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बुधवार, 14 अप्रैल, 2004 को 06:20 GMT तक के समाचार
 
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'आ बैल मुझे मार'
 

 
 
पार्थिव पटेल
कितना बुद्धिमत्तापूर्ण फ़ैसला है यह....
रावलपिंडी के आख़िरी और निर्णायक मैच में भारत के सामने टीम को लेकर बड़ी मुश्किल थी.

कप्तान सौरभ गांगुली के टीम में लौटने से पहले ही मीडिया में ये बहस शुरू हो चुकी थी कि गांगुली किसकी जगह टीम में शामिल होंगे.

यानी किस बल्लेबाज़ का पत्ता कटेगा. लाहौर टेस्ट में कठिन परिस्थिति में शतक लगाने वाले युवराज सिंह को टीम से हटाना मुश्किल फ़ैसला होता.

इसलिए सबका ध्यान गया इस सिरीज़ में अब तक कुछ ख़ास न कर पाने वाले सलामी बल्लेबाज़ आकाश चोपड़ा पर.

लेकिन मुश्किल सवाल यह था कि अगर चोपड़ा की जगह कप्तान गांगुली आते हैं तो फिर सहवाग के साथ पारी कौन शुरू करेगा.

कौन करेगा शुरुआत

भारतीय टीम ने रावलपिंडी टेस्ट से एक दिन पहले इतना तो स्पष्ट कर दिया कि आकाश चोपड़ा इस टेस्ट में नहीं खेलेंगे.

आकाश चोपड़ा अच्छे सलामी बल्लेबाज़ के रूप में ढ़ल रहे थे

लेकिन आख़िरी मौक़े तक ये नहीं बताया गया कि सहवाग के साथ पारी कौन शुरू करेगा.

रावलपिंडी टेस्ट के पहले दिन पाकिस्तानी पारी सिमटने के बाद जब पार्थिव पटेल वीरेंदर सहवाग के साथ पिच पर उतरे तब पता चला कि भारतीय टीम प्रबंधन ने आकाश की जगह किस पर भरोसा किया है.

तो क्या पार्थिव पटेल से पारी की शुरुआत कराना सही फ़ैसला था. क्या भारतीय टीम प्रबंधन ने इस बारे में कोई सोची-समझी रणनीति बनाई है.

क्या लंबे समय तक भारतीय टीम की मुश्किल रही सलामी जोड़ी एक बार फिर अपना सिर उठाने लगी है.

सवाल कई हैं और उनका जवाब ढूँढ़ना इतना आसान भी नहीं.

बुद्धिमानी वाला फ़ैसला या...

लेकिन एक बात तो तय है कि भारतीय टीम प्रबंधन का यह फ़ैसला कोई बुद्धिमानी वाला फ़ैसला नहीं कहा जा सकता.

युवराज सिंह भी एक विकल्प हो सकते थे

अगर इस टेस्ट में पार्थिव का बल्ला चल भी जाए और वे शतक भी बना लें तो भी भारतीय टीम प्रबंधन के फ़ैसले पर सवाल उठेंगे और उसे उठना भी चाहिए.

इसकी कई वजहें हैं. पहली तो यह कि आकाश चोपड़ा के टीम में आने के बाद सहवाग के साथ उनकी जोड़ी धीरे-धीरे जमने लगी थी.

भले ही आकाश चोपड़ा ने अभी तक कोई बड़ी पारी न खेली हो लेकिन उन्होंने कई मैचों में भारत के बड़े स्कोर का आधार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

आकाश चोपड़ा मूल रूप से सलामी बल्लेबाज़ हैं और घरेलू मैचों में भी उन्होंने अपनी भूमिका साबित की है और भारतीय टीम का रास्ता भी उनके लिए खुला है.

अब पार्थिव पटेल पर ज़रा नज़र डालें. उन्होंने घरेलू मैचों में सिर्फ़ चार बार पारी की शुरुआत की है.

ऐसे में उनसे पारी की शुरुआत कराने का फ़ैसला टीम के भविष्य के लिए सही साबित नहीं होता.

उनकी जगह अगर युवराज से पारी की शुरुआत कराई जाती तो फिर भी एक मायने होता.

क्योंकि युवराज के रूप में भारतीय टीम प्रबंधन सलामी जोड़ी का एक स्थायी हल ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा होता.

गांगुली

और तो और भारतीय कप्तान सौरभ गांगुली ख़ुद सलामी बल्लेबाज़ के रूप में आकर एक उदाहरण क़ायम कर सकते थे.

गांगुली ख़ुद पारी शुरू करके उदाहरण रख सकते थे

लेकिन आकाश चोपड़ा की जगह पार्थिव पटेल. यह बात हजम नहीं होती.

पार्थिव पटेल के सलामी बल्लेबाज़ के रूप में आने के कारण ही वीरेंदर सहवाग को पारी की पहली गेंद का सामना करना पड़ा जो अन्य स्थिति में आकाश चोपड़ा करते थे.

लेकिन चूँकि पार्थिव पटेल नए थे ये भूमिका सहवाग ने निभाई और पहली गेंद पर आउट हो गए.

पार्थिव पटेल के सलामी बल्लेबाज़ के रूप में आने का फ़ायदा विपक्षी टीम को भी मिलेगा जिसके बाद उन्हें कभी भी चलता करने का मनोवैज्ञानिक लाभ बना रहेगा.

समस्या

ख़ैर इसमें दोष पार्थिव पटेल का नहीं है और न उन्हें दोष दिया जा सकता है. क्योंकि टीम प्रबंधन ने उनसे ऐसा करने को कहा और वे कर रहे हैं.

कम उम्र में बड़ा दबाव......

समस्या सिर्फ़ इस बात की है कि एक अच्छी टीम के रूप में ढ़ल रही भारतीय टीम ने यह समस्या ख़ुद अपने गले लगा ली है.

अब नए सिरे से इन सब फ़ैसलों पर बहस होगी, विचार होगा, ज़ोर-आज़माइश होगी और इन सबसे टीम का भला तो नहीं ही होगा.

अगर पार्थिव पटेल इस मैच में चल गए तो भारतीय टीम प्रबंधन के सामने एक और मुश्किल होगी उन्हें आगे भी इस रूप में बनाए रखने की.

और पार्थिव पटेल मूल रूप से सलामी बल्लेबाज़ नहीं हैं और न हीं उन्हें भारी दबाव में पारी की शुरुआत करने का अनुभव है.

ऐसे में एक अच्छे-ख़ासे सलामी बल्लेबाज़ के रूप में जम रहा बल्लेबाज़ या तो ड्रेसिंग रूप में बैठा रहेगा या फिर एक दिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से ग़ायब ही हो जाएगा.

 
 
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