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शुक्रवार, 26 दिसंबर, 2008 को 22:09 GMT तक के समाचार
 
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'युद्ध पाकिस्तान से नहीं, ग़रीबी से हो'
 

 
 
सावित्री गुप्ता
सावित्री गुप्ता कहती हैं कि रेलवे स्टेशन पर ग़रीब मरे इसलिए उसपर ध्यान कम और ताज पर ज़्यादा दिया गया
मुंबई की एक झुग्गी में रहने वाली सावित्री गुप्ता ने 26 नवंबर के चरमपंथी हमले में अपना पति खोया है लेकिन वो पाकिस्तान के साथ युद्ध के सख्त ख़िलाफ़ हैं.

बिहार के एक छोटे से गांव से मुंबई आकर अपने पति के साथ रह रही सावित्री अब बिल्कुल अकेली हो गई हैं लेकिन वो पाकिस्तान से नाराज़ नहीं है बल्कि देश की सुरक्षा व्यवस्था से ख़फ़ा हैं.

वो कहती हैं, ‘‘युद्ध से कोई समाधान नहीं निकल सकता. मेरा जो जाने वाला था वो तो चला गया. किस्मत में यही लिखा था शायद. पाकिस्तान से लड़ के क्या होगा. असली समस्या बेरोज़गारी है. जिसने मेरे पति को मारा अगर उसके पास अच्छा रोज़गार होता तो शायद वो आतंकवादी नहीं बनता. डेढ़ लाख रूपए के लिए डेढ़ सौ लोगों को नहीं मारता. पाकिस्तान को चाहिए कि अपने युवाओं को रोज़गार दे ताकि आतंकवाद रुके.’’

सावित्री जैसी कम पढ़ी लिखी महिला के मुंह से ये बातें बड़ी लग सकती हैं लेकिन शायद ये वो सच्चाई है जिसे वो बखूबी समझती है.

उनके पति विनोद गुप्ता एक गैराज में काम कर के रोज़ी रोटी चलाते थे. किराए की झुग्गी में रहने वाली सावित्री के लिए सबसे बड़ी समस्या रोज़गार की है. लड़ाई से उसे क्योंकर मतलब होगा.

लड़ाई नहीं, सुरक्षा चाहिए

वो कहती हैं, ‘‘हमारी सरकार को सुरक्षा कड़ी रखनी चाहिए थी पहले से ही. वो तो हमने नहीं किया. अब किसी को भी दोष देकर क्या होगा. युद्ध होगा तो हमें क्या मिलेगा आप ही बताइए. मैं चाहती हूँ कि मुझे रोज़गार मिले, घर मिले. हम ग़रीब लोग हैं हमारे ऊपर कोई ध्यान नहीं देता है.’’

सावित्री गुप्ता
 युद्ध से कोई समाधान नहीं निकल सकता. मेरा जो जाने वाला था वो तो चला गया. किस्मत में यही लिखा था शायद. पाकिस्तान से लड़ के क्या होगा. असली समस्या बेरोज़गारी है. जिसने मेरे पति को मारा अगर उसके पास अच्छा रोज़गार होता तो शायद वो आतंकवादी नहीं बनता. डेढ़ लाख रूपए के लिए डेढ़ सौ लोगों को नहीं मारता. पाकिस्तान को चाहिए कि अपने युवाओं को रोज़गार दे ताकि आतंकवाद रुके
 

सावित्री को राज्य सरकार की ओर से पैसे मिले हैं लेकिन अभी रेलवे की ओर से दिया जाने वाला मुआवज़ा सरकारी कागज़ातों में उलझा हुआ है. वो चाहती हैं कि उन्हें नौकरी मिले ताकि वो अपनी दोनों बच्चियों को पढ़ा लिखा सकें.

वो कहती हैं, ‘‘मेरे तो बेटा नहीं है जिस पर मैं आश्रित रह सकूँ. एक पति था, जो चला गया. अब दो बच्चियां हैं. इन्हें तो पालना पड़ेगा. मेरे पास अपना घर भी नहीं है. सरकार मुझे सुविधा दे ताकि मैं अच्छे से रह सकूँ.’’

सावित्री को लगता है कि चूंकि वो ग़रीब है इसलिए उसकी आवाज़ ऊपर तक नहीं पहुंच पाएगी. वो कहती है, ‘‘वीटी पर सब ग़रीब मरे थे इसलिए मीडिया ने भी हम पर ध्यान नहीं दिया है. सब ताज और ओबेराय होटल के लोगों की बात कर रहे हैं. उनके पास पैसे हैं लेकिन हमारे पास तो कुछ भी नहीं है. हमारी मदद सरकार ने नहीं की तो क्या होगा हमारा.’’

सावित्री के पति मारे जा चुके हैं और सास जेजे अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रही है. वीटी पर उनकी सास को दो गोलियां लगी थीं और वो अब भी अस्पताल में ही हैं.

महीने भर पहले की घटना याद करके सावित्री अब भी रो पड़ती है और बताती है कि किस तरह एक अनजान व्यक्ति ने उन्हें अपने पति की मौत की ख़बर दी थी.

सावित्री अब संभल चुकी है लेकिन शायद वो वैसा जीवन कभी न बिता पाए जैसा वो अपने पति के साथ बिता रही थी.

 
 
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