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शुक्रवार, 10 दिसंबर, 2004 को 14:28 GMT तक के समाचार
 
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हौसला नहीं हारते हैं कुंबले कभी
 

 
 
अनिल कुंबले
अनिल कुंबले की अगली निगाह अब 500 विकेटों के लक्ष्य पर है
अनिल कुंबले - उस कहावत का एक जीता जागता उदाहरण हैं जो सीख देती है कि हार होने से पहले हथियार नहीं डालने चाहिए.

एक साल पहले तक हाल ये था कि भारतीय चयनकर्ताओं समेत पूरे टीम प्रबंधन ने कुंबले से पल्ला झाड़ लिया था.

उनकी फ़ॉर्म लगातार ख़राब चली आ रही थी और 2001 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ एक ही सीरीज़ में 32 विकेट लेने वाले हरभजन सिंह स्पिनर के तौर पर टीम की पहली पसंद बनते जा रहे थे.

कहा जाने लगा कि कुंबले की गेंदों में अब वो डंक और धार नहीं रही, वो थक गए हैं, दुनिया के बल्लेबाज़ उनकी गेंदों से निपटने का फ़ॉर्मूला निकाल चुके हैं, वग़ैरह, वग़ैरह...

ऐसे में पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर जब पहले टेस्ट में उनकी जगह हरभजन को खिलाया गया तो क्रिकेट पंडित भी कहने लगे कि बस अब कुंबले को बाइज़्ज़त सन्यास ले लेना चाहिए, इससे पहले कि चयनकर्ता उन्हें पूरी तरह भूल जाएँ और उन्हें 15 खिलाड़ियों की टीम में भी जगह न मिले.

लेकिन किस्मत के एक वार से सब कुछ पलट गया.

हरभजन अंगूठे की चोट से बाहर हुए और दूसरे टेस्ट में कुंबले को मौक़ा मिला.

बस वो दिन था और आज का दिन है, कुंबले ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

हार नहीं मानी

अनिल कुंबले की विकेटों की भूख अभी भी शांत नहीं हुई है
अनिल कुंबले

मेहनत, लगन और आत्मविश्वास का नतीजा है कि अनिल राधाकृष्ण कुंबले आज भारत के लिए सिर्फ़ वनडे ही नहीं बल्कि टेस्ट मैचों में भी सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ हैं.

टेस्ट मैचों में वो फ़िलहाल कपिल देव से सिर्फ़ दो विकेट आगे हैं लेकिन बंगलौर में जन्मे 34 साल के इस स्पिन गेंदबाज़ की विकेटों की भूख अभी शांत नहीं हुई है और उनकी नज़र अब 500 के आँकड़े पर है.

अगर कुंबले ऐसा कर पाते हैं तो ये इस बात का सबूत होगा कि वो ऑस्ट्रेलिया के शेन वॉर्न, और श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन से किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं.

स्पिन में भी तेज़ी

अनिल कुंबले
कुंबले की गेंदों में रफ़्तार होती है

अनिल कुंबले ने अपना शुरुआती क्रिकेट जीवन एक तेज़ गेंदबाज़ के रूप में शुरू किया लेकिन बाद में उन्हें अहसास हुआ कि स्पिन की कला में वो अपने लिए एक अलग जगह बना सकते हैं.

ये पूरी तरह सच भी है कि अनिल कुंबले बाक़ी स्पिनरों से अलग हैं.

उनकी एक सीमा भी है कि वो गेंद को ज़्यादा घुमा नहीं सकते लेकिन ये कमी वो अपनी गेंदों में रफ़्तार लाकर पूरी करते हैं.

शुरूआत में ही अपनी गुगली गेंदों से उन्होंने बल्लेबाज़ों को परेशान किया.

गुगली यानी लेग स्पिन गेंदबाज़ की वो गेंद जो फेंकी तो उसी एक्शन से जाती है ताकि बल्लेबाज़ समझे कि ये भी बाक़ी गेंदों की तरह लेग स्टंप पर पड़ कर ऑफ़ स्टंप की तरफ़ जाएगी.

लेकिन होता उल्टा है और गेंद जहाँ कहीं भी पड़े, बाहर जाने के बजाय अंदर की तरफ़ आ जाती है और बल्लेबाज़ चकमा खा जाते हैं.

जहाँ शेन वॉर्न और मुरलीधरन ने गेंद को ज़बर्दस्त तरीक़े से घुमाने की क्षमता पर विकेट लिए हैं वहीं कुंबले ने ज़्यादातर अपनी गुगली, टॉप स्पिन और फ़्लिपर जैसी गेंदों से बल्लेबाज़ों को आउट किया है.

वो अब 91 टेस्ट में 436 विकेट ले चुके हैं और 259 वनडे मैचों में 321 बल्लेबाज़ों को आउट कर चुके हैं.

शुरुआत

20 साल की उम्र में अनिल कुंबले ने नरेन्द्र हिरवानी के साथ इंग्लैंड में अपने टेस्ट जीवन की शुरुआत की और भारतीय स्पिन कला के पुनर्जीवित होने की उम्मीद जागी.

अनिल कुंबले
अनिल कुंबले ने जगाई स्पिन की कला को फिर से जीवन देने की उम्मीद

हिरवानी तो बस एक कारनामा करने के बाद गुमनामी के अँधेरे में खो गए लेकिन कुंबले ने दिखा दिया कि वो किसी और ही मिट्टी के बने हैं.

भारतीय उपमहाद्वीप और ख़ासकर अपने देश की विकेटें तो कुंबले को ख़ूब रास आती हैं.

पाँच साल पहले दिल्ली में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच की एक ही पारी में दस के दस विकेट लेकर कुंबले ने इंग्लैंड के जिम लेकर के रिकॉर्ड की भी बराबरी की.

लेकिन ये भी सच है कि विदेशी धरती पर वो उतने सफल नहीं रहे हैं.

बार-बार उन्हें टीम से बाहर किया गया और हर बार चयनकर्ताओं को उनकी अहमियत समझ आई.

निजी जीवन

कुंबले मीडिया की नज़र से थोड़ा दूर रहना ही पसंद करते हैं और यही वजह है कि मैदान के बाहर उनकी वो छवि नहीं है जो कपिल देव या फिर बाक़ी सफल क्रिकेटरों की है.

17 अक्तूबर 1970 को जन्मे अनिल कुंबले पहले नज़र का चश्मा पहन कर क्रिकेट खेलते थे लेकिन बाद में उन्होंने कॉन्टैक्ट लेंस पहनना शुरू किया.

कर्नाटक रणजी टीम के कप्तान रहे कुंबले का क्रिकेट के अलावा एक और पेशा है और वो है सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग जिसमें वो अपने भाई दिनेश के साथ मिल कर कंपनी चलाते हैं.

उनकी पत्नी चेतना के. रामतीर्थ की पहली शादी से एक बेटी है.

 
 
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