरपाल कौर के अनुसार, "जब इंदिरा गांधी को पता चला कि ज्ञानी ज़ैल सिंह उनसे नाराज़ हैं तो वे सैन्य हमले के अगले ही दिन राष्ट्रपति भवन आईं. उन्होंने आकर ज्ञानी ज़ैल सिंह से माफ़ी मांगी."
"लेकिन इंदिरा गांधी खेद जताने के अलावा कुछ नहीं कह सकीं. उन्होंने ज्ञानी ज़ैल सिंह से बस इतना कहा कि वह इन सबके लिए माफ़ी मांगती हैं."
ज्ञानी ज़ैल सिंह ने इस्तीफ़ा क्यों नहीं दिया?
जोगिंदरपाल कौर कहती हैं, "सिख अक्सर शिकायत करते हैं कि ज्ञानी ज़ैल सिंह ने अकाल तख्त पर सैन्य कार्रवाई के विरोध में अपने पद से इस्तीफ़ा क्यों नहीं दिया. लेकिन वे ज्ञानी जी की दुविधा को नहीं समझते."
"ज्ञानी ज़ैल सिंह सिर्फ सिखों के प्रतिनिधि नहीं थे, वे सभी धर्मों के लोगों के राष्ट्रपति थे."
जोगिंदरपाल कौर का दावा है कि वह अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहते थे, लेकिन उनके करीबी लोगों ने उन्हें सलाह दी कि अगर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया तो देश भर में लोग सिखों के खिलाफ हो जाएंगे.
जोगिंदरपाल का कहना है, "वो दुविधा में थे क्योंकि सिख सैन्य अधिकारियों ने भी चेताया था कि सेना में शामिल सभी सिख इस्तीफ़ा दे देंगे."
"देश के अंदर सिखों के लिए नफरत ना बढ़ जाए इस लिए उन्हे इस्तीफ़ा देना सही ना लगा. वो कहते थे कि सिखों विदेशों में भी बैठे है, मेरा इस्तीफ़ा सिखों की मुश्किलें और ना बढा दे.''
किताब "अमृतसर-श्रीमती गांधीज लास्ट बैटल'' में यह भी लिखा गया है कि जब ज्ञानी ज़ैल सिंह स्वर्ण मंदिर के दर्शन के बाद दिल्ली लौटे तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा न देने का फैसला किया.
ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ काम करने वालों ने क्या कहा?
हालांकि ज्ञानी ज़ैल सिंह के करीबी सहयोगियों में से एक तरलोचन सिंह का दावा है, "राष्ट्रपति होने के बावजूद ज्ञानी ज़ैल सिंह के पास इंदिरा गांधी के फैसले को बदलने की शक्ति नहीं थी. भले ही वह तीनों सेनाओं के प्रमुख थे, फिर भी उन्हें इस सैन्य अभियान के फैसले से दूर रखा गया."
पूर्व सांसद तरलोचन सिंह 2000 से 2003 तक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष थे.
वह ज्ञानी ज़ैल सिंह के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान उनके प्रेस सचिव के रूप में कार्यरत थे.
बीबीसी से बात करते हुए तरलोचन सिंह तर्क देते हैं कि भारत का संविधान देश के राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री के फ़ैसले को बदलने का अधिकार नहीं देता है.
वे कहते हैं, "आज भी राष्ट्रपति देश के प्रधानमंत्री के फ़ैसले को नहीं बदल सकते, तो हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ज्ञानी ज़ैल सिंह इंदिरा गांधी के फ़ैसले को बदल सकते थे."
वे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि ज्ञानी ज़ैल सिंह ने इंदिरा गांधी से अपना विरोध नहीं जताया. उन्होंने स्वर्ण मंदिर में जाकर तुरंत इंदिरा गांधी से बात की और कहा कि वे इस कार्रवाई से बेहद दुखी हैं."
"उन्होंने इंदिरा गांधी से पंजाब के राज्यपाल बीडी पांडे को हटाने की सिफारिश की, क्योंकि ज्ञानी ज़ैल सिंह ने कहा था कि यह सब पंजाब प्रशासन की विफलता के कारण हुआ."
"जिसके बाद इंदिरा गांधी ने राज्यपाल को तत्काल प्रभाव से हटा दिया."
गुरदर्शन सिंह ढिल्लों पंजाब विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसर और सिख इतिहास पर कई पुस्तकों के लेखक हैं.
वो कहते हैं, "अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे नेता अपने पद छोड़ सकते थे, तो ज्ञानी ज़ैल सिंह ने अपना विरोध व्यक्त करने का कोई रास्ता क्यों नहीं निकाला?"
वे आगे कहते हैं, "हालांकि ज्ञानी ज़ैल सिंह का परिवार दावा करता है कि उनका निर्णय सिखों को भविष्य की मुसीबतों से बचाने के लिए था, लेकिन हमारा मानना है कि सिखों के लिए स्वर्ण मंदिर पर हमले और नवंबर 1984 में दिल्ली में सिखों के नरसंहार से बदतर कुछ नहीं हो सकता, ये ऐसे घाव हैं जो हमेशा रिसते रहेंगे."
'ज्ञानी ज़ैल सिंह एक चतुर नेता थे'
ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ काम कर चुके पूर्व रॉ प्रमुख ए.एस. दुलत ने ज्ञानी ज़ैल सिंह को तेज-तर्रार और फुर्तीला नेता बताया है.
वे लिखते हैं, "ज्ञानी ज़ैल सिंह ने खुद को एक बहुत ही सीधे और सरल व्यक्ति के रूप में पेश किया, लेकिन वास्तव में वे एक बहुत ही चतुर नेता थे. राजनीति में अपनी साधारण शुरुआत के बावजूद, उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर देश के सर्वोच्च पद, राष्ट्रपति तक सफलतापूर्वक अपना रास्ता बनाया."
एएस दुलत ने अपनी पुस्तक 'कश्मीर दी दास्तान' में बताया है कि 1984 में वह ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ सुरक्षा अधिकारी (आईबी अधिकारी) के रूप में कार्यरत थे.
अपनी पुस्तक में 1984 की घटना का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं, "जब 1984 में सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दिया तो ज्ञानी जी बहुत दुखी हुए, क्योंकि सेना के सर्वोच्च कमांडर होने के बावजूद उन्हें इस मौके पर अंधेरे में रखा गया."
"सैन्य अभियान शुरू होने के चार दिन बाद वे दरबार साहिब में मत्था टेकने गए. इसके बाद गांधी परिवार से उनके रिश्ते पहले जैसे मधुर नहीं रहे. हालांकि वे सार्वजनिक तौर पर कहते थे कि अगर इंदिरा गांधी उनसे झाड़ू लगाने को कहें तो वे खुशी-खुशी उस आदेश का पालन करेंगे."
जोगिंदरपाल कौर भी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद ज़ैल सिंह के गांधी परिवार के साथ संबंध अच्छे नहीं थे.
नवंबर 1984 में इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके बाद देश भर के कई शहरों में सिख विरोधी दंगे हुए.
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू के दौरान जोगिंदरपाल कौर ने कहा, "आपने (राजीव गांधी) अपनी मां की हत्या देखी लेकिन मारे गए हजारों निर्दोष सिखों के जीवन की आपको कोई चिंता नहीं थी."
'सिख कभी ज्ञानी ज़ैल सिंह को माफ नहीं करेंगे'
दरबार साहिब पर हुए हमले को लेकर ज्ञानी ज़ैल सिंह के प्रति सिख समुदाय के गुस्से का मुख्य कारण यह था कि यह हमला सिख राष्ट्रपति के आदेश के तहत काम करने वाली सेना द्वारा किया गया था.
सिख विचारक गुरदर्शन सिंह कहते हैं, "सिख समुदाय को उम्मीद थी कि अगर यह हमला उनकी जानकारी के बिना हुआ तो वे इस्तीफ़ा दे देंगे या कोई अन्य सार्वजनिक विरोध प्रकट करेंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया."
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "कांग्रेस के बेहद करीबी होने और राष्ट्रपति होने के बावजूद ज्ञानी ज़ैल सिंह ने 1984 के स्वर्ण मंदिर हमले और नवंबर 1984 के सिख जनसंहार के बारे में चुप्पी बनाए रखी, जिसके लिए सिख उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे."
गुरदर्शन सिंह ढिल्लों कहते हैं, "ज्ञानी ज़ैल सिंह को केवल अपना पद प्रिय था, उन्होंने अपना पद बचाने और कांग्रेस के प्रति अपनी वफादारी साबित करने के लिए सिखों पर हो रहे अत्याचारों को चुपचाप सहन किया."
"इंदिरा गांधी से बात करने से सिखों के घाव नहीं भरते, सिखों को अपने नेता के समर्थन की जरूरत थी, जो देश के राष्ट्रपति के रूप में ज्ञानी ज़ैल सिंह प्रदान नहीं कर सकते थे."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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