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रविवार, 15 जनवरी, 2006 को 09:30 GMT तक के समाचार
 
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फिर काम आ रही है पारंपरिक अंगीठी
 

 
 
अंगीठी तापते लोग
लोगों को ठंड से राहत के लिए अंगीठी का सहारा लेना पड़ रहा है.
कड़ाके की सर्दी और बिजली की भारी कटौती के कारण झुग्गी-झोपड़ियों तक सीमित रह गयी भूली-बिसरी अंगीठी एक बार फिर कोठी, बंगलों और सरकारी कार्यालयों में भी पंहुच गई है.

अंगीठी 21वीं सदी के कंप्यूटर युग में शहरों से क़रीब-क़रीब लुप्त ही हो चुकी थी.

उत्तर भारत में इन दिनों पड़ रही कड़ाके की ठंड के कारण उत्तर प्रदेश में तो बाक़ायदा सरकारी कार्यालयों में बिजली के हीटरों के बजाय कोयले की अंगीठी को ही स्वीकृति दे दी गई है, जो कि पूरे-पूरे दिन बिजली की कटौती के कारण सर्दी से राहत पाने का एकमात्र साधन बची है.

अंगीठी बनाने वालों के अनुसार इन दिनों तेजी से इसकी बढ़ती मांग का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि साधारण लोहे की अंगीठियां भी दोगुने दामों पर बेची जा रही हैं.

सरकारी और ग़ैर-सरकारी कार्यालयों के अलावा बैंकों और निजी संस्थानों जैसी तमाम जगहों पर पहले बिजली के हीटर या ब्लोअर जैसे गर्मी देने वाले उपकरण दो महीनों के लिये ठेके पर लिये जाते थे.

और तो और दिल्ली जैसे शहर में भी लोग अंगीठी और कोयला ख़रीदकर घर ले जा रहे हैं.

पारंपरिक सहारा

इस स्थिति से ठीक उलट इस वर्ष बिजली की 10-12 घंटे की कटौती के कारण कड़ाके की ठंड से राहत पाने के लिये अंगीठी का इस्तेमाल किया जा रहा है.

अंगीठी
माँग बढ़ने से अंगीठी दोगुने दामों पर बिक रही हैं.

शहरों में बिजली के बढ़ते इस्तेमाल के चलते किसी समय घरों को गर्म करने वाले आतिशदान भी नये ज़माने के वास्तुकला के लिहाज से ग़ायब हो चुके हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल में अंगीठी और चूल्हों की आपूर्ति करने वाले निर्माता अनिल कुमार के अनुसार, "पहले झुग्गी झोपड़ियों और ग्रामीण क्षेत्रों में ही अंगीठी की मांग थी लेकिन शहरों में इसकी मांग बढ़ने से बाजार में साधारण टीन की अंगीठी भी 50 रुपये के बजाये सौ रुपये में बेची जा रही है."

इतना ही नहीं बढ़ती मांग के कारण बाज़ार से अंगीठी के ग़ायब हो जाने पर मिट्टी के गमलों और पुरानी बाल्टियों आदि को भी अंगीठी की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.

सर्दी से परेशान लोगों का कहना है कि अगली सर्दी की तैयारी में एक अंगीठी भी शामिल होगी जिसे पहले से ख़रीद कर रखा जाएगा.

 
 
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