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गुरुवार, 20 अप्रैल, 2006 को 11:57 GMT तक के समाचार
 
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नेपाल में जनांदोलन का स्वरूप
 

 
 
काठमांडू
नेपाल में राजशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन चरम पर है
दिल्ली से काठमांडू पहुँचकर मुझे नेपाल में चल रहे राजशाही के ख़िलाफ़ जनांदोलन का सही स्वरूप समझ आया.

कई हफ़्तों और महीनों से अख़बारों में राजा ज्ञानेंद्र के ख़िलाफ़ राजनीतिक पार्टियों और माओवादी के बयान पढ़कर मुझे लगा था कि राजनीतिक दलों और माओवादियों के अलग-अलग एजेंडा के चलते राजा काफ़ी हद तक सुरक्षित हैं.

लेकिन यहाँ पहुँचकर मुझे स्थिति का सही आकलन करने का मौक़ा मिला.

त्रिभुवन हवाई अड्डे पहुँचकर जब हम इमिग्रेशन की कतार में खड़े हुए तब एक अधिकारी ज़ोर से बोला “हमें भारत से बहुत आशा है. राजा को हटाकर लोकतंत्र लाना होगा.” आसपास खड़े नेपाली इस अधिकारी की बात पर कुछ नहीं बोले.

हवाई अड्डे के कुछ कर्मचारियों से अलग से बात की तो सबने एक स्वर में कहा कि राजशाही को ख़त्म करना है.

अचानक गुप्तचर विभाग का एक कर्मचारी मेरे पास आया और उसने हमारे बारे में जानकारी माँगी. पूछने पर कि क्या वो हमारे हर क़दम की जानकारी रखेगा तो वह मुस्कुराने लगा.

उत्साह

शहर में दाखिल होने पर जगह-जगह पर पुलिस और सैनिक तैनात थे. अधिकतर दुकानें बंद थी. लेकिन कीर्तिपुर बाज़ार की एक रैली में पहुँचकर लोगों का उत्साह नज़र आया.

हज़ारों पुरुष और महिलाएँ ताली बजाकर राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों का स्वागत कर रहे थे.

एक विद्यार्थी पवन अपना कॉलेज छोड़कर प्रदर्शन में शामिल होने आया था. उसने कहा “राजा को हटना होगा. 21वीं शताब्दी में राजशाही नहीं चल सकती.”

एक दूसरे ने कहा कि अब के विरोध प्रदर्शन और 1990 के प्रदर्शन में अंतर है. “हमें लोकतंत्र चाहिए और किसी भी हालत में हमें राजा स्वीकार नहीं.”

पूछने पर कि क्या उन्हें राजनीतिक पार्टियों पर भरोसा है तो एक अन्य ने कहा कि अगर लोकतंत्र बहाल किया जाए तब उन्हें हर पाँच वर्ष में अपना नुमाइंदा चुनने का मौक़ा मिलेगा.

ख़बर है कि भारत सरकार नई व्यवस्था में राजशाही को कुछ हक़ दिलाने पर बात कर सकता है लेकिन लोग आमतौर पर उसके हक़ में नहीं नज़र आए.

कुछ ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते नेपाल में वामपंथी सत्ता में नहीं आ सकते.

नई व्यवस्था के स्वरूप के बारे में अधिकतर लोग साफ़ नहीं हैं. अगर साफ़ है तो राजशाही के भविष्य और उसके अस्तित्व के बारे में.

 
 
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