BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
शुक्रवार, 10 अप्रैल, 2009 को 11:25 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें   कहानी छापें
पर्यावरण के लिए बेहतरीन जैविक खेती
 

 
 
जैविक खेती

पिछले एक साल से जैविक खेती कर रहे मेरठ के किसान रामचंद्र आजकल बेहद खुश हैं. वजह यह है कि जैविक खेती उनके अपने और अपने परिवार के लिए तो बेहतर है ही, बल्कि इसके माध्यम से वह पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा काम कर रहे हैं.

उनकी खुशी की एक वजह यह भी है कि अब जैविक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग से उनकी खेती की लागत करीब 80 फ़ीसदी कम हो गई है और उत्पादन पहले से काफ़ी बढ़ गया है.

अब उनकी एकमात्र टीस यही है कि उनका जैविक उत्पादन भी रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग करने वाले बाकी किसानों के उत्पादन के साथ ही बिक रहा है और उन्हें इसका मूल्य भी दूसरे उत्पादनों के बराबर ही मिल रहा है.

लेकिन उन्हें उम्मीद है कि जल्दी ही उनके उत्पादन को जैविक उत्पादनों के तौर पर भारतीय और विदेशी बाज़ारों में बेचा जाएगा जिससे उन्हें अब से काफ़ी ज़्यादा मुनाफ़ा भी मिलेगा.

आज भारत में 5.38 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती हो रही है. उम्मीद है कि साल 2012 तक जैविक खेती का फसल क्षेत्र 20 लाख हैक्टेयर को पार कर जाएगा.

वर्ष 2003 में देश में सिर्फ 73 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती हो रही थी, जो 2007 में बढ़कर 2.27 लाख हैक्टेयर तक पहुंच गई.

इस तरह जैविक उत्पाद का बाजार अगले पांच साल में 6.7 गुना बढ़ने की उम्मीद है. तब दुनिया के कुल जैविक उत्पाद में भारत की भागीदारी करीब 2.5 फीसदी की हो जाएगी.

हरित क्रांति

वर्ष 2003 में भारत 73 करोड़ रुपयों के जैविक उत्पादों का निर्यात कर रहा था, जो साल 2007 में बढ़कर तीन अरब पर पहुंच गया. अगले पाँच सालों में जैविक उत्पादों का निर्यात 25 अरब रुपये तक पहुंच सकता है जबकि जैविक का घरेलू बाज़ार करीब 15 अरब करोड़ तक पहुँचने की उम्मीद है.

 हमारे यहाँ जो रसायनों पर आधारित खेती हो रही थी उससे धीऱे धीरे उत्पादकता कम हो रही थी, उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था. इस वजह से हमारे नीति निर्धारकों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के बारे में सोचा
 
डॉ आरके पाठक

साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के बाद देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया था. हरित क्रांति के माध्यम से किसानों को उन्नत तकनीक, बीज और रासायनिक खाद उपलब्ध कराई गई. फिर देखते ही देखते हरित क्रांति ने खाद्य उत्पादन के मामले में भारत को अग्रणी देश बना दिया.

लेकिन देश को इस हरित क्रांति की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी. हरित क्रांति के नाम पर खेती में कीटनाशकों और खाद के रूप में रसायनों का जमकर प्रयोग किया गया.

इन रसायनों ने हमारे किसानों का उत्पादन तो बढ़ाया ही लेकिन साथ ही हमारी प्राकृतिक संपदा का भरपूर दोहन भी किया.

इससे मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीव और सूक्ष्म पादप कम होते गए. परिणामस्वरूप जमीन बंजर बनती चली गई और उत्पादन निम्न गुणवत्ता वाला और कम होने लगा.

वैसे भी कीटनाशक हवा के साथ-साथ मीलों तक अपना दुष्प्रभाव छोड़ते हैं इसलिए इनका असर क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर भी साफ़ नज़र आने लगा.

जैविक कृषि परियोजना

मिट्टी, पानी, पौधों, पालतू जानवरों और मानव शरीर में मौजूद रसायन न सिर्फ़ बीमारियों की वजह होते हैं बल्कि ज़मीन और पानी में प्रदूषण बढ़ाकर पर्यावरण की गर्मी को भी बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं.

आलू की खेती
मिट्टी, पौधों और पानी में मौजूद रसायन न सिर्फ़ बीमारी बढ़ाते हैं बल्कि प्रदूषण के कारक बन पर्यावरण की गर्मी को भी बढ़ाते हैं.

इसके बाद लोगों और सरकार का ध्यान फिर भारत की पुरानी परंपरा यानी जैविक खेती की ओर गया.

किसानों की सहकारी संस्था नैफ़ेड ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत जैविक कृषि परियोजना पर काम शुरू किया. इसके माध्यम से किसानों और उनके खेतों को अपनाकर उन्हें जैविक के रूप में परिवर्तित कराया जाता है. फिर इन खेतों का जैविक के रूप में प्रमाणीकरण कराया जाता है.

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के मुख्य सलाहकार डॉ आरके पाठक कहते हैं, "हमारे यहाँ जो रसायनों पर आधारित खेती हो रही थी उससे धीऱे धीरे उत्पादकता कम हो रही थी, उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था. इस वजह से हमारे नीति निर्धारकों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के बारे में सोचा."

उन्होंने कहा, "जैविक खेती को जब शुरू किया गया तो लोगों को लगा कि क्या वाकई इससे उत्पादकता बढ़ेगी और खरपतवार ख़त्म हो जाएंगे? लेकिन हमने यह कर दिखाया. अब जो किसान जैविक खेती कर रहे हैं उनका उत्पादन रासायनिक फर्टिलाइज़रों का प्रयोग करने वाले किसानों से हर मायने में बेहतर है."

इस परियोजना के पीछे नैफ़ेड का मुख्य उद्देश्य ग़ैर रासायनिक खादों के माध्यम से भूमि को उपजाऊ बनाए रखना और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाना है.

जैविक खेती में फसलों और मिट्टी को फायदा पहुंचाने वाले कृमियों और सूक्ष्म जीवों का संरक्षण होता है. इससे जमीन की उर्वरा शक्ति भी बनी रहती है.

पर्यावरण संरक्षण

जैविक खेती रसायनों से होने वाले दुष्प्रभावों से पर्यावरण का बचाव करती है और इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि इसके माध्यम से जैव पर्यावरण का संरक्षण होता है.

किसान
किसानों को उत्पादन की जैविक विधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है.

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए नैफ़ेड ने पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत आईटीएस लिमिटेड का सहयोग लिया. यह संगठन किसानों के समूहों को फसल उत्पादन के लिए पहले पंजीकृत करता है फिर उन्हें उत्पादन की जैविक विधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है.

मेरठ के उद्यान उपनिदेशक अर्जुन प्रसाद तिवारी कहते हैं, "फ़र्टिलाइ़ज़र और कीटनाशकों के प्रयोग न होने से जैविक खेती करने वाले किसान बहुत खुश हैं क्योंकि उनकी लागत काफ़ी कम हो गई है और उनके उत्पादन की गुणवत्ता बहुत बढ़ गई है."

किसानों के खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर भूमि स्वास्थ्य की जाँच करवाई जाती है. इन नमूनों से मिट्टी के लिए लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं को अलग करके द्विगुणन के लिए जैविक कल्चर तैयार किया जाता है. यह जैविक कल्चर किसानों को मुफ़्त वितरित किया जाता है.

किसान इस कल्चर को गोबर की सड़ी खाद के साथ मिलाकर खेत में इस्तेमाल करते हैं जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है परिणामस्वरूप फसल उत्पादन भी बढ़ता है.

मेरठ के ज़िला उद्यान अधिकारी वाईएन पाठक का कहना है, "जैविक खेती करने वाले किसान कुछ ज़्यादा सक्रिय हैं और जैविक खेती के प्रति उनमें इतना विश्वास है कि वे किसी भी रूप में रसायनों का प्रयोग अपने खेतों में नहीं करते हैं."

समूह प्रमाणीकरण

विशेषज्ञों का कहना है कि गाय और पालतू पशुओं के बिना जैविक खेती की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. गाय का गोबर और गोमूत्र मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए ज़रूरी नाइट्रोजन और कार्बन उपलब्ध कराते हैं. इसलिए जैविक के इस मिशन में शामिल होने के लिए किसानों के पास गाय समेत पालतू पशु होने आवश्यक हैं.

किसान समयसिंह के साथ डॉ आरके पाठक
समय से पहले उत्पादन की वजह से किसानों को सिंचाई के लिए पानी की ज़रूरत काफ़ी कम हो गई

तीन साल तक सफलता के साथ जैविक खेती करने के बाद किसानों और उनके खेतों का जैविक के रूप में किसी देशी या विदेशी सत्यापन एजेंसी से समूह प्रमाणीकरण कराया जाता है.

जैविक प्रमाणित वस्तुओं का बाजार मूल्य सामान्य वस्तुओं की तुलना में काफी अधिक होता है, लेकिन इसका लाभ अभी आमतौर पर किसान को नहीं मिलता.

वाईएन पाठक ने कहा, "अब किसानों को सिर्फ़ एक बात का मलाल है और वह यह कि बेहतर गुणवत्ता वाला उनका उत्पादन भी उसी भाव में बिकता है जिस भाव में रासायनिक खाद का प्रयोग करने वाले किसानों का. हम इस बारे में कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह इन किसानों की मेहनत का फल इन्हें मिले."

अब आईटीएस रिलायंस फ़्रेश, मदर डेयरी, सुभीक्षा और स्पेंसर्स आदि रिटेल आउटलेट के साथ मिलकर भारत में किसानों के जैविक उत्पादों का एक अलग बाज़ार बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है.

इसके अलावा हरियाणा राज्य सहकारी आपूर्ति एवं विपणन प्रसंघ "हैफ़ेड" ने राज्य में किसानों के जैविक कृषि उत्पादों के विपणन को बढ़ावा देने के लिए आईटीएस और स्वयंसेवी समिति किसान वैलफ़ेयर क्लब के साथ मिलकर कृषि-व्यापार सहायता संघ बनाने के लिए एक समझौता किया है. यह संघ छोटे किसानों को तकनीक और बाज़ार के साथ सीधे जोड़ने के लिए काम करेगा.

फ़ायदा

जैविक खेती का पहला फ़ायदा यह हुआ कि किसान की खेती में लागत पहले के मुक़ाबले 80 फ़ीसदी कम हो गई. जैविक खेती पर्यावरण के लिए भी बेहतरीन है और इससे जल और वायु प्रदूषण से बचाव होता है.

जैविक खाद की वजह से खेत की मिट्टी की गुणवत्ता में बहुत सुधार आया और उत्पादन पहले से ज़्यादा स्वादिष्ट और स्वास्थ्य के लिए बेहतर साबित हुआ.

इसके अलावा समय से पहले उत्पादन की वजह से किसानों को सिंचाई के लिए पानी की ज़रूरत काफ़ी कम हो गई. ड़ी संख्या में खेतों के जैविक होने का फायदा देश को भी मिल रहा है क्योंकि देश को 40 हजार करोड़ रुपये इन उर्वरकों की सब्सिडी पर खर्च करने पड़ते हैं.

 
 
सूचना क्रांति की ओर..
हरित क्रांति के बाद एमएस स्वामीनाथन चले सूचना क्रांति की ओर..
 
 
आएगा वाटरप्रूफ़ धान
वैज्ञानिकों ने धान के पौधे को बाढ़ के पानी से बचाने का उपाय निकाला.
 
 
मानवीय गतिविधियों का प्रभाव! मानव और विकास...
एक रिपोर्ट कहती है कि मानव गतिविधियों का बुरा असर हो रहा है.
 
 
सुनहरा चावल विटामिन ए वाला चावल
सुनहरा चावल दूसरी क़िस्मों की तुलना में बीस गुना विटामिन ए पैदा करता है.
 
 
सबसे पुराना चावल सबसे पुराने चावल
दुनिया के सबसे पुराने चावलों का पता चला है जो कोई 15,000 साल पुराने हैं.
 
 
इससे जुड़ी ख़बरें
दुनिया का 'सबसे पुराना' चावल
22 अक्तूबर, 2003 | विज्ञान
जीन सुधार से बेहतर धान
26 नवंबर, 2002 | पहला पन्ना
बूँद-बूँद से घट भरे
17 अगस्त, 2002 | पहला पन्ना
'किसानों के लिए जानलेवा कीटनाशक'
31 जुलाई, 2002 | पहला पन्ना
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें   कहानी छापें
 
  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>