रवि दहिया ने रजत पदक पक्का किया, टोक्यो ओलंपिक में कुश्ती के फ़ाइनल में पहुंचे
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रवि दहिया टोक्यो ओलंपिक में 57 किलोग्राम फ़्री स्टाइल कुश्ती के फ़ाइनल में पहुंच गए हैं. वहीं 86 किलोवर्ग फ़्री स्टाइल कुश्ती के सेमीफ़ाइनल में पहलवान दीपक पुनिया को अमेरिकी खिलाड़ी डेविड टेलर के हाथों 10-0 से हार का सामना करना पड़ा.
रवि दहिया ने सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में कज़ाखस्तान के नुरिस्लाम सनायेव को हराकर भारत के लिए रजत पदक पक्का किया.
पहले ब्रेक के समय तक रवि दहिया ने 2-1 की लीड हासिल की हुई थी फिर वो पिछड़ गए. एक वक्त रवि को दो अंक थे और नुरिस्लाम के नौ. लेकिन रविकुमार ने चुनौती स्वीकारी. जब वे 2-10 से पिछड़ रहे थे तो उन्होंने वापसी की और मुक़ाबले को पहले 5-9 तक लेकर आए और फिर पासा ही पलट दिया.
उन्होंने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए अपने विरोधी को चित करके फ़ाइनल में अपनी जगह पक्की की.
इसके साथ ही रवि दहिया कुश्ती में ओलंपिक पदक हासिल करने वाले भारत के पांचवे पहलवान होंगे. उनसे पहले सुशील कुमार ने बीजिंग ओलंपिक 2008 में कांस्य और लंदन ओलंपिक 2012 में रजत पदक हासिल किया था. लंदन ओलंपिक में ही योगेश्वर दत्त ने भी कांस्य पदक जीता था. वहीं 2016 के रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक ने कांस्य पदक हासिल किया था.
व्यक्तिगत तौर पर ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले खिलाड़ी थे केडी जाधव. 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में जाधव ने फ़्री स्टाइल कुश्ती में कांस्य पदक हासिल किया था.
टोक्यो में रवि दहिया की इस जीत के साथ ही भारत के खाते में अब चार मेडल हो गए हैं.
रवि से पहले मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में रजत, पीवी सिंधु ने बैडमिंटन और लवलीना बोरगोहेन ने बॉक्सिंग में कांस्य पदक जीता है.
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रवि का ओलंपिक तक का सफ़र
हरियाणा के सोनीपत ज़िले के नाहरी गांव में जन्मे रवि दहिया आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, उसके लिए वे बीते 13 सालों से दिन रात जुटे हुए थे.
रवि जिस गांव के हैं, उसकी आबादी कम से कम 15 हज़ार होगी लेकिन ये गांव इस मायने में ख़ास है कि यहां से अब तक तीन ओलंपियन निकले हैं.
महावीर सिंह ने 1980 के मास्को और 1984 के लास एजेंलिस ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था जबकि अमित दहिया लंदन, 2012 के ओलंपिक खेल में हिस्सा ले चुके थे.
इस विरासत को रवि दहिया ने नई ऊंचाईयों पर पहुंचा दिया है. महज 10 साल की उम्र से उन्होंने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में सतपाल के मार्गदर्शन में कुश्ती के गुर सीखना शुरू कर दिया था.
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कड़ी मेहनत का नतीजा
उनके इस सफ़र में किसान पिता राकेश दहिया का भी योगदान रहा है जो इस लंबे समय में अपने बेटे को चैंपियन पहलवान बनाने के लिए हमेशा दूध, मेवा पहुंचाते रहे.
रवि के पिता के संघर्ष का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि वे चार बजे सुबह उठकर पांच किलोमीटर चलकर नजदीकी रेलवे स्टेशन पहुंचते थे और वहां से आज़ादपुर रेलवे स्टेशन उतरकर दो किलोमीटर दूर छत्रसाल स्टेडियम पहुंचते थे. यह सिलसिला बीते दस सालों तक बदस्तुर जारी रहा.
पदकों की दौड़
रवि दहिया ने सबसे पहले तब लोगों का ध्यान आकर्षित किया जब 2015 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में वे सिल्वर मेडल जीतने में कामयाब रहे.
इसके बाद 2018 में अंडर 23 वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी उन्होंने सिल्वर मेडल हासिल किया. 2019 में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में वे पांचवें स्थान पर रहे थे लेकिन 2020 की एशियाई कुश्ती चैंपियशिप में वे गोल्ड मेडल जीतने में कामयाब रहे.
अपनी इस कामयाबी को उन्होंने 2021 में भी बरक़रार रखा जब एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप का गोल्ड मेडल जीत लिया था.
2019 में नूर सुल्तान, कज़ाखस्तान में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने के बाद ओलंपिक कोटा हासिल किया था, तब से ही उन्हें पदक के दावेदारों में गिना जाता रहा. वे सरकारी योजना टॉरगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम का भी हिस्सा रहे.
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