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गुरुवार, 13 जुलाई, 2006 को 23:08 GMT तक के समाचार
 
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अपनों को मुर्दों के बीच ढूँढने की पीड़ा
 

 
 
कई लोगों को अपने रिश्तेदारों का पता नहीं चल सका है
दिलीप पंडीरे अपने बहनोई सुनील वीरवाडकर को मंगलवार की शाम से ही ढूँढ रहे हैं लेकिन अभी तक कुछ पता नहीं चल सका है.

दिलीप कहते हैं, "वे हमेशा 5.50 की रेल पकड़कर काम से घर लौटते थे, उन्होंने मंगलवार को भी ऐसा ही किया लेकिन वे अब तक घर नहीं लौटे हैं."

दिलीप ने बताया कि रेलवे पुलिस को सुनील का बटुआ और उनकी घड़ी तो मिली है लेकिन न तो उनकी लाश मिली है, न ही वे किसी अस्पताल में वे घायलों की सूची में शामिल हैं.

इरशाद क़ासिम मुजावाद तो सोलापुर से भागे-भागे मुंबई पहुँचे हैं, उनके भाई अब्बास ने उन्हें किसी और के मोबाइल से फ़ोन करके बताया था कि वे ज़ख़्मी हैं.

इसके बाद उन्होंने अस्पतालों के चक्कर लगाने शुरू किए जहाँ घायलों का इलाज चल रहा था, वे बताते हैं, "मेरे भाई ने नहीं बताया कि वह किस अस्पताल में गया है, इसलिए मैं अस्पतालों के चक्कर काट रहा हूँ, दो जगह जा चुका हूँ लेकिन उसका नाम लिस्ट में नहीं है."

मुजावाद को मुंबई के सभी घायल लोगों की सूची दी गई लेकिन उसमें बहुत ग़ौर से देखने पर भी उन्हें अपने भाई का नाम नहीं मिला.

वे कहते हैं, "मैं अब बहुत घबरा रहा हूँ लेकिन मैं उसे अपने साथ लिए बिना यहाँ से नहीं जाऊँगा."

आँकड़े

मुंबई पुलिस कंट्रोल रूम का कहना है कि अब तक 773 लोग घायल हुए हैं जिनमें से 326 लोगों का इलाज 30 अस्पतालों में अब भी चल रहा है जबकि बाक़ी लोग मामूली रूप से घायल हुए थे जिन्हें प्राथमिक उपचार के बाद भेज दिया गया है.

 मेरे भाई ने नहीं बताया कि वह किस अस्पताल में गया है, इसलिए मैं अस्पतालों के चक्कर काट रहा हूँ, दो जगह जा चुका हूँ लेकिन उसका नाम लिस्ट में नहीं है
 
इरशाद क़ासिम मुजावाद

200 से अधिक लाशें हैं जिनमें से 173 की पहचान हो गई है और उन्हें उनके रिश्तेदारों के सुपुर्द कर दिया गया है, सिर्फ़ दो लाशें ऐसी हैं जिनकी पहचान नहीं हो सकी है जबकि छह लाशों को ले जाने के लिए कोई सामने नहीं आया है.

घायलों और मृतकों की सूची तैयार की गई है, हेल्पलाइन बनाए गए हैं लेकिन अब भी कई लोग ऐसे हैं जिन्हें अपने रिश्तेदारों की तलाश में भटकना पड़ रहा है, ऐसे ही लोगों में शामिल हैं एजे लुईस.

लुईस अपने साले जोसेफ़ नोरोन्हा के साथ एक रेल में सफ़र कर रहे थे लेकिन जोसेफ़ फर्स्ट क्लास में थे जबकि लुईस सेकेंड क्लास में, धमाका फर्स्ट क्लास में हुआ लेकिन उसके बाद से जोसेफ़ का कुछ पता नहीं चल रहा.

पहचान मुश्किल

सभी अस्पतालों में भटकने के बाद लुईस आख़िर में सायन अस्पताल पहुँचे जहाँ उन्हें एक लाश दिखाई दी जो उनके रिश्तेदार की कद-काठी से मिलती जुलती थी.

लुईस बताते हैं, "लाश का सिर गायब था, सिर्फ़ निचला जबड़ा था जो जोसेफ़ जैसा था, मैं पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकता, मैं उम्मीद कर रहा था कि वह जोसेफ़ नहीं हो, मैंने उसकी पत्नी को बुलाया है कि वह अपने पति की लाश को पहचाने के लिए, उसने बताया कि वह जोसेफ़ की लाश नहीं थी."

कुछ समय बाद एक दूसरे अस्पताल में जोसेफ़ की लाश मिल गई लेकिन अब भी कई लोग ऐसे हैं जिनकी दुख भरी तलाश जारी है.

 
 
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