2007: जलवायु परिवर्तन का वर्ष
जलवायु परिवर्तन का वर्ष
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
जलवायु परिवर्तन पर रहा ज़ोर

2007: जलवायु परिवर्तन का वर्ष

 

जलवायु परिवर्तन पर बहस का वर्ष

वर्ष 2007 को एक बार पलट कर देखें तो हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक शब्दांश जो सबसे मुखर रूप से सुनाई दिया वो था जलवायु परिवर्तन या धरती का बढ़ता तापमान. एक मसला जो वैज्ञानिकों और राजनेताओं की बहस के दायरे से निकलकर आम लोगों के बीच पहुँच गया.

हमारे आस पास के वातावरण में चिड़ियों का चहचहाना कब कम हो गया, देखते देखते कैसे पेड़ कटकर हमारे घरों के दरवाज़ों और खिड़कियों में तब्दील हो गए, कभी रात में साफ़ दिखने वाले तारों और हमारे बीच कैसे एक झीना सा धुंध का पर्दा आ गया, कैसे नदियों में आम तौर पर पानी कम हो गया या नदियों का रंग ही बदल गया और कैसे कभी पड़ोसी की अलग सी दिखने वाली गाड़ी हमारी और हम जैसे बहुत से लोगों की गाड़ियों की भीड़ में गुम हो गई.

भौतिकता की इस दौड़ में ये सब सवाल पूछने या इनके जवाब के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिला. मगर इन्सान की इसी लापरवाही ने मौसम में बदलाव को कुछ ऐसी जगह ला खड़ा किया कि इस साल लगभग हर प्रमुख बैठक, सम्मेलन और वार्ताओं में ये मुद्दा साल भर गूँजता रहा. ये स्पष्ट हो गया कि प्रगति की ये छलांग कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गई है और मिथकों में जिस प्रलय की चर्चा मिलती है उसकी भयावह तस्वीर वैज्ञानिकों की परिकल्पना में उभरने लगी.

प्रस्तुति: मुकेश शर्मा
 
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