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गुरुवार, 22 मार्च, 2007 को 11:12 GMT तक के समाचार
 
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नेपाल में झड़पों के बाद कर्फ़्यू जारी
 
मधेशी आंदोलनकारी
मधेशी नेपाल के नए संविधान में अपने लिए और ज़्यादा अधिकारों की मांग कर रहे हैं.
दक्षिणी नेपाल में मधेशियों और माओवादियों के बीच हुई झड़पों में 27 लोगों के मारे जाने के एक दिन बाद गौर शहर में रात को लगाए गए कर्फ़्यू की अवधि बढ़ा दी गई है.

रौतहट ज़िले के इस इलाक़े में मधेशी जनाधिकार मंच के समर्थकों और स्थानीय माओवादी कार्यकर्त्ताओं के बीच हुई गोलीबारी में 40 से अधिक लोग जख़्मी भी हुए हैं जिनमें से ज़्यादातर की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है.

पिछले नवंबर में माओवादियों और बहुदलीय सरकार के बीच हुए शांति समझौते के बाद हुई हिंसा की यह सबसे बड़ी घटना है.

नेपाल के कांतिपुर टेलीविज़न से मिल रही ख़बरों के मुताबिक पड़ोस के शहर कलैया में भी तनाव की खबरों के बाद कफ़्यू लगा दिया गया है.

पुलिस के मुताबिक बुधवार को यह संघर्ष उस समय शुरु हुआ जब दोनों ही संगठनों के स्थानीय कार्यकर्त्ता शहर में एक ही जगह पर अपनी बैठक करने की कोशिश कर रहे थे.

दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे पर संघर्ष पहले शुरु करने का आरोप लगाया है.

एक वरिष्ठ माओवादी नेता कृष्ण बहादुर महार ने कहा कि मृतकों में ज़्यादातर लोग माओवादी समर्थक थे. लेकिन मधेशी नेता किशोर कुमार बिस्वास का कहना था कि हताहतों में से ज़्यादातर स्थानीय लोग हैं.

माओवादी नेता महार का कहना था कि माओवादी पिछले संघर्ष में मारे गए लोगों की याद में पूरे देश में जुलूस निकाल रहे थे.

नेपाल के गृह मंत्री ने घटना की आधिकारिक जाँच के आदेश दे दिए हैं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने इस घटना पर चिंता जताते हुए दोषियों को दंडित किए जाने की मांग की है.

इसी बीच माओवादी आंदोलन के प्रमुख प्रचंड ने पश्चिमी नेपाल के अपने दौरे में नेपालगंज में कहा कि मधेशी जनाधिकार मंच पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए और इसके नेताओं को उनके कथित आपराधिक कार्रवाइयों के लिए गिरफ़्तार किया जाना चाहिए.

ज़्यादा अधिकारों की मांग

दक्षिणी नेपाल के तराई क्षेत्रों में रहने वाले मधेशी पिछले दिसंबर महीने से ही नए संविधान में उन्हें और ज़्यादा अधिकार दिए जाने कि मांग को लेकर प्रदर्शन करते रहे हैं.

माओवादी इसका यह कहकर विरोध करते रहे हैं कि वे स्वयं क्षेत्रीय और जातीय अधिकारों के सबसे बड़े हिमायती हैं.

हाल के शांति समझौते के मुताबिक हजारों माओवादी विद्रोहियों को अपने हथियार संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में बनाए गए कैंपों में जमा करने थे.

दस वर्षों तक चले संघर्ष के बाद नेपाल में संसदीय चुनावों की तैयारियाँ चल रही हैं लेकिन जानकारों का मानना है कि कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति के मद्देनज़र इन चुनावों में देरी हो सकती है.

 
 
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