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बुधवार, 19 जुलाई, 2006 को 15:22 GMT तक के समाचार
 
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पुलिसकर्मियों ने ली पढ़ाने की जिम्मेदारी
 

 
 
पढ़ाई
पुलिस थाने में पढ़ाई की व्यवस्था से गाँव वाले भी उत्साहित हैं
भारत और पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के बाड़मेर ज़िले में एक पुलिस थाने ने अपराध नियंत्रण के साथ साथ थाने में बच्चों को पढ़ाने का काम भी हाथ में लिया है.

पुलिस थाने की पाठशाला में प्रतिदिन 80 से ज़्यादा बच्चे तालीम लेने आते हैं. पुलिस यहाँ गुरूजी की भूमिका में है.

रामसर पुलिस स्टेशन के बैरक से गूंजती बच्चों की आवाज़ इस बात की ओर संकेत करती है कि सरहद पर पुलिस की छवि बदल रही है.

थाने की बैरक में न तो मुल्ज़िमों की चीख़ पुकार का शोर है और न ही उन्हें प्रताड़ना देते पुलिस वालों की तल्ख़ आवाज़.

पुलिस थाने में चल रही इस स्कूल में ज़्यादातर बच्चे या तो मुस्लिम लोक गायक माँगणियार बिरादरी के हैं या वे बच्चे जो ग़रीबी के कारण स्कूल की दहलीज़ पर नहीं चढ़ सके.

थाने को गुरूकुल बनाने वाले रामसर के पुलिस इंस्पेक्टर सुरेंद्र कुमार कहते हैं, "पहले बच्चे तो क्या उनके अभिभावक भी पुलिस का नाम सुनते ही डरते थे. अब भय दूर हो गया है. बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ संगीत का पाठ भी पढ़ाया जा रहा है."

पुलिस ने अपने दम पर ‘मिड डे मील’ की भी व्यवस्था की है. बच्चों ने कुछ पकवान और फल तो पहली बार यहीं आकर देखे.

नन्हें सपने

रामसर के सरपंच मोती मालू कहते हैं कि थाने का स्कूल सरकारी स्कूल से कहीं बेहतर साबित हो रहा है.

तीसरी कक्षा का छात्र स्वरूप खाँ पढ़लिख कर थानेदार बनना चाहता है. बच्चों की आँखों में भविष्य के सुनहरे सपने तैरने लगे हैं. नन्ही सुशीला बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती है तो कोई और बच्चा शिक्षक.

 पहले बच्चे तो क्या उनके अभिभावक भी पुलिस का नाम सुनते ही डरते थे. अब भय दूर हो गया है. बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ संगीत का पाठ भी पढ़ाया जा रहा है
 
इंस्पेक्टर सुरेंद्र कुमार

बैरक को स्कूल का प्रतिरूप देने से पहले एक एक सिपाही को इस काम के लिए प्रेरित किया गया. स्थानीय लोगों ने भी बड़ी मदद की.

पहले लोग थाने से हथकड़ी लगे लोगों को आते जाते देखते थे. अब भारत माता की जयकार करते बच्चे देखते हैं, तो उन्हे सुकून मिलता है.

इस बदले हुए परिदृश्य ने सरहद के एक निजी शिक्षक शाकिर खाँ को इतना प्रभावित किया कि वे कम पैसे पर भी इन बच्चों को पढ़ाने चले आए.

थार के बियाबान मरूस्थल में विकास की रफ़्तार धीमी है. पिछड़ेपन का घना अंधेरा है. ऐसे में थाने के बैरक से शुरू हुआ यह छोटा सा प्रयास शायद परिवर्तन की गति को तेज़ कर सके.

 
 
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