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मंगलवार, 31 जनवरी, 2006 को 15:35 GMT तक के समाचार
 
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नक्सलियों से बचाएंगे आवारा कुत्ते
 

 
 
कुत्ता
पुलिस जाँच कार्यों में कुत्तों का सहारा लेती है
बिहार पुलिस के पास संसाधनों की कमी की हालत ये है कि अब नक्सली चरमपंथियों से ख़ुद को बचाने के लिए कुत्तों का सहारा लिया जा रहा है.

जुलाई 2005 में उग्रवादियों के हमले में गया ज़िले के परैया पुलिस थाने में तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो गई थी.

अधिकारियों के मुताबिक परैया के तंगहाल पुलिसवालों की रक्षा के लिए अब चौबीसों घंटे आवारा कुत्तों को लगाया गया है.

बदले में इन कुत्तों को बढ़िया खाना खिलाया जाता है. इसके लिए अलग से एक रसोई का इंतज़ाम भी किया गया है.

ये कुत्ते थाने में सारी रात गश्त देते हैं और किसी भी आगंतुक को देखकर भौंकने लगते हैं ताकि पुलिस वाले सचेत हो जाएँ.

बीते दो साल में आवारा कुत्तों की संख्या छह से बढ़कर 36 हो गई है.

पुलिस अधिकारी बैद्यनाथ ने बीबीसी से कहा, “जर्जर पुलिस थानों की रक्षा करना आसान नहीं. विशेष रूप से रात में आप हर आहट पर नज़र नहीं रख सकते.”

वह कहते हैं, “हमारे पास संसाधनों के साथ ही बल की भी कमी है इसलिए हम रात में ठीक से चौकसी नहीं कर पाते. लिहाजा हमने इस काम में आवारा कुत्तों को लगाया है.”

वह अपने बगल में खड़े कुत्ते शेरा की पीठ थपथपाते हुए कहते हैं, आखिर कुत्ता आदमी का सबसे भरोसेमंद दोस्त भी तो होता है? फिर वह शेरा को उसकी सेवाओं के लिए धन्यवाद देना भी नहीं भूलते.

कुत्तों की सेवा में

जहानाबाद शहर से 40 किलोमीटर दूर स्थित परैया गाँव के 24 पुलिसकर्मी कुत्तों के रखरखाव और भोजन के लिए अपने वेतन का पाँच फ़ीसदी हिस्सा दे रहे हैं.

परैया का जर्जर थाना
पुलिस को कुत्तों पर भरोसा है

आम तौर पर इन कुत्तों को दिन में दो बार दाल-चावल दिया जाता है, लेकिन कभी-कभी उन्हें रोटियाँ भी दी जा रही हैं.

कुत्तों के लिए एक खुली रसोई बनाई गई है और उनके लिए अलग से बर्तन भी रखे गए हैं.

इस खुली रसोई की बगल में ही एक बड़ी सी रसोई है जहाँ पुलिसवाले एक नौकर के साथ मिलकर अपने लिए भोजन तैयार करते हैं.

कुत्ते यहाँ भोजन करने आते हैं और पूरी ईमानदारी से रात में ड्यटी बजाने के लिए यहाँ आ जाते हैं. ये कुत्ते किसी भी अनजाने व्यक्ति को देखकर या आहट को सुनकर भौंकने लगते हैं.

सहायक पुलिस निरीक्षक मिर्ज़ा मतनी बेग कहते हैं, “हम उन पर पूरा भरोसा करते हैं, ये कुत्ते माओवादियों से निपटने के लिए तैयार हमारे बल का हिस्सा हैं.”

परैया का पुलिस थाना बहुत ही जर्जर हालत में है. इसकी टिन की छत इसकी बदहाली की कहानी बताती है. यहाँ बुनियादी चीज़ों का अभाव है.

रात में यह अंधेरे में डूब जाता है. यहाँ जनरेटर नहीं है. बिजली पूरे दिन मुश्किल से एक घंटे रहती है. और कभी कभी तो एक हफ्ते या एक महीने तक भी बिजली के दर्शन नहीं होते.

हथियारबंद एक जवान ने कहा, “कुत्ते गश्त लगाते हैं और जब वह भौंकते हैं तो हम सतर्क हो जाते हैं और अपनी टार्च जला लेते हैं.”

लेकिन, ऐसा हमेशा नहीं होता क्योंकि पुलिस के पास सिर्फ एक बैटरी है और उसका वह आपात स्थिति में ही इस्तेमाल करते हैं.

कांस्टेबल नवीन कुमार मिश्रा कहते हैं, हमने अपने ख़र्चे से वायरलेस सिस्टम के लिए एक और बैटरी का इंतज़ाम किया है, हम अपने वेतन का 20 फ़ीसदी हिस्सा इस बेहद ज़रूरी काम के लिए ख़र्च कर रहे हैं वरना हमारा जीना मुश्किल हो सकता है.

क़ुर्बानी कम नहीं

बिहार के 38 जिलों में से 18 बुरी तरह से माओवादी हिंसा का शिकार हैं. विशेषरूप से केंद्रीय बिहार का तो एक लंबा ख़ूनी इतिहास रहा है.

भारतीय पुलिस
परैया पुलिस के पास आधुनिक हथियार नहीं हैं

राज्य के दूसरे पुलिसवालों की तरह परैया के पुलिसकर्मियों के पास भी पुराने ज़माने की एनफ़ील्ड राइफलें हैं जबकि उन्हें एके-47 और हैंड ग्रेनेड से लैस विद्रोहियों से मुक़ाबला करना पड़ रहा है.

अधिकारियों के पास मुश्किल से एक जीप है. टायलेट की सुविधा नहीं है और न ही शिफ्ट के बीच में आराम करने की कोई जगह है.

पिछले वर्ष नवंबर में सैकड़ों विद्रोहियों ने जहानाबाद के नज़दीक जेल पर हमला बोला था.

बिहार पुलिस एसोसिएशन के महासचिव केके झा के मुताबिक पुलिस के ज़्यादातर नए हथियार वीआईपी लोगों की सुरक्षा में तैनात गार्डों के पास हैं.

झा चाहते हैं कि नई सरकार अपने वादे पर अमल करते हुए पुलिस की बदहाली की ओर ध्यान दे वरना माओवादियों से लड़ने में उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ सकती है.

बिहार सरकार ने हाल ही में राज्य के माओवादी हिंसा से सबसे ज़्यादा प्रभावित हिस्से में दो करोड़ डॉलर की एक योजना की घोषणा की है.

इस योजना पर अमल होने तक तो परैया के पुलिवालों को आवारा कुत्तों के साथ ही रहना होगा.

 
 
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