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मंगलवार, 21 नवंबर, 2006 को 15:03 GMT तक के समाचार
 
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रिश्तों में गर्माहट लाने की कोशिश
 

 
 
हू जिंताओ और मनमोहन सिंह
रिश्तों के व्यक्तिगत होने के लिए इंतजार करना पड़ेगा
यह बातचीत दोनों देशों के बीच संबंधों की बदलती हुई प्रक्रिया का एक हिस्सा है जो लगातार एक प्रयोग की तरफ़ जा रहा है.

वन-च्या-पाओ जब साल 2005 आए थे तो एक सामरिक और सहयोगी रिश्ते का रूप देने की बात की गई थी. अब उसी की और अधिक पुष्टि की गई है.

जहाँ तक व्यापार को दोगुना किए जाने का प्रश्न है तो ये स्वभाविक ही है. यदि दोनों देशों के जनमत को देखा जाए और इस पूरे क्षेत्र को देखें जो कि ये दोनों ही देश आज विश्व की दो उभरती हुई शक्तियाँ हैं. एक-आध साल में तो यह लक्ष्य भी कम लगने लगेगा जब इस व्यापार को एक नई दिशा में ले जाने की कोशिश की जाएगे.

अभी फिलहाल यह जिस तरह से चल रहा है उसी में इतनी तेज़ी से वृद्धि हो रही है कि हम हर छह माह पर ही इन आंकड़ों को पीछे छोड़ देते हैं. आगे यह और भी तेज़ी से बढेगा.

यह जो विरोधभासों की बात की जाती है वह व्यापार या आर्थिक रिश्तों में नहीं है. आर्थिक मोर्चे पर तो हम आगे बढ़ते रहे हैं लेकिन राजनीतिक रिश्ते ही अभी तक काल के साए से नहीं निकल पाए हैं. एक संदेह की जो भावना अभी तक पाई जाती रही है उसी की वजह से बार-बार आर्थिक रिश्तों में रोड़े आते रहे हैं.

मुश्किल ये है कि 1962 की घटना से जो एक अविश्वास और संदेह की विरासत मौजूद रही है उसको अब किस तरह से दूर किया जाए. अब दोनों देशों का प्रयत्न यही होना चाहिए. दोनों देशों के पास यही एक सबसे अधिक यथार्थवादी विकल्प है और यह जानते हुए कि इसमें काफी समय और धैर्य की आवश्यकता है. इस रिश्ते को आगे बढ़ाना होगा.

चीन और भारत के बीच पहली बार हो रहे परमाणु सहयोग पर बातचीत को भारत-अमरीकी परमाणु सहयोग के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है जबकि भारत और चीन के बीच किसी भी संभावित परमाणु सहयोग पर अब तक पाकिस्तान का साया रहा है. अब नज़र इस पर होगी कि चीन पाकिस्तान के साथ क्या करता है और उनके साथ वह किस तरह के समझौते करता है.

लेकिन भारत और चीन के बीच ख़ासकर इस अत्यंत ही संवदनशील मामले को लेकर यह जो बदलती हुई जो भाषा है उससे यह आशा की सकती है कि यह बदलती हुई भाषा के साथ एक दूसरे के प्रति विचार भी बदल रहे हैं.

मेरे ख़याल से यात्रा से ठीक पहले अरुणाचल प्रदेश को लेकर जो बयान आया उसमें ज्यादा कोई रणनीतिक पेंच ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है. थोड़ा सा इसमें चौंकाने वाली बात बस यह है कि राष्ट्रपति की यात्रा से ठीक एक-दो दिन पहले इतने अनुभवी राजदूत ने ये माहौल बिगाड़ने वाली बात कही. लेकिन मुझे लगता है कि दोनों ही देशों की तरफ से यह कोशिश रही कि इसका कुछ असर इस यात्रा पर न पड़े.

अब हमें कम से कम इस बात की जानकारी तो है कि ये मामला पेंचीदा है और अब ये मामला ज्यादातर लोगों के बीच है कि यह मसला काफी उलझा हुआ है. दोनों तरफ से गंभीर दावे-प्रतिदावे भी रहे हैं. लेकिन अब एक मैकेनिज्म है जिसके तहत अब बातचीत हो रही है. अब यह उम्मीद करना कि हम रातोंरात इसका कोई हल निकल आएगा उचित नहीं.

लेकिन इस बात पर तो सहमति ज़रूर ही बनी है कि विचारों का आदान-प्रदान हो. अब हमें यह तय करना है कि यह आदान-प्रदान किस तरह का होगा.

बदलाव का दौर

भारत और चीन के बीच संबंधों में परिवर्तन का ताज़ा दौर नब्बे के दशक के बीच से ही आ गया था जब चीन की दक्षिण एशिया नीति में बदलाव आना शुरु हुआ. पाकिस्तान का चीन के प्रति झुकाव में भी थोड़ी कमी आनी शुरू हुई.

अपनी पत्नी के साथ जिंताओ
दस साल बाद कोई चीनी राष्ट्रपति भारत आए हैं

वैसे चीन की विदेश नीति में जो आमूल परिवर्तन 1980 के दशक के में ही आ गया था. हाँ 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद के क्षेत्रीय समीकरणों में आए बदलाव के बाद अब दोनों के लिए ये ज़रूरी हो गया कि सामरिक मुद्दों पर भी बातचीत हो.

हाँ, बुश और मनमोहन वाली गर्मजोशी की अपेक्षा इन दोनों नेताओं के बीच भी किया जाना उचित नहीं है क्योंकि अभी तो संबंधों को महज़ सामान्य बनाने की ओर बढ़त की जा रही है.

हमें यह भी देखना चाहिए कि दस साल बाद कोई चीनी राष्ट्रपति भारत आए हैं. उच्च-स्तरीय भेंट भी अब जाकर धीरे-धीरे बढ़ी शुरु हुई है. अब इस दफा शिखर वार्त्ताओं को कम समयांतराल पर रखने की बात कही गई है और जब तक हम एक बढ़ी हुई रफ़्तार में नहीं मिलेंगे तब तक नेताओं के बीच व्यक्तिगत रिश्ते बनने की बात नहीं सोची जा सकती.

यह भारत के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति के बीच एक अत्यंत ही औपचारिक मुलाकात है जो रिश्तों में थोड़ी सी गर्माहट लाने की कोशिश कर रहे हैं.

 
 
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