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शुक्रवार, 30 जुलाई, 2004 को 14:42 GMT तक के समाचार
 
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सूखे से बेहाल किसान शहरों की ओर
 

 
 
राजस्थान में श्रमिक
राजस्थान में सूखे से बेहाल हैं मज़दूर
भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान में अकाल की आहट अब बहुत ज़ोर से सुनाई देने लगी है. मॉनसून मेहरबान नहीं है और सावन सूखा जा रहा है.

लोग गाँव से पलायन कर शहरों का रुख कर रहे हैं. शहरों में रोज़ लगने वाली मज़दूर मंडियों में भीड़ बढ़ गई है.

जयपुर और जोधपुर की दैनिक मज़दूर मंडियों में मज़दूरों की संख्या दोगुनी हो गई है. जयपुर शहर में 35 ऐसी मज़दूर मंडियाँ हैं जिन्हें चौखटी कहा जाता है.

मॉनसून की दस्तक के साथ ही इन चौखटियों पर भीड़ बढ़ने लगती है और मज़दूर गाँवों का रास्ता पकड़ वहां खेती- बाड़ी में लग जाते हैं.

पर इस बार मज़दूर मंडियों में भीड़ घटने की बजाय बढ़ गई है. हर हाथ काम माँग रहा है. दिहाड़ी मज़दूरों की यूनियन के अध्यक्ष हरकेश बुगालिया के अनुसार जयपुर में अभी प्रतिदिन तीस हज़ार श्रमिक इन मंडियों में काम की तलाश में आते हैं.

इनमें से ज्यादातर को खाली हाथ लौटना पड़ता है. जयपुर की टोंक फाटक चौखटी पर खड़े मोहन लाल गुर्जर को काम की तलाश बूँदी ज़िले से जयपुर खींच लाई.

40 बीघा धरती के मालिक गुर्जर का कहना है कि बारिश न होने से खाने के लाले पड़ गए हैं. वहीं खड़े जयपुर ज़िले के हुलासपुरा गाँव के गोरधन की भी यही कहानी है.

जैसे ही कोई ठेकेदारनुमा व्यक्ति चौखटी से गुजरता है, मज़दूरों की आँखों में चमक आ जाती है. लेकिन अगले ही क्षण यह चमक बुझ जाती है जब उन्हें पता लगता है कि वह व्यक्ति निर्माण ठेकेदार नहीं था.

यही मंज़र जोधपुर की मज़दूर मंडियों का है, जहाँ मरुस्थलीय ज़िलों के अलावा दूरस्थ आदिवासी ज़िलों के मज़दूर भी काम माँगने वालों की कतार में आ खड़े हुए हैं.

आदिवासी बहुल राजसमंद जिले से आए भैरुलाल का कहना था कि बरसात न होने से उसे घर बार छोड़ना पड़ा है.

भीलवाड़ा के किशनराम का कहना है कि खेती तो दूर की बात गाँवों में अभी से चारे पानी की कमी हो गई है. बाड़मेर के बीरमाराम जोधपुर में निर्माणकार्यों में छोटी मोटी ठेकेदारी करते हैं.

बीरमाराम कहते हैं कि अभी आधे मज़दूरों को ही काम मिल पा रहा है. क्योंकि सूखे की संभावना से शहरों में भी निर्माण कार्य बंद होने लगे हैं.

जोधपुर में ऐसे बारह हाट बाज़ार हैं जहाँ मज़दूर हर रोज़ इकट्ठा होते हैं. राज्य सरकार ने अभी तक राहत कार्य प्रारम्भ नहीं किए हैं.

सरकार को लगता है व्यापक पूजा पाठ के बाद इन्द्रदेव अंततः द्रवित हो ही जाएंगे.

मज़दूर मंडियों में हर सुबह उम्मीद की किरण के साथ शुरू होती है और जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, मज़दूरों के लिए दिन की पारी लंबी हो जाती है क्योंकि काम न मिलने पर दिन पहाड़ सा लगने लगता है.

कल फिर लगेगी मजदूरों की मण्डी और वे आएँगे अपना श्रम बेचने के लिए. शायद कल कोई ठेकेदार नीलामी में उनकी मेहनत ख़रीदने को तैयार हो जाए.

 
 
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