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रविवार, 28 अगस्त, 2005 को 11:41 GMT तक के समाचार
 
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'शरीयत अदालतें समानांतर अदालतें नहीं'
 
मुस्लिम महिला
पिछले दिनों जारी किए गए फ़तवों से विवाद पैदा हुआ है
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि शरीयत अदालतें कोई सामानांतर अदालतें नहीं हैं और वे सामाजिक विवादों में मध्यस्थ की भूमिका निभा रही हैं.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरीयत अदालतों पर जारी नोटिस के बाद दिल्ली में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की एक बैठक के बाद कहा गया है कि शरीयत अदालतें आपराधिक मामलों पर कोई फ़ैसला नहीं दे रही हैं.

जबकि जानेमाने क़ानूनविद एजी नूरानी का कहना है कि शरीयत अदालतें क़ानूनी नहीं हैं.

हालांकि बोर्ड के सदस्य अब्दुल रहीम कुरैशी ने कहा कि अभी बोर्ड को नोटिस नहीं मिला है लेकिन प्रेस में आई ख़बरों के आधार पर इस विषय पर चर्चा की गई.

उल्लेखनीय है कि 16 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत अदालतें स्थापित करने को चुनौती देने वाली याचिका पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, केंद्र सरकार और सात राज्यों को नोटिस जारी किया था.

 मुस्लिमों को संविधान में जो अधिकार दिए गए हैं दारुल कज़ा (या शरीयत अदालतें) इसी के आधार पर काम करते हैं और ने सामानांतर अदालतें नहीं हैं
 
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि शरीयत अदालतें समानांतर अदालतों की तरह काम कर रही हैं.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक के बाद अब्दुल रहीम क़ुरैशी ने कहा, "मुसलमानों को संविधान में जो अधिकार दिए गए हैं दारुल कज़ा (या शरीयत अदालतें) इसी के आधार पर काम करती हैं और वे सामानांतर अदालतें नहीं हैं."

उनका कहना था कि शरीयत अदालतें आमतौर पर पारिवारिक झगड़ों का ही फ़ैसला करती हैं.

अब्दुल रहीम क़ुरैशी ने कहा, "हम तो एक तरह से भारतीय न्यायिक व्यवस्था की सहायता ही कर रहे हैं और जहाँ लाखों मामले लंबित हैं हम अदालतों का बोझ कम कर रहे हैं."

उन्होंने कहा कि शरीयत अदालतें आपराधिक मामलों में कोई फ़ैसला नहीं देती हैं और उनका मानना है कि इसके लिए भारतीय संविधान ही सर्वोपरि हैं.

फ़तवों के बारे में उन्होंने कहा कि ज़्यादातर फ़ैसले महिलाओं के हक़ में होते हैं.

लेकिन इमराना के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि कुछ मामलों को बढ़ाचढ़ा कर बताया जाता है और उसे ग़लत ढंग से पेश किया जाता है.

उन्होंने कहा कि इमराना के मामले में शरीयत अदालत बैठी ही नहीं थी तो कोई फ़ैसला किए जाने का सवाल ही नहीं है.

क़ानूनी रुप नहीं

सुपरिचित क़ानूनविद एजी नूरानी मानते हैं कि शरीयत अदालतों को सिर्फ़ मध्यस्थ के रुप में स्वीकार किया जा सकता है.

 दारुल क़ज़ा में कोई मुसलमान काज़ी फ़ैसला दे इसे कोई क़ानूनी मान्यता नहीं है
 
एजी नूरानी

उन्होंने कहा, "दारुल क़ज़ा में कोई मुसलमान काज़ी फ़ैसला दे इसे कोई क़ानूनी मान्यता नहीं है."

बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि ये अदालतें सामानांतर अदालतों की तरह काम नहीं कर सकतीं.

उन्होंने कहा कि इनको मध्यस्थ की तरह ही देखा जाए तो अच्छा है.

 
 
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