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गुरुवार, 25 दिसंबर, 2008 को 06:39 GMT तक के समाचार
 
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चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले..
 

 
 
कश्मीर में सुरक्षा इंतेजाम
कश्मीर में विधानसभा चुनावों के दौरान अघोषित कर्फ़्यू जैसा माहौल रहता था

निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्मों-जाँ बचा के चले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ये पंक्तियाँ श्रीनगर में मतदान के दो दिन पहले से याद आती रहीं और मतदान के दिन मानों एकदम साकार हो गईं.

श्रीनगर शहर में और कुछ बाहरी इलाक़ों में भी कोई हिस्सा ऐसा नहीं था जहाँ चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात न हों और संगीनों का साया न हो.

सड़क पर किसी वाहन को बिना सुरक्षा जाँच के गुज़रने नहीं दिया जा रहा था और पहचान पत्र दिखाना ज़रुरी था.

मीडियाकर्मियों की भी जाँच

मीडियाकर्मियों के लिए प्रेस का परिचय पत्र भी काम नहीं आ रहा था और चुनाव आयोग का अनुमति-पत्र माँगा जा रहा था.

जो लोग अपने मोहल्ले में थे वो अपने घरों के सामने तक ही सीमित थे और जो फ़र्लांग भर दूर भी जा रहे थे सो डरे-सहमे से दुबककर.

शहर के भीतर आलम यह था कि चुनाव में भाग लेने वाले कम दिख रहे थे, बहिष्कार के समर्थन में नारे लगाने वाले अधिक. कहना कठिन था कि कब उनकी ओर से पथराव शुरु हो जाए, और कब सुरक्षाबलों का दस्ता आकर उन पर लाठियाँ और अश्रुगैस बरसाने लगे.

एक जगह हमने फ़ोटो लेने के लिए कैमरा निकाला तो जम्मू-कश्मीर के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप के जवानों ने हम पर बंदूकें तान दीं.

भागीदारी पर सवाल

कश्मीर में सुरक्षा इंतेजाम
चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे

कहने को तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा था और विधानसभा के चुनाव हो रहे थे. लेकिन कम से कम श्रीनगर में जिन हालात में ये चुनाव हुए हैं उसमें लोक की भागीदारी पर कई सवाल खड़े किए गए.

लोगों ने बताया कि पहले छह चरणों के चुनाव के दिनों में भी यहाँ कर्फ़्यू जैसा माहौल रहा है और लोगों को दो-दो दिन अपना कामकाज बंद करके घरों के भीतर रहना पड़ा है.

सातवें और अंतिम चरण के चुनाव चूंकि श्रीनगर में ही होने थे इसलिए इस समय यहाँ सख़्ती और ज़्यादा थी.

कैसी डेमोक्रेसी है?

एक मतदाता पूछ रहा था कि 'यह कौन सी डेमोक्रेसी है' जिसमें लोगों को जामा मस्जिद में पिछले आठ जुम्मे को नमाज़ नहीं पढ़ने दी गई?

अलगाववादी नेता या तो जेलों में हैं या फिर अपने घरों में नज़रबंद ताकि उनके समर्थकों को नियंत्रण में रखा जा सके.

जिस तरह से जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों के लिए छह चरणों का मतदान हुआ है और सातवाँ चरण भी जिस तरह से बिना किसी बड़ी हिंसक घटना के गुज़र गया है उसके चलते यक़ीनन चुनाव आयोग और भारत सरकार के पास अपनी पीठ थपथपाने के लिए बहुत कारण होंगे.

लेकिन जब-जब श्रीनगर की इन आठ विधानसभा क्षेत्रों के लोग इस चुनाव प्रक्रिया पर सवाल पूछेंगे तो इसका संतोषजनक जवाब न राजनीतिक दलों के पास होगा और न प्रशासन के पास.

चुनाव आमतौर पर शेष भारत (छत्तीसगढ़, झारखंड और आंध्रप्रदेश के नक्सली इलाक़ों को छोड़कर) में उत्सव जैसा माहौल बनाता है लेकिन अगर कहें कि श्रीनगर में इन चुनावों को लोगों ने एक प्रताड़ना की तरह देखा है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

यह भी देखना दिलचस्प रहा कि लोक को तंत्र किस तरह चला सकता है और यह भी कि लोगों ने किस तरह से लोकतंत्र की एक बड़ी प्रक्रिया को नाली, सड़क, पानी और बिजली से जोड़कर उसके क़द एकदम घटा दिया है.

 
 
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