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शनिवार, 25 अगस्त, 2007 को 09:55 GMT तक के समाचार
 
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यौन शिक्षा का विरोध करने वालों के तर्क
 

 
 
भारतीय स्कूल
कई राज्यों ने यौन शिक्षा पाठ्यक्रम को लागू करने से मना कर दिया है
भारतीय स्कूलों के पाठ्यक्रमों में यौन शिक्षा को शामिल करने के केंद्र सरकार के हाल के प्रयासों से समाज के विभिन्न तबकों में ज़ोरदार बहस छिड़ गई है. कुछ राज्य सरकारें और संगठन इसका ज़ोरदार विरोध कर रहे हैं. एक नज़र डालते हैं कि इसका विरोध करने वालों के क्या तर्क हैं:

केंद्र सरकार ने एचआईवी एड्स के प्रति जागरुकता के लिए प्राथमिकता के तौर पर स्कूलों में यौन शिक्षा लागू करने के फ़ैसले का समाज के अनेक वर्गों ने विरोध किया है.

धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ विभिन्न महिला संगठनों और राजनीतिक दलों का कहना है कि कक्षाओं में यौन शिक्षा पर खुली बहस कराना एक तरह से बच्चों को जागरुक करने के बजाय 'अनैतिक सेक्स' की तरफ़ मोड़ने वाला फ़ैसला साबित हो सकता है.

भारत के एक-तिहाई राज्यों ने केंद्र सरकार के इस कार्यक्रम को स्कूलों में लागू करने से मना कर दिया है.

उत्तर प्रदेश में सेकेंडरी स्कूल शिक्षक संघ ने कहा है कि सरकार यदि इस फ़ैसले को वापस नहीं लेती तो वह 'क़िताबों की होली' जलाएँगे.

कुछ शिक्षकों तथा छात्र संगठनों ने इस संबंधी सामग्री को क़िताबों में रखने पर भी गहरी आपत्ति जताई है.

पाठ्यक्रम पर विवाद

सबसे ज़्यादा विवाद यौन शिक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक चार्ट को लेकर है जिसे संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनीसेफ़ तथा राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) ने तैयार किया है.

चार्ट में एचआईवी एड्स के प्रसार के विभिन्न कारणों तथा रोकथाम के तरीकों को चित्रित किया गया है.

आरोप लगे हैं कि चार्ट में 'अश्लील' चित्रण किया गया है. हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने इसके लिए पश्चिमी मानसिकता को दोषी ठहराया है.

 यौन शिक्षा का पाठ्यक्रम पश्चिमी देशों के समाज को ध्यान में रखकर बनाया गया है जो भारत जैसे परिवार प्रधान समाज से कतई मेल नहीं खाता. इसके अलावा यह तर्क भी पूरी तरह ग़लत है कि भारत में एड्स के मामले बहुतायत में है
 
राममाधव, आरएसएस नेता

आरएसएस के सदस्य राममाधव ने बीबीसी से कहा, "हम पूरे देश में लगभग 26 हज़ार स्कूल चलाते हैं, हमारे शिक्षकों ने इस यौन शिक्षा के पाठ्यक्रम को देखने के बाद इसे बेहद अश्लील और आपत्तिजनक पाया है."

प्रवक्ता ने कहा, "यौन शिक्षा का पाठ्यक्रम पश्चिमी देशों की जीवनशैली के आधार पर बनाया गया है जो भारत जैसे परिवार प्रधान समाज से कतई मेल नहीं खाता. इसके अलावा यह तर्क भी पूरी तरह गलत है कि भारत में एड्स के मामले बहुतायत में हैं."

प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा, "सरकार का यौन शिक्षा पाठ्यक्रम भारतीय मूल्यों के उलट है. हमारे नैतिक मूल्य ख़ुद पर नियंत्रण सिखाते हैं और सिखाया जाता है कि विवाह के पहले यौन संबंध न बनाएँ."

वो कहते हैं, "पाठ्यक्रम हमारे अपने समाज की ज़रूरतों के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए. क्या आप अध्यापकों से उम्मीद करते हैं कि वह छात्र-छात्राओं को ब्लैकबोर्ड पर यह सिखाएँगे कि कंडोम कैसे पहना जाए?"

 विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां सरकार पर लगातार इस पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए दबाव बना रही हैं ताकि वह अपने उत्पादों तथा कंडोम आदि को भारतीय बाज़ारों में खपा कर मुनाफ़ा कमा सकें
 
मुरली मनोहर जोशी, भाजपा नेता

पूर्व केंद्रीयमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि इस पाठ्यक्रम से हमारा सामाजिक ढांचा खतरे में पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि इसे केवल जीव-विज्ञान की कक्षाओं तक सीमित रखा जाना चाहिए वरना बच्चों के अविकसित दिमाग़ पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.

उन्होंने आरोप लगाया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां सरकार पर लगातार इस सेक्सशिक्षा पाठ्यक्रम को लागू करने पर दबाव बना रही है ताकि वह अपने उत्पादों तथा कंडोम आदि को भारतीय बाज़ारों में खपा कर मुनाफ़ा कमा सकें.

राजनीति बनाम सामाजिक मुद्दा

भाजपा का कहना है कि यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है और यही वजह है कि कई ग़ैरभाजपा शासित राज्यों ने भी सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध किया है.

इसके अलावा उड़ीसा में वाम दलों के छात्र संगठनों ने राज्य सरकार पर इसे लागू न करने का दबाव बनाया है. वे चाहते हैं कि सरकार स्थानीय माहौल को ध्यान में रखते हुए आवश्यक सुधार कर इसे स्कूलों में लागू करे.

 दस साल की उम्र के बच्चों को सेक्स शिक्षा देने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि हर बात का एक समय होता है और फिर बच्चों में इसके प्रयोग की भावना प्रबल होगी
 
साधना, 13 वर्षीय छात्रा की माँ

कर्नाटक के एक महिला संगठन ने इसे लागू करने के पीछे सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि इससे बच्चों में सेक्स के प्रति जागरुकता के बजाय भ्रम फैलेगा.

तेरह वर्षीय स्कूली छात्रा की माँ साधना अय्यर का कहना है कि दस साल की उम्र के बच्चों को सेक्स शिक्षा देने का कोई अर्थ नहीं है क्यों कि हर बात का एक समय होता है और फिर बच्चों में इसके प्रयोग की भावना प्रबल होगी.

साधना ने कहा कि कम उम्र में यौन शिक्षा से बच्चों की मासूमियत खो जाने का डर है. अपनी पुत्री के स्कूल में पाठ्यक्रमों में इसे शामिल न किये जाने पर उन्होंने राहत की सांस ली है.

 
 
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