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मंगलवार, 22 नवंबर, 2005 को 12:43 GMT तक के समाचार
 
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'एक जाति के आधार पर नहीं होती जीत'
 

 
 
मतदाता
साफ़ है कि लालू का मुस्लिम-यादव समीकरण बिखरा है
बिहार में इस विधानसभा चुनाव में सामने आए परिणामों के आधार पर यह अनुमान लगाना कि भारत में राजनीति में जातियों की भूमिका ख़त्म हो गई है, मेरे हिसाब से कुछ जल्दबाज़ी होगी.

इस परिणाम में भी जातियाँ ही आई हैं पर प्रश्न यह है कि कौन सी जातियां कहाँ गई हैं.

बिहार और उत्तर प्रदेश, दोनों ही राज्यों में यह स्थिति है कि यादवों और पिछड़ी जाति के लोगों के बीच में मतभेद हैं.

इसकी वजह यह है कि यादवों के पास ज़मीन है और उनका पिछड़ी जातियों पर दबदबा होता है.

बिहार में जब यादवों का अत्याचार बढ़ गया तो नीतिश कुमार ने इस अत्याचार को झेल रही जातियों को साथ लिया है, जैसा कि उत्तर प्रदेश में मायावती ने किया है.

ऐसे में यह कहना ग़लत है कि जातिवाद ख़त्म हो गया. जातिवाद तो कोई ख़त्म होने दे ही नहीं रहा.

लालू की भूल

लालू दावा करते थे कि 16 फ़ीसदी यादव वोट और 17 फ़ीसदी मुस्लिम वोट उनके साथ हैं पर इसी के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता.

अन्य जातियों के समर्थन की भी ज़रूरत हमेशा ही पड़ती है.

लालू यहीं पर ग़लती कर गए. जीतने के बाद नेता केवल मुख्य समर्थक जातियों को ही ध्यान रखते हैं पर किसी भी राज्य में कोई भी ऐसी जाति नहीं है जो केवल अपने दम पर चुनाव जीत पाए.

हाँ, यह सही है कि शुरुआत में यादव और मुसलमान वोट इनके साथ थे.

इसकी वजह यह थी कि मुस्लिम समुदाय उसी के साथ जाता जो हिंदुत्ववादी पार्टी, भाजपा के ख़िलाफ़ खड़ा हो सकता.

लालू प्रसाद ने रथयात्रा की छुट्टी कर दी और आडवाणी को गिरफ़्तार कर लिया था.

पिछले 15 वर्षों में अन्य जातियों की तरह मुसलमानों का भी कोई विकास नहीं हुआ और इसी वजह से कुछ पासवान के साथ चले गए तो कुछ नीतिश कुमार के साथ भी गए हैं.

 ऐसा आगे हो सकता है कि नीतिश कुमार और भाजपा के शासनकाल में यह ख़तरा फिर से पैदा हो जाए और मुसलमान फिर से लालू प्रसाद या फिर कांग्रेस के साथ चले जाएं
 

एक समय था जब मुसलमान ख़तरा महसूस करते थे पर इस बार उन्होंने किसी एक पार्टी को वोट नहीं दिया.

ऐसा आगे हो सकता है कि नीतिश कुमार और भाजपा के शासनकाल में यह ख़तरा फिर से पैदा हो जाए और मुसलमान फिर से लालू प्रसाद या फिर कांग्रेस के साथ चले जाएं.

ट्रेंड नहीं, ज़रूरत

वैसे देखें तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अमर सिंह का साथ लिया, मायावती ने ब्राह्मणों को साथ लिया और बिहार में लालू प्रसाद ने कांग्रेस को साथ लिया.

एक कृषक
भांबरी मानते हैं कि केवल एक जाति के आधार पर कोई सत्ता में नहीं आ सकता है

यह कोई नया ट्रेंड नहीं है बल्कि जीतने के लिए एक आवश्यक स्थिति है.

कांग्रेस ने 40 वर्षों तक यही किया. कांग्रेस को यह समझ थी कि एक जाति के आधार पर कोई चुनाव जीता नहीं जा सकता है इसीलिए कांग्रेस ने जातियों का गठबंधन बनाया था और वो चलता रहा.

इसके बाद ये लोग आए और इन्होंने दावा किया कि जाति विशेष इनके साथ है पर यह सब लंबे समय तक नही चलता है.

यह महज एक भ्रम है कि एक जाति के आधार पर कोई चुनाव जीता जा सकता है.

(रेहान फ़ज़ल से बातचीत पर आधारित)

 
 
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