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गुरुवार, 29 अप्रैल, 2004 को 23:35 GMT तक के समाचार
 
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चुनावी रंग में सराबोर कोलकाता
 

 
 
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पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों का वर्चस्व रहा है जो रिकॉर्ड समय से सत्ता में कायम हैं
कोलकाता कालीघाट से लेकर दमदम तक चुनावी रंग में सराबोर है.

एक करोड़ की आबादी, ढेर सारे मुद्दे, अनेक समस्याएँ लेकिन महानगर की पाँच सीटों पर मुक़ाबला बहुत पेचीदा नहीं है.

कोलकाता में मुक़ाबला मुख्य रूप से ‘दादा’ के दल सीपीएम और ‘दीदी’ की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बीच है.

महानगर की पाँच में से सिर्फ़ एक सीट ऐसी है जहाँ भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार तपन सिकदर मैदान में हैं, जो पिछली बार भी दमदम से सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं.

चुनावी रंग

कोलकाता में चुनाव प्रचार का अपना अलग ही अंदाज़ है

चुनाव प्रचार ठेठ ‘बंगाली विधान’ से चल रहा है, दीवारों पर नारे ही नहीं लिखे बल्कि बेहतरीन कार्टून भी दिख रहे हैं, उम्मीदवार किसी और राज्य की ही तरह तमाम हथकंडे अपना रहे हैं लेकिन ख़ास भद्र बंगाली शैली में.

कोलकाता के नेता राजनीति में नाक तक डूबे हैं लेकिन तीन ‘स’ के बिना उनका जीवन सम पर नहीं आता—साहित्य, संगीत और संस्कृति.

कोलकाता के एक उम्मीदवार का नारा इसका ख़ास उदाहरण है—जिसका हिंदी अनुवाद होगा, साड़ी,बाड़ी और गाड़ी ही नहीं, एमपी भी बदल डालो.

या फिर सीपीएम के एक समर्थक का युद्धघोष सुनिए—तृण (घास) को मूल (जड़) से काट डालेगा हँसिया, कांग्रेस और भाजपा के सिर पर पड़ेगा हथौड़ा. सीपीएम का चुनाव चिन्ह हँसिया और हथौड़ा है.

उम्मीदवार

सड़कों पर विशाल कटआउट लगे हैं

दिल्ली में लोग अजित पांजा को भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री के तौर पर जानते हैं लेकिन पूर्वोत्तर कोलकाता से उम्मीदवार पांजा लोगों को याद दिला रहे हैं कि वे ‘रामकृष्ण परमहंस’ हैं.

दरअसल, पांजा एक मशहूर बांग्ला नाटक नटी विनोदिनी में परमहंस की भूमिका कर चुके हैं और लोगों की उसकी याद दिलाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते.

इस पर उनके प्रतिद्वंद्वी माकपा के उम्मीदवार मोहम्मद सलीम को एतराज़ है, उनका कहना है कि यह सांप्रदायिकता नहीं तो और क्या है, अब ज़रा ये देखिए.

बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार में मंत्री सलीम साहब गुजरात से एक दंगा पीड़ित मुसलमान को कोलकाता लाए हैं, उन्हें सड़कों पर घुमाया और एक सिलाई मशीन दिलाई है, अहमदाबाद के कुतुबुद्दीन अंसारी माकपा उम्मीदवार के बोलने-चलने वाले पोस्टर बन गए हैं.

इसी सीट पर कांग्रेस की उम्मीदवार ‘बालिका बधू’ मौसमी चैटर्जी भी तांत की साड़ी में धूप और धूल के बीच जनता से वोट देने की मनुहार कर रही हैं.

सुंदरी बनाम दीदी

ममता बनर्जी को टक्कर देने उतरी हैं पूर्व मिस इंडिया नफ़ीसा अली

दक्षिण कोलकाता में एक और विश्व सुंदरी (पूर्व लिखने पर शायद बुरा मान जाएँ) अपनी सुंदरता को धूप में झुलसाकर, झाल-मूड़ी और ट्राम के धक्के खाकर कांग्रेस का झंडा बुलंद कर रही हैं—नफ़ीसा अली.

भांगा-भांगा बांग्ला में बोलने वाली नफ़ीसा किसी और को नहीं बल्कि बंगाल की ‘जगत दीदी’ ममता बैनर्जी को टक्कर देने की कोशिश कर रही हैं.

वैसे जानकार लोग बता रहे हैं कि यह दो औरतों का मुक़ाबला नहीं है बल्कि ममता की भिडंत सीपीएम के रॉबिन देब से है जो विधानसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक हैं.

प्रमुख टक्कर

1999 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर उत्तर-पश्चिम कोलकाता से जीतने वाले सुदीप बंदोपाध्याय का ममता बैनर्जी से झगड़ा हो गया, इस बार वे निर्दलीय उम्मीदवार हैं और कांग्रेस ने उनके समर्थन में उम्मीदवार नहीं खड़ा किया है.

काँग्रेस अपने दम पर ही मैदान में उतरी है

लेकिन माकपा तो कांग्रेस-तृणमूल-भाजपा तीनों को एक साथ चित करने का मज़ा लेने कोशिश में है, उसके उम्मीदवार हैं विधायक शुधेंदु शील जबकि तृणमूल ने कोलकाता के मौजूदा मेयर सुब्रतो मुखर्जी को मैदान में उतारा है.

कोलकाता के जादवपुर संसदीय क्षेत्र से ममता बैनर्जी ने 1984 के चुनाव दिग्गज नेता सोमनाथ चैटर्जी को हराकर सनसनी फैला दी थी, इस बार वहाँ से उनकी उम्मीदवार हैं कृष्णा बोस.

उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी सुभाष चंद्र बोस की वंशज होना है और उनका मुक़ाबला सीपीएम के डॉक्टर सुजान चक्रवर्ती से है जो शुरू से छात्र आंदोलन के अगुआ रहे हैं.

महानगर की पाँचों सीटों पर मुक़बला ज़ोरदार है और राजनीतिक चेतना से लैस जनता इसका भरपूर आनंद ले रही है, परिणाम किसके लिए कितने आनंददायक होंगे इसका पता कुछ समय बाद ही चलेगा.

 
 
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