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सोमवार, 23 अगस्त, 2004 को 21:46 GMT तक के समाचार
 
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आधुनिक युग के 'श्रवण कुमार'
 

 
 
कैलाशगिरी
कैलाशगिरी अपनी माता के साथ छह हज़ार किलोमीटर की तीर्थयात्रा कर चुके हैं
कर्नाटक की राजधानी बंगलौर में एक ऐसे व्यक्ति का किस्सा सामने आया है जिन्हें देखकर लोगों को श्रवण कुमार याद आ गए जिनका ज़िक्र हिंदू धर्मशास्त्रों में मिलता है.

कई ग्रामीण महिलाएँ भगवा वस्त्र डाले उस 32 वर्षीय व्यक्ति के सामने सिर झुकाती हैं और कई अन्य लोग भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते.

ये व्यक्ति हैं कैलाशगिरी ब्रह्मचारी जो अपनी अंधी और बूढ़ी माता को काँवड़े में बिठाकर अपने कंधे पर उठाकर हिंदू धामों की तीर्थयात्रा पर निकले हैं.

उनकी यात्रा मध्यप्रदेश में जबलबुर ज़िले में स्थित उनके गाँव पिपारिया से आठ साल पहले शुरु हुई थी.

अब तक वे इस तरह से लगभग छह हज़ार किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं और उनकी ये यात्रा वर्ष 2013 के कुंभ मेले में ख़त्म होगी.

 शरीर में दर्द तो होता है. लेकिन मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं इस यात्रा को पूरा करूँ चाहे मुझे ऐसा करने में और 12 साल लगें
 
कैलाशगिरी

कैलाशगिरी का कहना है, "मेरा ऐसा करना तो भगवान की इच्छा के अनुसार है."

इतनी कठिन यात्रा के बारे में वे कहते हैं, "शरीर में दर्द तो होता है. लेकिन मेरा दृढ़ निश्चय है कि मैं इस यात्रा को पूरा करूँ चाहे मुझे ऐसा करने में और 12 साल लगें."

बंगलौर से 25 किलोमिटर दूर स्थित एक गाँव की बूढ़ी महिला गौराम्मा कहती हैं, "इस आधुनिक युग में ऐसा कहाँ होता है? पता चलता है कि वे अपनी माता को कितना चाहते हैं."

एक अन्य महिला कहती हैं, "ये तो सचमुच ही स्वामी हैं."

कैलाशगिरी कहते हैं, "मेरा संदेश बहुत सरल है. अपने माता-पिता का ध्यान रखें नहीं तो आपकी संतान भी आपका ध्यान नहीं रखेगी."

रास्ते में लोग माता और पुत्र को पैसे और खाना देते हैं लेकिन कैलाशगिरी की माता को पुत्र का पकाया खाना ही पसंद है.

 मेरा बेटा बहुत अच्छा है लेकिन मैं ही कभी-कभी थक जाती हूँ. ये यात्रा भी ख़त्म कर घर वापस जाने का विचार दिमाग में आता है. लेकिन मैं बहुत ख़ुश हूँ. मैने कई मंदिरों के दर्शन किए हैं
 
कैलाशगिरी की माता

उनकी माता केतकदेवी कहती हैं, "मेरा बेटा बहुत अच्छा है लेकिन मैं ही कभी-कभी थक जाती हूँ. ये यात्रा भी ख़त्म कर घर वापस जाने का विचार दिमाग में आता है. लेकिन मैं बहुत ख़ुश हूँ. मैने कई मंदिरों के दर्शन किए हैं."

माता और पुत्र मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आँध्र प्रदेश और कर्नाटक की यात्रा कर चुके हैं और अयोध्या और काशी धर्मस्थलों पर जा चुके हैं.

कैलाशगिरी कहते हैं, "मुझे सेहत की कोई चिंता नहीं. यदि मैं मर भी जाऊँ तो कोई बात नहीं. इस यात्रा के पीछे मकसद ज़्यादा ज़रूरी है."

वे हर रोज़ तीन-चार किलोमीटर चलते हैं लेकिन कई बार तो 20 किलोमीटर भी चल लेते हैं. वे कहते हैं कि यदि उन्हें थकावट महसूस हो तो कुछ दिन आराम भी कर लेते हैं.

एक ट्रक चालक शिवाजी शेलर उनसे इतने प्रभावित हुए कि उनके चेले बन गए और अब 'स्वामी जी' की देखभाल करते हैं.

जब कैलाशगिरी से पूछा गया कि वे अपने पास मोबाइल फ़ोन अपने परिवार वालों से संपर्क बनाए रखने के लिए रखते हैं, तो उनका कहना था, "पूरा संसार ही मेरा परिवार है."

 
 
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